मंगलवार, 21 जुलाई 2020

पार्टियों में बगावत

पार्टियों में बगावत
सबसे अधिक समय तक सत्ता का स्वाद चखनेवाली कांग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की बगावत कोई नई घटना नहीं है। कांग्रेस इसकी अभ्यस्त है। कांग्रेस में बागियों की लंबी-चैड़ी फेहरिस्त है। फिर चाहे कोई कद्दावर नेता हो या छुटभइया; ज्यादातर बागी तेवर सत्ता लोलुपता के लिए गीदड़ भभकी माना जाता है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की नासमझी और नाकामी से वह विध्वंसकारी साबित हुआ करता है।


इमेरजेंसी के आसपास के इतिहास पर गौर फरमाएं। कांग्रेस से बगावत करके ही मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक पहले गैर-कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने थे। इसी दौरान बाबू जगजीवनराम भी कांग्रेस से किनारा कर जनता पार्टी की सरकार में उपप्रधानमंत्री बन गए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी बोफोर्स के मुद्दे पर कांग्रेस का दामन छोड़कर जनता दल का गठन कर लिया था। इससे कांग्रेस को करारा झटका लगा था। तब, वह हासिये में चली गई थी। इसके बाद देश का राजनीतिक घटनाचक्र तेजी से बदला था। वीपी सिंह 1 दिसंबर 1989 से 7 नवंबर 1990 तक ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें अविश्वास प्रस्ताव से पदत्याग करना पड़ा था।

1980 में एके एंटनी, 1986 में प्रणव मुखर्जी, 1996 में माधवराम सिंधिया और 2001 में पी चिंदमबरम में इसी राह के राही थे। हालांकि ये नेता कुछ समय उपरांत कांग्रेस में वापस आ गए थे। एके एंटनी और पी चिदंमबरम तो बाद की कांग्रेस सरकारों में मंत्री भी रहे। आदरणीय प्रणव मुखर्जी 25 जुलाई 2012 से 24 जुलाई 2017 तक कांग्रेस के समर्थन से भारत के राष्ट्रपति भी रहे।

कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1987 में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई। महाराष्ट्र के धाकड़ नेता शरद पवार, पूर्वाेत्तर के नेता पीए संगमा और तारीक अनवर भी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को गरमाकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना लिए।

आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर वाईएसआर कांग्रेस का गठन कर लिया और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे।

छत्तीसगढ़ में बगावती तेवर वाले नेताओं में स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, अरविंद नेताम और अजीत जोगी प्रमुख थे। विद्याचरण शुक्ल का तो सारा जीवन कांग्रेस से अंदर-बाहर होने में बीता था। दिवंगत महेंद्र कर्मा ने भी कई मर्तबा बागी तेवर दिखाए थे।

केंद्र में लंबे समय तक कृषि राज्यमंत्री रहे अरविंद नेताम तक ने एक समय कांग्रेस का दामन छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया था। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी की तो बात ही निराली थी। वे अपनेआप को उधर श्रीमती सोनिया गांधी का भक्त बताते रहे, उधर कांग्रेस से दरकिनार कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बना लिया था।

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस से विलग होकर दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट बना लिया और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए।

यही नहीं, कांग्रेस से अलग होकर पुडुचेरी में एन रंगास्वामी, एनआर कांग्रेस और नगालैंड में नेफ्यू रियो, एनपीएफ का गठन कर अपने-अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। इसी तरह महाराष्ट्र का विदर्भ जनता कांग्रेस और तमिलनाडु का तमिल मनीला कांग्रेस भी कांग्रेस के ही टूटे हुए घड़े हैं।

1980 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई। भाजपा से जुदा होकर 17 पार्टियां बनी, लेकिन सबके सब फिसड्डी साबित हुए। भाजपा से उप्र के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होकर जनक्रांति पार्टी बनाई। भाजपा से मप्र की मुख्यमंत्री रही फायरब्रांड नेत्री उमा भारती ने जनशक्ति पार्टी बनाई। भाजपा से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल ने जीपीपी बनाई और झारखंड में बाबूलाल मरांडी ने जेवीएम बनाई।

लेकिन अफसोस यह कि इनमें-से कोई नेता अपना अस्तित्व बचा न सका। ये सभी नेता वापस अपने घर लौट आए। यही नहीं, यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा भी भाजपा से अलग होकर अलग-अलग राग अलापते रहते हैं, लेकिन उनको कोई गंभीरता से नहीं लेता।

इमेरजंेसी के बाद वजूद में आये जनता दल भी बार-बार टूटा और टूटकर इस कदर बिखरा कि मूल पार्टी का नामोनिशान तक मिट गया। इसकी वजह बनी नेताओं की महत्वाकांक्षा, अहम, कलह और कटुता।

जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनानेवाले मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश; राष्ट्रीय जनता दल बनानेवाले लालू यादव, बिहार; जनता दल यूनाइटेड बनानेवाले नीतीश कुमार बिहार और बीजू जनता दल बनानेवाले नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए।

इसके अलावा व्यापक पैमाने पर आयाराम और गयाराम भी हुआ है। नेतागण अपने अनुयायियों सहित यहां से वहां गए। कई नई पार्टी में रम गए हैं, तो कई पुरानी पार्टी में वापस लौट भी आए। आने और जाने का सिलसिला देशभर में कहीं-न-कहीं हरदम चलता ही रहता है।

दक्षिण में एनटी रामाराव की मौत के बाद तेलुगु देशम पार्टी भी टूटा। तमिलनाडु में जयललिता की मृत्यु के उपरांत एआईएडीएमके भी दो टुकड़ों में बंट गया। समाजवादी पार्टी में बाप-बेटा और चाचा-भतीजा की लड़ाई सतह पर आ गई। लालू यादव के जेल में रहने से उनके बेटों का झगड़ा पार्टी में आम हो गया।

यहां तक कि नवगठित राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी में भी बगावत हुआ। इसके कई नेता पार्टी नेतृत्व पर तानाशाही का आरोप लगाकर पार्टी से अलग हो गए। कुछ बीजेपी में शामिल हो गए, तो कइयों ने मिलकर योगेन्द्र यादव की अगुआई में स्वराज पार्टी का गठन कर लिया।

आशय यह कि आजादी के बाद से भारतीय राजनीतिक दलों में सैकड़ों टूट-फूट और अलगाव-विलगाव हुआ है। इससे कोई पार्टी अछूता नहीं है। बगावत की काली छाया सभी पार्टियों पर पड़ी है।

हालांकि किसी नेता का पार्टी के साथ बने रहना या पार्टी से विलग होना, उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन इससे जनभावना आहत होती है। लोकतंत्र का मखौल उड़ता है। बगावत में मनमुटाव, खरीद-फरोख्त, टकराव और रोमांच हो सकता है, किंतु नैतिकता और सिद्वांत कहीं नहीं दिखता।

सौ बात की एक बात, जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठता है, तब पार्टी के अंदरुनी लोकतात्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जनविश्वास का भट्ठा बैठता है। लोगों की धारणा यही बनती है कि जो पार्टी अपने लोगों की मनोभावनाओं और विचारों का सम्मान नहीं कर सकती, वह जनता की भावनाओं का क्या खाक ख्याल रखेगी?

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बुधवार, 15 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद-2




चीन की विस्तारवादी गतिविधि न केवल भारत, अपितु दुनिया को भी डराने लगा है। उसके ‘एडवांस्ड सोशलिस्ट कंट्री’ के ख्वाब से दुनिया भयग्रस्त है। वह अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए 2049 तक का समय निश्चित किया हुआ है। वह इस बीच सैन्य व आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका की चैधराहट को समाप्त कर देना चाहता है और स्वयं नंबर वन पर काबिज होना चाहता है।

बांग्लादेश पर निगाह

भारत को घेरने और डराने के लिहाज से जहां उसने पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान पर डोरे डाल रखा है, वहीं बांग्लादेश को भी अपने निवेशजाल में उलझा दिया है। वह बांग्लादेश में 2030 तक 100 स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए चीनी कंपनियां आंख मूंदकर निवेश करने के लिए कमर कसी हुई हैं।

भारत के पड़ोसी देशों को सहायता देकर उपकृत करना और भारत को परेशानी में डालना चीन की सोचीसमझी रणनीति का हिस्सा है। जिस बांग्लादेश का संबंध सदियों से भारत के साथ रहा हो, जो कभी अखंड भारत का हिस्सा रहा हो, उसके क्षेत्र में निवेश करना, भारत के लिए नई मुसीबतों का रोपण है। जिस बांग्लादेश के कारण भारत में घुसपैठियों की समस्या विकराल हो गई हो, उसका चीन की शरण में जाना भारत के लिए खतरे की घंटी है।

यही हाल नेपाल का हो गया है। वहां के पीएम श्रीमान ओली चीन की शह पर भारत विरोध का नारा बुलंद किए हुए है। वे कोई ऐसा मौका हाथ से गंवाना नहीं चाह रहे हैं, जिसमें भारत-नेपाल के सबंधों पर बुरा असर पड़ता हो। लगता है-वे पूरी तरह चीन के पिट्ठू बन गए हैं और चीन के इशारों पर नाच रहे हैं।

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

एक और परियोजना है, जिसे बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) कहा जाता है। इसका आरंभ 2013 में किया गया है। इसके अनुसार, 2049 तक संसार के करीब 70 मुल्कों में चीन आधारभूत संरचना का निर्माण करनेवाला है। इसमें एशिया व यूरोप में सड़कों व बंदरगाहों का जाल बिछाना भी लक्ष्य है, जिससे चीनी सामानों की आवाजाही सुगम हो सके।

इस मामले में दुनिया बंटी हुई है। यदि यह परियोजना पूरी हो गई, तो दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी इसमें समाहित हो जाएगी और 40 प्रतिशत व्यापार इसी रास्ते से होने लगेगा। कई देश चीन की इस वैश्विक परियोजना  के समर्थक हैं, तो कई विरोधी। समर्थक इसे दुनिया के लिए हितकर बता रहे हैं, तो विरोधक शातिर खेल।

दरअसल, बुनियादी सुविधाओं का निर्माण महज एक दिखावा है, इसका असल मकसद अपना एकाधिकार कायम करना है। भारत को डर है कि इस नव उपनिवेशवादी परियोजना से चीन भारत को धेरने में कामयाब हो जाएगा।

मेड-इन चाइना

चीनी सरकार ने इसकी लांचिंग 2015 में की है। इसका मकसद चीन को 2025 तक तकनालाजी हब बनाना है, जो तकनीकी के दम पर दुनिया को दहला सके। मेड-इन चाइना में एयरोस्पेस, टेलीकम्युनिकेशंस, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलाजी, इलेक्ट्रिक वाहन आदि क्षेत्रों में ऐसे कलपुर्जों का निर्माण शामिल करना है, जो दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। यह संभव हुआ, तो समझिए अमेरिका, रूस सहित तमाम यूरोपीय देशों के वैश्विक बाजारों का भट्ठा बैठ जाएगा।

पैटेंट का जुनून

मेड-इन चाइना को धरातल पर उतारने के लिए चीन ने पैटेंट कानून का जमकर दोहन किया है। वल्र्ड इंटेलिएक्चुअल प्रापर्टी आर्गनाइजेशन के मुताबिक, चीन अमेरिका को पीछे धकेलकर पैटेंट करवाने के मामले में दुनिया में अव्वल हो गया है। कारण यह कि वह नवीकरण व तकनीक पर एकाधिकारवाद प्राप्त करना चाहता है। इस मामले में उसकी संचार कंपनी हुवाई टेक्नोलाजिस सबसे आगे है, जिसे अब तक 3500 के आसपास पैटेंट मिल चुका है।

अंतरिक्ष में चीन

चीन अंतरिक्ष में भी ऊंची छलांग लगाकर दुनिया में दूसरे नंबर पर काबिज हो गया है। यूनियन आफ कंसर्न साइंटिस्ट द्वारा 31 मार्च 2020 को जारी आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका 1326, चीन 363, रूस 169, भारत 121 और अन्य 686 उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुके हैं।

इससे चीन के पड़ोसी देश-ताइवान और अन्य सहित अमेरिका आशंकित है। चीन इसका इस्तेमाल अपने शत्रु देशों की जासूसी के लिए कर सकता है। इस आशंका को इसलिए भी बल मिलता है, क्योंकि ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्टेªशन’ चीनी सेना का अनुभाग है। इसका प्रशासनिक तंत्र चीनी सेना के लिए न केवल काम करता है, अपितु यह उसके प्रति जवाबदेह भी है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस

चीन हर मामलों की भांति आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में भी बढ़त बनाए हुए है। उसका ऐलान है कि वह अभी इस मामले में 8.4 अरब डालर का निवेश कर रहा है, लेकिन 2030 तक वह इसमें 150 अरब डालर का निवेश करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा।

उपसंहार

आशय यह कि चीन की हर योजना और परियोजना डरानेवाली है। इससे न केवल अविकसित व अल्पविकसित देश भयभीत हैं, अपितु विकसित देश भी भयाक्रांत हैं। उसकी शातिर चालों से जहां पड़ोसी देशों के कान खड़े हो गए हैं, वहीं दूरस्थ देश व यूनाइटेड नेशंस तक में चर्चा गर्म हो गई है कि डेªगन के नवसाम्राज्यवाद को किस तरह काबू में किया जाए। देखना यही है कि दुनिया चीनी उपनिवेशवाद की रोकथाम के लिए कौन-सा और कैसा कदम उठाती है।
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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद

चीन का विस्तारवाद

17वीं-18वीं शताब्दी मे दुनिया के चतुर-चालाक कहे जानेवाले मुल्कों ने जिन देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकता का अभाव था; उनके सत्ता-केंद्रों पर ऐन-केन-प्रकारेण दबदबा कायम किया। उनपर कब्जा किया और उन्हें गुलाम बनाया।

उनके संसाधनों पर कब्जा जमाकर उनका दोहन किया। कई छोटे, मध्यम व गरीब देशों से सुरक्षा के नाम पर उनसे वार्षिक फिरौतियां और रंगदारियां वसूली।

21वीं शताब्दी में चीन इसी नक्शेकदम पर चल रहा है, लेकिन जरा दूजे तरीके से। एकतरफ वह 6 पड़ोसी देशों के 41,13,709 वर्ग किमी क्षेत्र को हथिया लिया है, वहीं दूसरी तरह कमजोर व लाचार देशों में निवेश को हथियार बनाकर उन्हें गुलाम बनाने की हरचंद कोशिश कर रहा है। उसके द्वारा इन देशों से हथियाया गया क्षेत्रफल उसके सकल क्षेत्रफल का लगभग 43 फीसदी हिस्सा हो गया है।

वह तिब्बत, मंगोलिया, ताइवान, हांगकांग, मकाऊ और पूर्वी तुर्किस्तान को अपने देश का हिस्सा बताकर या तो कब्जा कर लिया है या कब्जाने के प्रयास में सतत लगा हुआ है। वह भारत के लद्दाख-केंद्र शासित प्रदेश के सियाचिन को भी 1962 में हड़़प लिया है। अभी उसकी कुदृष्टि गलवान घाटी पर लगी हुई है।

सियाचिन के संबंध में उसका दावा है कि यह क्षेत्र उसी का है, जिसे गुलाम भारत में अंगे्रजों ने जीतकर भारत में मिला लिया था। यही नहीं, वह आएदिन भारत के अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम में घुसपैठ करवाता रहता है। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत दृष्टांत है।

यही कारण है कि भारत के शत्रु देश-पाकिस्तान को वह अपना दोस्त बना लिया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का बचाव कर दुनिया को धोखा देने का काम करते रहते हैं। यह नीति चोर-चोर मौसेरे भाई जैसा है। चीन पाकिस्तानी आतंकवाद के समर्थन में खड़ा हो जाता है, तो पाकिस्तान, चीन में होनेवाले उइगर मुसलमानों के अत्याचार पर चुप्पी साथ लेता है।

चीन, बरबादी की ओर अग्रसर पाकिस्तान में 2442 किमी लंबा इकोनामिक कारिडोर बना रहा है, जो चीन के झिंजियांग को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ता है। इससे तेल, गैस सहित तमाम जरूरी चीजों का यातायात चीन के लिए सुगम होता चला जाएगा।

इसके बदले में चीन पाकिस्तान को 3.45 लाख करोड़ रुपए देगा। चीन बदले में अपने 5 लाख नागरिकों को ग्वादर पोर्ट पर बसाएगा। वाह क्या साठगांठ है, जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस चुका है? लेकिन, पाकिस्तान है कि कश्मीर की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है।

ऐसा ही मायाजाल वह श्रीलंका पर भी फेंका है। वह हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर ले लिया है। वहीं, श्रीलंकाई हवाईअड्डों, थर्मल पावर केंद्रों सहित विशाल बांधों में 36 हजार करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है।

यह निवेश फोकट में न होकर मोटे ब्याज में है। इससे श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है। परिणामतः, चीनी कंपनियां वहां के संसाधनों पर मालिकाना हक जताने लगी हैं।

चीन छोटे-से देश भूटान, जिसे भूगोल की भाषा में बफरस्टेट कहा जाता है, उसकी पूर्वी सीमा पर अपना दावा ठोंका है। यह सीमा भारत के अरुणाचल प्रदेश से लगती है। यही नहीं, वह पश्चिम व मध्य क्षेत्र को भी विवाद में घसीट लिया है। इस सबंध में चीन-भूटान के मध्य कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है।

दक्षिणी चीन सागर को वह अपना सागर बताता है। वह सेनकाकू द्वीप पर अपना दावा ठोंककर जापान से उलझता रहता है। जाहिरातौर पर इस दावे से वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान और ब्रुनेई के क्षेत्र में अतिक्रमण होता है, तो वे भी अपनी फौज लेकर वहां पहुंच जाते हैं। फिलीपींस के साथ इनकी दुश्मनी जगजाहिर है।

यही नहीं, चीन ने कैरेबियाई व दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के गरीब देशों को अपने औपनिवेशिक मोहपाश में उलझा दिया है। इस क्षेत्र में उसके निवेश का एकमात्र कारण अमेरिका व यूरोपीय देशों के वर्चस्व को तोड़ना है और अपना धाक जमाना है।
समंकों ने अनुसार, उसने जहां 2005-10 के दरमियान 59 देशों में अपना पैसा लगाया है, वहीं 2011 से 2019 तक 66 राष्ट्रों को अपने विनिवैशिक पाश में फांस लिया है।

मौजूदा दौर में चीन की विस्तारवादी नीति जमीन हड़पने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह छोटे-छोटे देशों की आर्थिक गतिविधियों को हथियार बनाकर उनके अर्थतंत्र को प्रभावित करने भी है। संसाधनों पर मालिकाना हक हासिल करने की है।

इन्हीं सब परिस्थितियों से परेशान होकर विश्व के 27 मुल्कों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में जाने का निश्चय किया है। इस मुद्दे पर यूएन महासभा में अनौपचारिक बहस भी हुई है, जिसकी अगुवाई अमेरिका और ब्रिटेन ने की है।

यह तय है कि भारत, चीन से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो चुका है। एक तो जमीन कब्जाने और निवेश कर फांसने की उसकी कुटिल नीति और दूसरे कोरोनावायरस से उत्पन्न तबाही से सारा विश्व उसके खिलाफ हो गया है। केवल पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को छोड़कर समूची दुनिया भारत को समर्थन देने और उसके साथ मिलकर चीन को सबक सिखाने के लिए आमादा है।

इन्हीं परिस्थितियों के दृष्टिगत भारतीय प्रधानमंत्री ने लद्दाख के 11 हजार फीट ऊंचे सैन्य ठिकाने नीमू में थलसेना, आईटीबीपी और वायुसेना के जवानों से मेल-मुलाकात कर सिंहनाद किया है,‘‘भारतीय सेना ने पराक्रम की पराकाष्ठा दिखाई है। अपनी वीरता से पूरी दुनिया को भारत की ताकत का संदेश दिया है। इतिहास गवाह है कि विस्तारवादी ताकतें मिट जाती हैं। विकासवाद जिंदा रहता है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लोग बांसुरीधारी कृष्ण को भी पूजते हैं और सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण को भी पूजते हैं। भारत शांति चाहता है, लेकिन मातृभूमि की रक्षा के लिए हमारा संकल्प हिमालय से भी ऊंचा है। लेह, करगिल और सियाचिन तक बर्फीली चोटियों से लेकर गलवान की ठंडे पानी की धारा तक; हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा, हर कंकड़-पत्थर भारतीय वीरों की पराक्रम की गाथा सुना रही है।

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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से amazon.com /virendra Dewangan से सर्च किया जा सकता है।

बुधवार, 1 जुलाई 2020

चीनी सामान का बहिष्कार

   चीनी सामान का बहिष्कार
     

         प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा देश में बने उत्पाद खरीदने के लिए आमजन से  अपील की गई है। इसके महज एक दिन पश्चात् केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी ऐलान किया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के सभी कैंटीन में 10 लाख जवानों के लिए 1 जून से सिर्फ स्वदेशी उत्पाद बिकेंगे।
उन्होंने इस बाबत देश की जनता से भी अपील की है कि आप देश में निर्मित उत्पाद ही ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल करें।

गौरतलब है कि सीएपीएफ में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल, नेशनल सिक्योरिटी गाड्र्स शामिल हैं। इन बलों की कैंटीन से 2800 करोड़ रुपया का सामान खरीदा जाता है।

स्वदेशी पर महात्मा गांधी के विचार

         महात्मा गांधी स्वदेशी के हिमायती थे। उन्होंने आजादी के संघर्ष के दौरान स्वदेशी आंदोलन चलाया। स्वदेशी पर उनका विचार इस प्रकार है,‘‘स्वदेशी की भावना हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती गांव, शहर व प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। हमें अपने पड़ोसियों और स्थानीयों के द्वारा बनाई गई वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए। इससे भारत का हर गांव और शहर एक स्व-आश्रित व स्वयं में पूर्ण इकाई बन जाएगा।

शिक्षाविद और इनोवेटर सोनम वांगचुक की मुहिम

          भारत-चीन टकराव के मध्य शिक्षाविद और इनोवेटर सोनम वांगचुक ने चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान आरंभ किया है। उन्होंने चीन को सबक सिखाने और उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर करने के लिए एक मुहिम छेड़ी है।

        उनका कहना है,‘‘अभी हम निर्माण, हार्डवेयर, दवा, मेडिकल उपकरण, चप्पल-जूते और इलेक्ट्रानिक्स व इलेक्ट्रिकल चीजों के लिए चीन पर निर्भर हैं। हमारे देश में इन सामानों का उत्पादन महंगा होता है, लेकिन चीनी सामान सस्ता मिलता है। यहीं देश की जनता को समझना होगा कि इन सामानों को बेचकर चीन अस्त्र-शस्त्र बनाता है और हमारे खिलाफ ही इस्तेमाल करता है। इसलिए हमें चीनी सामान का बायकाट क्रमबद्ध तरीके से करने की जरूरत है।’’


उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया, ‘‘जैनधर्मी लहसुन-प्याज व मीट-मटन नहीं खाते। वे प्रतिबद्ध हैं कि चाहे कुछ हो जाए, वे इसका सेवन नहीं करेंगे। नतीजतन, इसका असर बाजार पर पड़ा। ऐसे भोजनालय आरंभ हुए, जो शुद्ध शाकाहारी हैं। बदलती मांग ने नया बाजार विकसित किया। जिस तरह जैनियों के लिए जैन फूड बनाया जाता है, उसी तरह चीन पर निर्भरता खत्म करने के लिए गैरचायनीज बाजार खड़ा करना होगा।’’

मेड-इन-इंडिया मुहिम

       यह सत्य है कि चीन की कमर तोड़ने के लिए हमें स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करना चाहिए। मेड-इन चायना का बहिष्कार कर मेड-इन इंडिया को अपनाना होगा। भारत, चीन से हर साल 4.40 लाख करोड़ का सामान खरीदता है और 1.10 लाख करोड़ का सामान चीन भेजता है। इसलिए यह जरूरी है कि आयात घटाया जाए और निर्यात बढ़ाया जाए।

        यही नहीं, सरकार चीनी उत्पादों पर ड्यूटी बढ़ाता है, तो 1 लाख करोड़ का लाभ होता है। केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने लोगों से जहां चीनी सामान के बहिष्कार की अपील की है, वहीं चीनी उत्पादों पर बीआईएस के गुणवत्ता नियम सख्ती से लागू करने की बात कही है।


गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद 7 करोड़ दुकानदारों के संगठन कैट ने मुहिम आरंभ किया है-भारतीय सामान-हमारा अभियान। कैट ने चीनी सामानों की करोल बाग में होली जलाई है। कैट ने भारतीय अभिनेताओं और खिलाड़ियों से अपील की है कि वे चीनी सामान का विज्ञापन न करें।


       प्रधानमंत्री ने भी अपील की है कि व्यापारी हौसला बुलंद रखकर आत्मनिर्भर अभियान की अगुवाई करें। वहीं भारतीय रेलवे ने चीनी कंपनी का 471 करोड़ का ठेका और पार्ट लेने का करार रद्द कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने भी भविष्य में चीनी कंपनियों के साथ कोई समझौता नहीं करने को कहा है।


      उधर केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवाले ने कहा है कि चीन धोखेबाज देश है। भारत में चायनीज फूड बेचनेवाले सभी रेस्टोरेंट और होटल बंद कर दिए जाने चाहिए।


       इधर महाराष्ट्र सरकार ने 5020 करोड़ के तीन बड़े समझौते रोक दिए है, जो उन्होंने चीनी कंपनियों के साथ किए थे। गोवा सरकार का भी ऐसा ही संकेत है।

राज्यों में चीनी घुसपैठ      

       भारत के राज्य सरकारों तक में चीनी कंपनियों की घुसपैठ है। इनमें गुजरात राज्य चीनी निवेश के मामले में अग्रणी है, जहां 28 हजार करोड़ का निवेश हुआ है। इसके अलावा हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश में चीनी कंपनियां छाई हुई हैं। यही नहीं, ई-कामर्स, मीडिया/सोशल मीडिया और लाजिस्टिक क्षेत्र की 75 से ज्यादा कंपनियों में चीनी निवेश है। आशय यह कि स्टार्टअप की 60 प्रतिशत से अधिक कंपनियों में चीनियों का पैसा बोल रहा है।

चीन का व्यापार        

         भारतीय वाणिज्यिक मंत्रालय के अनुसार, चीन भारत को स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिकल उपकरण, खाद, आटो पार्ट, स्टील उत्पाद, टेलीकाम उपकरण, मेट्रो रेल कोच, लोहा, फार्मास्युटिकल सामग्री, केमिकल, बच्चों के खिलौने, घरेलू उपकरण, पटाखे, फुलझड़ियां, ईश्वरों की मूर्तियां, मच्छर मारने का इलेक्ट्रानिक रैकेट आदि-इत्यादि सामान कम दर पर बेचता है। यह आयात सकल भारतीय आयात का 14 प्रतिशत है।

       यही नहीं, उसने 150 से अधिक मुल्कों को कर्ज में जकड़ रखा है। इन मुल्कों को उनके द्वारा दिया गया कर्ज डायरेक्ट लोन और टेªड क्रेडिट के रूप में करीब 112.50 लाख करोड़ रुपए का है।


         यह वैश्विक जीडीपी का 5 प्रतिशत के बराबर है, जो विश्वबैंक व मुद्राकोष से भी बड़ा कर्जदाता है। भारत में भी चीन का निवेश और प्रोजेक्ट 26 अरब डालर के आसपास है।



चीन की नीयत खोटी       

       चीन का तमाम पड़ोसी देशों से सीमा-विवाद है। जापान, फिलिपींस, वियतनाम, ताइवान, तिब्बत, नेपाल, मलेशिया यहां तक कि रूस उसके विस्तारवादी कुनीति से परेशान हैं। वह एक साम्राज्यवादी देश है, जिसकी कुदृष्टि हमेशा अपने पड़ोसियों पर लगी रहती है।

       यही नहीं, वह दुनियाभर में अपने सैनिक अड्डे बना रखा है। विश्व के तमाम देशों का यही आरोप है कि कोरोनावायरस का जनक वही है। अमेरिकी राष्ट्रपति तक ने उसपर खुलेआम आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं, वुहान की लैब से निकला चीनी वायरस है।


       इतना ही नहीं, वह भारत को नीचा दिखाने के लिए पाकप्रायोजित आतंकवादियों तक का समर्थन करता है और सुरक्षा परिषद में अन्य देशों के द्वारा आतंकियों के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर बारबार वीटो करता रहता है।
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सोमवार, 22 जून 2020

चीन की चालबाजी

चीन की चालबाजी
कोरोनाकाल में भी अपनेआप को मजबूत देश और अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ताकतवर नेता दर्शाने के लिए चीनी सैनिकों ने उस गलवान घाटी पर भारतीय सैनिकों से हिंसक झड़प किया, जहां 1962 में जंग की शुरूआत की गई थी।

हिंसक झड़प में 15 जून 2020 की रात जहां 43 चीनी सैनिक मौत को प्राप्त हुए, वहीं एक कर्नल, एक सूबेदार, एक नायक, दो नायब सूबेदार, तीन हवलदार सहित 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए।

इनमें-से कईयों की शादी अभी-अभी हुई थी। कईयों के मां-बाप बूढ़े हैं। कईयों के बच्चे हैरानी से देख रहे हैं कि उसके पापा को क्या हो गया, जो ताबूत में कैद हैं, उठ नहीं रहे हैं? इस साजिशन हमले में 76 जवान घायल हो गए हैं। 18 जवानों की चोटें गंभीर हैं, तो 58 जवानों को हल्की चोटें आई हैं।

गलवान घाटी समुद्रतल से करीब 15 हजार फीट ऊंचाई पर है, जहां भरी गरमी में भी दिन का तापमान जीरो डिग्री सेल्सियस से कम रहता है। कहा जाता है कि 15 जून को चीनी राष्ट्रपति-शी जिनपिंग का जन्मदिन था। उधर चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी जश्न मना रही थी, इधर चीनी सेना दरिंदगी पर उतारू थी।
1962 की जंग के 58 साल बाद यह पहला अवसर है, जिसमें गलवान क्षेत्र में हिंसात्मक नोंकझोंक, झड़पें, छड़बाजी-लोहे के राड से हमला और पत्थरबाजी हुई, जिसमें दोनों ओर के सैनिक हताहत हुए।

सूत्रों के अनुसार, यहां गोली एक भी नहीं चली, परंतु झड़पें खूनी संघर्ष में बदल गईं। खूनी हाथापाई व धक्कामुक्की घाटी की चोटी पर हुआ, इसलिए 4 जवान गलवान नदी में गिर पड़े, जिनकी जान बर्फानी ठंड की वजह से चली गई। गौरतलब है कि गलवान क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के चुसूल काउंसिल के अंतर्गत आता है। यहां आटोनामस हिल डेवलपमेंट काउंसिल कार्यरत है।


झड़पों का इतिहास

इसके पूर्व 2017 में अरुणाचल प्रदेश के चीनी सीमा पर डोकलाम में गतिरोध उत्पन्न हुआ था। भारतीय सेना ने चीनी सड़क बनाने की कोशिशों का जमकर विरोध किया था। यह विवाद 73 दिनों तक चला था।

2018 में चीनी सैनिकों ने डेमचोक सेक्टर-लद्दाख के अंदर 300 मीटर दूर टेंट का निर्माण किया था। इससे विवाद और टकराव बढ़ गया था।

9 मई 2020 को 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित नाकू-ला में भारत-चीन के 150 सैनिक आमने-सामने आ गए थे। इसमें मुक्केबाजी, खींचतान, धक्कामुक्की और घूसाघूसी हुई थी, जिसमें 10 फौजी आहत हो गए थे।

5 मई 2020 को पेंगोंग त्सो झील-लद्दाख के उत्तरी किनारे पर फिंगर-5 इलाके में भारत-चीन के लगभग 200 सैन्यबल एक-दूसरे के सामने आ गए। यहां भी मामूली झड़पें और धक्कामुक्की हुई।

2020 में करीब माहभर से अधिक समय से होनेवाली झड़पों को सुलझाने के लिए 6 जून, 10 जून और 12 जून को कोर कमांडर और लेफ्टिनेंट जनरल स्तरीय वार्ताएं हुईं, जिसमें यथास्थिति बहाल करने और अपने-अपने सैनिकों को वापस अपने बैरकों में बुलाने पर सहमति बनी थी।

सैनिकों को मौजूदा हालात से 2-3 किमी पीछे हटना था। किंतु, पैतरेबाज चीन बाज नहीं आया। वार्ता को अमलीजामा पहनाने की हिदायत पर बड़ी हिंसक वारदात को अंजाम दे बैठा।




वास्तविक नियंत्रण रेखा

भारत और चीन के मध्य 3,488 किमी की वास्तविक नियंत्रण रेखा-एलएसी है। यह तीन सेक्टरों में विभाजित है। पहला वेस्टर्न सेक्टर, जो लद्दाख में है। दूसरा मिडिल सेक्टर, जो उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में है। तीसरा, ईस्टर्न सेक्टर, जो अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में है।

गलवान घाटी गलवां नदी से निर्मित है। यह चीन के दक्षिणी शिनजियांग से लेकर भारत के केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख तक विस्तृत है। यह वही गलवां घाटी है, जो अक्साई चिन में है और भारत का क्षेत्र है, लेकिन चीन इसे 1962 के समर के बाद हड़प लिया है। इसे ही वास्तविक नियंत्रण रेखा माना गया है, जो अक्साई चिन को भारत से अलग करता है।

खूनी संघर्ष के बावजूद उधर चीनी विदेशमंत्री बयान जारी कर धोखेबाजी कर रहा है,‘‘चीन बातचीत से विवाद सुलझाने का पक्षधर है। वह शांति बनाने और तनाव घटाने के सभी कदम उठाएगा।’’ इधर चीनी सेना का एक कर्नल अपनी कुटिल मंशा को जाहिर कर रहा है,‘‘गलवान घाटी क्षेत्र पर संप्रभुता हमेशा चीन के पास रही है।’’

वहीं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है,‘‘भारत शांति चाहता है, लेकिन उकसाने पर हर हाल में यथोचित जवाब देने में सक्षम है। देश को शहीदों पर गर्व रहेगा कि वे मारते-मारते मरे हैं। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने से कोई हमें रोक नहीं सकता। भारत पूरी दृढ़ता से देश की एक-एक इंच जमीन और स्वाभिमान की रक्षा करेगा।’’




खूनी संघर्ष का कारण

1. गलवान नदी से सटे अक्साई चिन पर चीन का बेजा कब्जा है। भारतीय सैनिक गलवान नदी में नौका से गश्त करते हैं, लेकिन चीन को यह खटकता है।

2. खूनी संघर्ष का प्रधान कारण 273 किमी की वह सड़क है, जिसे भारत अपने सीमाक्षेत्र-पूर्वी लद्दाख में अपने सैनिकों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए करीब 15 साल से बना रहा है। जो लाईन आफ एक्चुअल कंट्रोल के समानांतर बनाई जा रही है।

3. करीब 15 साल से निर्माणाधीन यह महत्वाकांक्षी सड़क सरहद के अंतिम गांव दरबूक-श्योक से दौलतबेग ओल्डी तक पूर्णता की ओर है। इस सड़क पर गलवान घाटी में निर्माणाधीन हिस्से पर चीन को परेशानी है। यही विवाद की मुख्य वजह है।

4. सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी काराकोरम रेंज का हिस्सा है। काराकोरम रेंज में नियंत्रण मजबूत करने के लिए दौलत बेग ओल्डी पर होल्ड बढ़ाना भारत के सड़क निर्माण का मकसद है। लद्दाख की राजधानी-शहर लेह से दरबूक तक पहले से सड़क है।

5. भारतीय सेना चाहती है कि यहां कम-से-कम एक ब्रिगेड का सेक्टर तैनात हो, जिनकी निर्बाध आवाजाही सड़क बनाने से ही संभव है। चीन यही नहीं चाहता। इसी से वह बौखलाया हुआ है।

6. वर्तमान में यहां लद्दाख स्काउट्स और इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस के जवान तैनात हैं।



सड़क की आवश्यकता

निर्माणाधीन यह सड़क सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चूंकि दौलत बेग ओल्डी, जिसे सैन्यभाषा में सब-सेक्टर-नार्थ कहते हैं, यह लद्दाख का उत्तरी कोना है, जो एलएसी से 10 किमी से भी कम दूरी पर है, इससे भारत पूरे इलाके में आसान नजर रख सकता है।

दौलत बेग ओल्डी संसार का सबसे ऊंचा एयरबेस है, जो 13 हजार फीट की ऊंचाई पर है। यहां जहाजों के लिए ईधन, उपकरण और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हमेशा हवाई यातायात से संभव नहीं है। इसलिए सड़क बनाना नितांत आवश्यक है।

इस सड़क का निर्माण बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन द्वारा किया जा रहा है। इसमें आधुनिकतम शैली में पुल-पुलिया निर्मित है, इसलिए बारोंमास यातायात के लिए सुलभ व सुविधाजनक है। यही रोड पहले श्योक नदी में पुल के अभाव में यातायात के लिए सुलभ नहीं था।

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सोमवार, 15 जून 2020

कोरोना से सबक

कोरोना से सबक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना कहर के बीच सरपंचों के साथ वीडियो-कांफ्रेंसिंग में गत दिवस कहा है कि ‘‘कोरोना ने कई मुसीबतें पैदा की है। लेकिन, इसका सबसे बड़ा सबक है कि हमें अत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। गांव, जिला, राज्य और देश अपने स्तर पर मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर बने। यह जरूरी हो गया है कि जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरों का मुंह न देखना पड़े।’’ 


       उन्होंने आसन्न संकट से बचने के लिए फिर मंत्र दोहराया, ‘‘दो गज देह की दूरी, संगरोध, बच्चों व वृद्धों का एकांतवास, बारबार साबुन से हाथ धोना, सेनिटाइजेशन करना और मुखौटा धारण करना।’’ के नियमों का पालन तब तक करना चाहिए, जब कोरोना वायरस से पूर्णतया मुक्ति नहीं मिल जाती।
इसी तरह की बात डब्ल्यूएचओ के मलेरियारोधी कमेटी प्रमुख प्रो. मार्सेल टेनर ने कही है,‘‘भारत में जनसंख्या धनत्व बहुत ज्यादा है। यहां कामगार एक राज्य से दूसरे राज्य आते-जाते हैं। ऐसा ही यूरोप में होता है। यूरोपीय देश सोच, व्यवहार और चिंतन में खुद को चीन और दक्षिण कोरिया की तुलना में भारत को अपने करीब पाते हैं। ऐसे में लाकडाउन के बाद भारत अपने लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक हितों को कैसे नियंत्रित करता है, यह प्रबंधन दुनिया के लिए एक सबक हो सकता है?’’



        दुनियाभर में कोरोना का कहर जारी है। कोरोना ने उन मुल्कों की हालत ज्यादा खराब कर दी है, जिन्हें सुविधासंपन्न समझा जाता था। फिर चाहे वह अमेरिका, इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, रूस, चीन या ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड ही क्यों न हो। सारी दुनिया इन देशों की स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और संपन्नता से आकर्षित होकर वहां जाना, रहना, काम करना और बसना चाहती थी।

        भारत सहित दुनियाभर के लोग वहां पढ़ने, जाब करने और इलाज कराने के लिए लालायित रहते थे। लेकिन, कोरोना वायरस ने इन देशों की पोलपट्टी खोलकर रख दी है। लोगों की धारणाओं को बदलकर रख दिया है।
        यूएन के महासचिव एंटोनियो गुतेरेस ने कोरोना महामारी को दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के लिए सबसे बड़ा संकट करार दिया है। उन्होंने कहा है कि कोरोना से ऐसी मंदी आनेवाली है, जैसी हाल के दिनों में कभी नहीं आई है। 

        येे देश  दौलतमंद जरूर हैं, लेकिन इनके पास न संस्कार, संस्कृति है, न आस्था, पारिवारिकता व सामाजिकता है, जो दुनिया के संस्कारवान व संस्कृतिवान अविकसित मुल्कों के पास है।


इटली आदि धनी मुल्कों में कोरोना से लड़ने के जब संसाधन कम पड़ने लग गए, तब वहां की सरकारों ने बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़कर युवाओं का सुध लेना आरंभ किया था।

        यहां तक कि कोरोना से मृत व्यक्तियों के बीच वृद्धों को मरने के लिए यूं ही छोड़ दिया गया था। यह कैसा संस्कार है, जो वृद्धों को असहाय और अशक्त जानकर उन्हें मरने के लिए यूं छोड़ दिया जाता है?
जबकि भारत आदि संस्कारी मुल्कों में वृद्धों को भी उतना ही तवज्जो दिया जाता है, जितना कि एक जवान को। यहां वृद्ध और जवान में भेदभाव नहीं किया जाता है, बल्कि वृद्धों, महिलाओं व बच्चों को सदैव प्राथमिकता में रखा गया है।

कोरोना के संकट के दृष्टिगत उससे सबक इस प्रकार लिया जा सकता है।

1. सुरसा के मंुह की तरह बढ़ती जनसंख्या को गंभीरता से नियंत्रित करना सबकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि बढ़ती जनसंख्या न केवल सभी समस्याओं की जननी है, अपितु कोरोना जैसी महामारी के दरमियान जनसंख्या का घनत्व विकराल समस्या के रूप में सामने आकर चुनौतियां पेश कर रहा है।

2. इसके लिए प्रत्येक भारतीय परिवार के लिए ‘हम दो, व हमारे दो’ की नीति को पूर्ण संजीदगी व कठोरता से लागू करना-करवाना ही एकमात्र उपाय होना चाहिए। एक बच्चे वाले परिवारों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए.

3. गरीबी और बेरोजगारी को भी हरहाल में समाप्त करना चाहिए। गरीबी दूर करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता में रखना होगा। गरीबों को कामधंधे से लगाने के लिए ठोस योजनाएं बनानी व चलानी होगी। योजनाएं ऐसी होनी चाहिए, जो न केवल गरीबी का उल्मूलन करे, अपितु बेकारी का भी शमन करे।

4. शिक्षा की योजनाओं को विस्तारित करना होगा। नए-नए स्कूल-कालेज खोलने होंगे। उनमें साधन-सुविधाएं एवं शिक्षक व स्टाफ की व्यापक पैमाने पर भर्ती करनी होगी।

5. वर्क फ्राम होमः जब कोरोनाकाल में सरकार, कंपनियां और अन्य संस्थान वर्क फ्राम होम से काम चला सकती हैं और उसमें सफल भी हो सकती हैं, तो इस कार्य-संस्कृति को परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में भी अपनाया जाना चाहिए। इससे जहां सड़कों पर भीड़-भाड़ कम होकर प्रदूषण न्यूनतम रहेगा, वहीं दुर्घटनाओं में खासी कमी आएगी।

6. सरकार को राष्ट्रीय विपदा के दरमियान निजी स्वास्थ्य सेवाओं सहित उन समस्त सेवाओं व संस्थानों का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए, जो राष्ट्रीय आपदा के दरमियान मददगार साबित हो सकते हैं।

7. पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। उसको दैवीय व मानवीय आपदाओं से लड़ने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। इसके प्रशासनिक सुधार और पुलिस सुधार को अमलीजामा पहनाने की जरूरत है।

8. विपदा के कठिन वक्त में पुलिस व फौज को पूरा अधिकार देना चाहिए, ताकि वे निष्पक्षता व निर्भीकता से अपने काम को अंजाम दे सकें। उनपर राजनीतिक हस्तक्षेप कतई बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।

9. अभी देश में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 151 पुलिसकर्मी हैं, जो अपर्याप्त है। इस संख्या को हर हाल में नई भर्ती कर बढ़ाया जाना चाहिए। इससे जहां बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, वहीं पुलिस को आपदा से निपटने में बल मिलेगा।

10. वर्तमान में देश में प्रति 1 लाख आबादी पर 10 डाक्टर हैं, जो अत्यल्प है। देश में एक ओर डाक्टरों की कमी से एक बड़ी आबादी इलाज से वंचित रह जाती है, वहीं एमबीबीएस पास नौजवान बेकारी से परेशान रहते हैं। इसी तरह स्वास्थ्यकर्मियों व तकनीशियनों का भी युद्धस्तर पर नियुक्ति की जानी चाहिए।

11. पूजा व इबादत स्थलों के प्रवेश-निषेध पर नए कानून बनाने की आवश्यकता है, ताकि लोग धर्म के बजाय राष्ट्र को प्राथमिकता में रखें और कोई धार्मिक अनुष्ठान व क्रियाकलाप करने के पूर्व राष्ट्र के नियमों व अधिनियमों का पालन अक्षरशः करना सीखें।

12. धर्म की आढ़ में संवैधानिक कायदे-कानून का उल्लंधन ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और ऐसे बंदों को देशनिकाला या कड़ी-से-कड़ा सजा दिया जाना चाहिए।

13. देश में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, जलसे, समारोह के आयोजन के लिए कड़े कायदे-कानून बनाना चाहिए और उसे संजीदगी से पालन करवाना चाहिए।

14. स्वच्छता और साफ-सफाई को अभियान के रूप में चलाया जाना चाहिए। नालियों, तालाबों, नदी-नालों की सफाई नियमित की जानी चाहिए। जलस्त्रोतों के रखरखाव का विशेष प्रबंध किया जाना चाहिए।

15. अपनी पूरी ताकत से कोरोना के खिलाफ संग्राम कर रहे स्वयंसेवी संस्थाओं को चिंहित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें भी बीमा संरक्षण देना चाहिए।

16. चीन जैसे चालबाज देशों को छोड़कर अन्य देशों के निवेशकों को भारत में पूंजी-निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहिए और अधिकाधिक उद्योग-धंधे स्थापित कर बेरोजगारों को रोजगार देना चाहिए।

17. जो लोग या संस्था आपदा कानून का पालन नहीं करते हैं और देश को खतरे में डालते हैं, उनके खिलाफ रासुका के तहत कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए।



18. एक राज्य से दूसरे राज्य में श्रमिक के रूप में प्रवास करनेवाले श्रमवीरों का दोनों राज्यों में पंजीयन किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों की वास्तविक जानकारी केंद्र व राज्य के पास रहे, जिससे योजनाओं में उनको सबसे पहले लाभ दिया जा सके।

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सोमवार, 1 जून 2020

महापलायन से सवाल

                                                           

देशभर के गांवों, कस्बों व छोटे शहरों से बड़े शहरों में कामकाज और दिहाड़ी करने के वास्ते करीब 10 करोड़ लोग जाते-आते हैं। इनमें से ज्यादातर, सीलबट्टा बनाने, कूली-मजूरी करने, फुटपाथ पर रेहड़ी लगाने, पटरी पर छोटे-मोटे सामान बेचने, धनकुबेरों के यहां झाडू-पोछा-बरतन, माली का काम करने व खाना बनाने का काम करते हैं।


        वहीं, कई मुफलिस दुकानों में सामान बेचने, ईंट बनाने, भवनों का निर्माण करने, रिक्शा व तांगा चलाने, बागवानी व खेती में काम करने, फार्म हाऊसों की देखरेख करने, आटो, रिक्शा व ई-रिक्शा चलाने, गन्ने व फलों का जूस बेचने, मनिहारी का सामान बेचने, फेरी लगाने, पेपर बेचने और छोटे-मोटे अन्य कार्यों में लगे रहते हैं। इन्हें रोज कमाने और रोज खानेवालांे में शुमार किया जाता है।

         लाकडाउन का एकाएक एलान होना और यात्री परिवहन के संसाधनों का सहसा बंद हो जाना इनके लिए कोढ़ में खाज साबित हो गया। एक ओर कुंआ, दूसरी ओर खाई बन गया। इन्हें जब परिवहन के साधन की अनुलब्धता दिखी, तो वे मरते क्या न करते, अपने-अपने घरों की ओर पैदल, सायकिल, ट्रक और अन्य साधनों से निकल पड़े।

         ये लोग दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बैंगलुरु, अहमदाबाद, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद, लखनऊ आदि तमाम बड़े नगरों-शहरों में जाकर दिन में काम करते हैं और रात को किसी फुटपाथ, पुल के नीचे, टेंट में या किसी सूने भवन में रात गुजारते हैं या किराये के एक कमरे में रहते हैं।

          जब लाकडाउन हुआ, इनकी रोजी-रोटी छिन गया। संस्थाओं और व्यक्तियों ने इन्हें काम से निकाल दिया। दुकान और कामधाम बंद हो गया, तो ये स्वभावतः बेरोजगार हो गए। गरीब तबके के ये लोग जो कुछ बचा कर रखे थे, कुछ दिनों के खाने-पीने में लगा दिए।

          शासकों और प्रशासकों ने इनपर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए था। काल सेंटरों से कोई रिस्पांस नहीं मिला। वे या तो नाट रिस्पांस पाए गए या इतना बिजी कि कोई उनको रिस्पांस करने के लिए दिन-दिनभर खाली नहीं मिला।

         यद्यपि सरकारों व स्वयंसेवी संस्थानों ने इनके लिए भोजन-पानी और रहने का प्रबंध किया, तथापि वे अपर्याप्त थे। लिहाजा, ये भूखे-प्यासे पैदल चल पड़े। कोई 1200 किमी की यात्रा तय किया, तो कोई 1000, 800, 500, 400, 200 व 100 किमी की यात्रा कर घर पहुंचने के लिए विवश हुआ।

         इनमें कइयों ने रास्ते पर दम तोड़ दिया। इसमें सर्वाधिक लोग यूपी, बिहार, झारखंड, मप्र व छत्तीसगढ़ के हैं, जो दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, मप्र आदि राज्यों में दिहाड़ी पर काम करते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल में दिखी, जहां 20 हजार से ज्यादा लोग बस पकड़ने के लिए पहुंच गए। बसवाले इनकी मजबूरी का बेजा फायदा उठाकर औने-पौने दाम वसूले।

        यही आलम द्वितीय लाकडाउन के ऐलान के बाद 14-15 अपै्रल के दरमियानी दिन में मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन, गुजरात के सूरत, पश्चिमी बंगाल के मुर्शिदाबाद में देखने को मिला।

         सरकारें फखत घोषणा करती रही कि इनके लिए रैन बसेरों और भोजन का प्रबंध किया गया है, लेकिन इंतजाम मिथ्या साबित हुआ। ऐसे मजलूमों से क्या सोशल डिस्टेंसिंग की नीति का पालन करवाया जा सकता था, जो भूखे-प्यासे हों?

       केंद्र सरकार को 24 मार्च को लाकडाउन करना जरूरी ही था, तो कम-से-कम तीन दिन पहले ऐलान करना चाहिए था कि देश में कोरोना संकट के कारण लाकडाउन किया जा सकता है। परिवहन के संसाधन बंद हो सकते हैं। जिस किसी को अपना घर जाना हो या कहीं सुरक्षित ठिकाना तलाशना हो, वहां वे 23 मार्च की रात तक पहुंच जाएं। इससे जहां अफरातफरी नहीं मचती, लोग भूख-प्यास से बच जाते, वहीं लाकडाउन का असल मकसद पूरा हो जाता।

        क्या नीति-नियंताओं को यह नहीं पता था कि देश में 21 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं? उन्हें दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है। ये गांव की गंदीबस्तियों, जंगलों, कंदराओं व नगरों-शहरों की झुग्गीझोपड़ियों में रहते हैं।

       देश में लगभग 10 करोड़ से अधिक लोग बेरोजगारी के चक्रब्यूह में उलझकर दिहाड़ी व हफ्तावारी मजदूरी करने और पलायन करने के लिए लाचार हैं। यह ऐसी आबादी है, जो ज्यादातर अशिक्षित, अल्पशिक्षित व असंगठित हैं। सरकार को इसकी सम्यक जानकारी रखनी चाहिए थी, फिर लाकडाउन का ऐलान किया जाना था।

      लाकडाउन 3 के बाद तो यह महापलायन ़त्रासदी में बदल गया। संभवतः ऐसा ह्दयविदारक दृश्य भारत-विभाजन के दरमियान भी नहीं देखा गया। मजबूरों का कारवां इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि देश सन्न रह गया। गाड़ी-मोटर के अभाव में नेशनल हाईवे में लोगों को 1200-1000 किमी से अधिक पैदल व सायकिल से चलना पडा।

      पैरों में छाले पड़ गए। छालों के दर्द से बच्चे, बूढे़ व जवान बिलख पड़े। रास्ते में चप्पल टूटने से 40-45 डिग्री तापमान में डामर व सीमेंट कांक्रीट की सड़कों पर पैदल चलना कितना कष्टकर हो सकता है, यह भुक्तभोगी ही बता सकता है। कोई अपने बच्चे को कंधे पर बिठाकर, पीठ पर बांधकर और सामान को सिर पर लादकर चला, तो कोई बच्चे को सूटकेस में सुलाकर।

हादसे-दर-हादसे

औरंगाबाद में 16 लोग रेलपटरी में सोते हुए मालगाड़ी की चपेट में आ गए। कइयों को बसों ने रौंद डाला। उप्र के चंदौली में पटरी पर सो रहे तीन महिला समेत चार श्रमिक स्पेशल टेªन से कटकर दम तोड़ दिए।

बिहार के पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून सादातपुर में लखनऊ-मुजफ्फरपुर हाईवे किनारे इसलिए रोते-बिलखती रही, क्योंकि उसके पति को एक ट्रक ने ठोकर मारकर उसका एक पैर तोड़ दिया था।

मुसाफिरों को दिल का दौरा पड़ गया। भूखे-प्यासे दम तोड़ दिए। कई परिवार एक रोटी को चार-चार टुकड़े कर खाते दिखे। बच्चों को दूध तो क्या, पानी तक नसीब नहीं हुआ? यह श्रमिकवर्ग का भीषण जद्दोजहद व त्रासदी था, जिसे देख, सुन व पढ़कर रूह कांप उठी।

औरैया में हाईवे किनारे खड़े ट्रक को चूने से भरे दूसरे ट्रक ने ठोकर मारी और स्वयं पलट गया। इसमें सवार 100 श्रमवीरों में-से 24 काल-कवलित हो गए। ये श्रमिक झारखंड, बिहार व प. बंगाल के थे।

मप्र के छतरपुर में सागर-कानपुर हाईवे पर कपड़े के लट्ठों से भरी लारी के पलट जाने से 6 श्रमिकों का देहांत हो गया। ये श्रममूर्ति महाराष्ट्र से यूपी के लिए रवानगी लिये थे। इस दर्दनाक हादसे में लारी में सवार यूपी की गुड़िया की मौके पर मृत्यु हो गई। 5 साल की बेटी आलिया गंभीर रूप से आहत है। 2 साल का मासूम पुत्र अपनी मां के मृत देह के पास घंटों इस आस में बिलखता रहा कि उसकी मां कभी तो उठेगी। उसके पिता का 6 माह पूर्व निधन हो चुका है। 11 वर्षीय पूजा और कृष्णा ने भी इस दुर्धटना में अपने माता-पिता को सदा-सर्वदा के लिए खो दिया।

आगरा में एक्सप्रेस-वे पर लोडर ने एक आटो को ठोकर मारी। आटो से बिहार जा रहे अशोक व उनकी पत्नी को मौत अपने घर ले गई। 6 साल का अबोध बेटा यहीं रह गया। अलीगढ़ में एक मां-बेटा भी हादसे के शिकार हो गए।

बलिया, बनारस और दानापुर में 5 विशेष टेªनों में 5 श्रमवीरों के शव बरामद हुए। ये टेªनें मुंबई, सूरत सहित 5 विभिन्न शहरों से पहुंची थीं। वहीं मुंबई से हावड़ा जाने के लिए निकले 29 साल के हिजबुल रहमान की रायपुर में मृत्यु हो गई।

सूरत से यूपी के जौनपुर लौटे तीन प्रवासियों की तेज बुखार, खांसी व सांस की दिक्कत से मौत हो गई।
पुलिस में दर्ज केसों के अनुसार, देशभर में लाकडाउन के 65 दिनों में 150 से अधिक श्रमवीरों ने अपनी ईहलीला समाप्त कर ली है। वहीं मद्रास हाईकोर्ट के बेंच ने केंद्र सरकार व तमिलनाडु सरकार से जवाबतलब करते हुए इन हादसों पर टिप्पणी की है,‘‘एक महीने से प्रवासी मजदूरों की दयनीय दशा देखकर कोई अपनी आंसूं नहीं रोक सकता। यह मानवीय त्रासदी के अलावा और कुछ नहीं है। काफी इंतजार के बाद मजदूर पैदल ही घर लौटने को मजबूर हुए हैं।’’


रेल मंत्रालय ने करीब 5000 श्रमिक स्पेशल रेलों की व्यवस्था तो की, लेकिन वहीं तक, जहां तक ले जाने की मांग राज्य सरकारों द्वारा पेश की गई। श्रमिक स्पेशल टेªनें लोगों से कीमत वसूली गई। रेलों से करीब 20 लाख मजदूर गंतव्य तक पहुंचे। इधर केंद्र का कहना है कि राज्यों से जितनी मांग आई, उतनी रेलगाड़ियां चलाई। उधर, राज्य सरकारों का दावा है कि हमने जितनी मांग की, उतनी रेलगाड़ियां नहीं चलाई।

इसकी जानकारी दो राज्यों से आनी थी। एक उस राज्य से जहां से मजदूर निकल रहे हैं, दूसरे उस राज्य से जहां मजदूर पहुंचना चाह रहे हैं। राज्यों में आपसी तालमेल का अभाव दिखा। मजबूर मजदूर आवागमन के साधनों के अभाव में पैदल घर के लिए निकल पड़े। जिन्हें ट्रकों का सहारा मिला, वे भेड़-बकरियों की तरह लदकर भारी-भरकम किराया देकर पहुंचे।

प्रशासन पंगु दिखा। कहीं कोई नियंत्रण नहीं, जांच नहीं, लाकडाउन व आपदा प्रबंधन के नियम का पालन नहीं। कुपरिणाम यह कि जहां मजदूर हलाकान हुए, वहीं कोरोना के संक्रमितों की संख्या एकाएक बढ़ती चली गई। हालांकि व्यवहारिक रूप से यह काम उतना आसान नहीं, जितना दिखता है, लेकिन सरकारों का यूं घुटने टेंकना कई सवाल भी खड़े करता है।

जिन राज्यों में ये मजदूर काम कर रहे थे, वहां वे कृषि, उद्योग और सेवाक्षेत्र की रीढ़ हैं। ये मजदूर भले ही किसी एक राज्य से संबंध रखते हों, परंतु वे दो राज्यों की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं। एक राज्य में काम करते हैं, तो दूसरे राज्य में अपने परिवारों के पालनपोषण के लिए रुपया भेजते हैं। आय और व्यय का यह अर्थतंत्र परस्पर जुड़ा हुआ है। इनसे देश के विकास व उन्नति का अन्योन्याश्रित संबंध है।

जिस तरह विदेशगामी व्यक्ति विदेशी मुद्राभंडार बढ़ाने में अहम योगदान देता है, उसी तरह कमाने-खाने के लिए परप्रदेश गया हुआ व्यक्ति अपने गृहप्रदेश के अर्थतंत्र को मजबूती प्रदान करता है। जैसे थल के बिना जल नहीं ठहरता, वैसे ही श्रमिकों के बिना निर्माण, प्रगति, उन्नति और विकास नहीं हो सकता। श्रमिक वे थल हैं, जिनके बगैर विकास का जल नहीं ठहरता।

प्रवासी मजदूरों के लिए आललाइन डैशबोर्ड

लाकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की आवाजाही की प्रक्रिया आसान बनाने और उनकी कांन्टैक्ट टेªसिंग के लिए केंद्र सरकार ने एक आनलाइन डैशबोर्ड लांच किया है, जिसका नाम नेशनल माइग्रंेट इंफो सिस्टम है। दावा है कि इससे केंद्र सरकार व राज्य सरकारों में आपसी समन्वय बेहतर होगा। वे इसके माध्यम से मजदूरों से आसानी से संपर्क कर सकेंगे। डैशबोर्ड की विशेषता इस प्रकार होगी।


1. प्रवासी मजदूरों को भेजनेवाले और बुलानेवाले राज्य पोर्टल पर एक-दूसरे को जानकारी देंगे।

2. पोर्टल पर प्रवासी मजदूरों का नाम, उम्र, मोबाइल नंबर, गंतव्य और यात्रा की तारीख दर्ज होगी। इससे पता चलेगा कि किस राज्य से कितने प्रवासी गए और कितने आए।

3. मोबाइल नंबर से श्रमिकों पर नजर रखी जा सकेगी। यह पता करने में मदद मिलेगी कि वह पिछले दिनों किस-किस से मिला।

4. हर प्रवासी को विशेष पहचान संख्या भी आवंटित की जाएगी। उससे संबंधित सभी जानकारियां दर्ज रहेंगी।

5. केंद्र के नोडल मंत्रालय भी पोर्टल के जरिये प्रवासियों की आवाजाही पर नजर रख सकेंगे।

इस भागमभाग में बहुतेरे सदभावी फरिश्तों ने मजदूरों के आंसू पोंछने का खूब प्रयास किया है, कोई उन्हें खाना खिलाया है, कोई पानी पिलाया है, कोई चप्पलें बांा है, कोई अपने साधनों से इन्हें इनके घरों तक पहुंचाया है। ये छोटे प्रयास काबिलेतारिफ हैं।

लेकिन असल सवाल करोड़ों-करोड़ मजदूर-परिवारों का है। उनकी जीवन-मृत्यु का है। अस्मिता का है। सरकारों को इनके लिए ठोस कदम उठाने का है। इनका आंसूं पोंछना और बेहतर भविष्य के निर्माण का है।

ये मजदूर देश के निर्माण में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं, इसलिए महापलायन की इस भयावह त्रासदी में हे सरकार जागो! ...और अपने मजदूरों की फिक्र करो।

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