मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

'रौशनी ' भूमि घपला

जम्मू जिला प्रशासन के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के अब तक के सबसे बड़े 25 हजार करोड़ के रौशनी भूमि संघ में सरकार व वनभूमि पर कब्जा जनेवले 1768 अचिरामणकों में राष्ट्रीय कांफ्रेस के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और उनकी बहन सुरैया मट्टू किसी से पीछे नहीं हैं।

फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू के बाहरी क्षेत्र सुंजवां में सात कनाल वनभूमि पर कब्जा कर आलीशान बंगला बना लिया। वहीं फारूक की बहन सुरैया मट्टू ने रौनी एक्ट का लाभ उठाते हुए तीन कनाल 12 मरले भूमि अपने नाम करवा ली है। सुरैया के मामले में लज्जाजनक तथ्य यह है कि उसको जमीन के एवज में सरकारी खजाने में 1 करोड़ रुपये जमा करवाने थे, जो उन्होंने नहीं करवाए हैं।

यही नहीं, नेशनल कांफ्रेंस कार्यालय, शेर-ए-कश्मीर भवन व ट्रस्ट भी शासकीय भूमि तीन कनाल 16 मरले पर बना है, जो रौशनी एक्ट लागू होने पर नेकां ने इमारत अपने नाम कर वहां रौशनाई कर लिया है। इसके अतिरिक्त श्रीनगर स्थित नवाई-ए-जल्द ट्रस्ट तीन कनाल 16 मरले पर बना है, जो नेकां के नाम पर कर दिया है।

क्या है रौशनी एक्ट: 

डा। फारूक अब्दुल्ला ने वर्ष 2001 में जम्मू-कश्मीर के गरीब किसानों का हवाला देकर 'रौशनी एक्ट' लागू किया था, जिसमें कहा गया था कि इसका लाभ उठाकर किसान जिस सरकारी जमीन पर कई वर्षों से खेती कर रहे हैं, वह अपने नाम करेगी।

जबकि सीबीआई की जांच से वास्तविकता उभरकर आई है कि 1990 के दशक में जब जम्मू-कश्मीर मंे आतंकवाद का उभार हो रहा था, तब कश्मीर छोड़कर भाग गए हिंदुओं के मकान, दुकान, जमीन और खेत-खलिहान को मुस्लिमों को देने के लिए फारूक अब्दुल्ला ने षडयंत्र रचकर 'रौशनी एक्ट' बनवाया था। 

दुष्परिणाम्त नेकां, पीडीएफपी, कांग्रेस के बड़े-बड़े मंत्री व नेता ही नहीं, बड़े व्यापारी व नौकरशाह भी करोड़ों की जमीन कौड़ियों में अपने नाम करवा कर धार्मिके कर रहे हैं। इनमें भागते हिंदुओं के बंगले, कोठियां, कारखाने, उद्योग, बाग-बगीचे, केशर के बागान सहित जो दिखा, वे अपने नाम मनमाने ढंग से करवा लिए। यह केवल कहता है, माले मुक्त दिले बेहरम।

यह कश्मीरी हिंदुओं के लिए वह कठिन समय था, जब जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने अपने ही बचपन के हिंदू सहयोगियों, जिनके साथ वे सेवइयां खाते थे, खेलने-कूदते थे, संग उठते-बैठते थे, उन्हें मार-मार कर भोज दिया। वाह रे, पड़ोसी धर्म! तेरा जवाब नहीं।

उनके घरों को लूट लिया, बहन-बेटियों को बेआबरू किया, सरेआम कत्लेआम किया और धमकियां दी कि या तो धर्म परिवर्तन कर लो, या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ।

रौशनी एक्ट को लागू करनेवाले मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला थे। उन्होंने कट्टरपंथी मुस्लिमों के कहने पर 2001 में रौशनी एक्ट बनवाकर की गहरी चाल चली। इसमें शगुफा यह छोड़ गया कि मुसलमानों के घरों के आसपास के घर, जो हिंदुओं के थे, जिनमें अब वे नहीं रहे हैं, बिजली का बिल नहीं पटाने से बिजली कनेक्शन काट देने पर उनके आसपास अंधेरा रहता है, जिससे उनके लिए खतरा हो सकता है। । इसलिए ऐसे घरों को रौशन करना जरूरी हो गया है।

भगाए गए हिदुओं के इन घरों, मकानों, दुकानों, खेतों के लिए मुस्लिम केवल 101 रुपए जमा कर बिजली का कनेक्शन लेने का आवेदन कर सकते थे। आवेदन के उपरांत पहले बिजली कनेक्शन आवेदक मुस्लिम को दे दिया गया था, फिर चंद महीनों व सालांे के उपरांत उस खेत, मकान, दुकान का मालिकाना हक भी मिल गया करता था। अर्थात शासकीय आदेश से युक्ति जारी कर दिया जाता था।

भेदभावपूर्ण व अत्याचारी 'रौशनी एक्ट' को केंद्र सरकार द्वारा रद्द कर देना चाहिए। साथ ही, रोशनी एक्ट के द्वारा कब्जाई जमीन के पूरे रिकॉर्ड खंगालने और उन हिंदुओं को ढूंढने के आदेश जारी किए जाने चाहिए, जिनकी मिलकियत और मालिकाना हकदारी 1990 के पूर्व थी।

उधर फारूक अब्दुल्ला ने पत्रकारों को जवाब देते हुए अपनी सफाई दी है कि उसने अपने श्रीनगर या जम्मू निवास के लिए रोशनी एक्ट का लाभ नहीं लिया है। लेकिन जम्मू जिला प्रशासन के मुताबिक 1998 में फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू के संजुज के भठिडी में खसरा नंबर 21 पर अलग-अलग जमीन के मालिकों से 3 नहर भूमि खरीदी थी। फारूक ने बंगला बना समय के साथ लगता है 7 कनाल वनभूमि भी घेर रखी है। तब वे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। राजस्व विभाग के अनुसार आज उस भूमि की कीमत 10 करोड़ रुपये के आसपास आंकी गई है।

ला रौशनी भूमि स्कला ’की जांच हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई के द्वारा किया गया है, जिससे जाहिरा तौर पर कहा जा सकता है कि जिन सियासतदानों को सत्ता की चाबी सौंपी गई थी, वे ही बीमा के सूत्रधार घाटी में थे। यह तो 'बागड़ बिल्ला' वाला घपला है, जिसमें केवल भक्षक बना हुआ था, जो हाइलाइट करता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों पर सख्त निगरानी की आवश्यकता है। इसकी आवश्यकता जितनी जल्दी पूरी होगी, देशहित में उतना ही अच्छा है।

इससे बहुत अधिक आवश्यकता है कि इसमें शामिल  लोगों  पर कठोर कार्रवाई की जाए। वह भी तुरत, ताकि गुपकारगैंग की हकीकत जगजेटिक हो। वस्तुतः यह गुपकार गठजोड़ की नहीं, गुपकार गैंग की कारस्तानी है। इसमें नेकां, पीडीएफपी और कांग्रेस के लोगों ने न केवल अपने लिए, अपितु अपने परिचितों, रिश्तेदारों व मित्रायरों को जमीनों की बंदरबाट की है। 

कॉन्स्ट की आढ़ के बारे में वे ऐसे ही लूट-खसौट की बपौती स्थापित करना चाहते थे, जिसमें कोई रोकटोक न हो, कोई देखने-समझने वाला न हो। 

सवाल यह भी कि जरा-जरा सी बात पर ओछी सियासत करनेवाले और 60 साल तक सत्ता का सुख भोगनेवाले कोंग्रेसी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? उन्हें आगे आकर इस गंभीर मुद्दे पर सफाई देनी चाहिए। इसी के साथ वामपंथी मीडिया और राष्ट्रपति और बुद्धिजीवी संगठनों को इस लूट-खसोट के मामले पर सांप क्यों सूंध गया है?

इससे यही जाहिर होता है कि अनुच्छेद 370 की आढ़ के बारे में हिदुओं के विरूद्ध जिस गजवा-ए-हिन्द की फारूक अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद सईद ने रची थी, उसको खाद-पानी देने का काम र रौशनी एक्ट ’ने कर दिखाया था। 

यह धाधली शीर्ष स्तरीय था। इसीलिए इसमें उन सियासी सूरमाओं के नाम उजागर हुए हैं, जो जम्मू-कश्मीर को जन्नत से दजख बनाए हुए थे और अभी गुपकार गैंग बनाकर ऐसे ही गंदगी फैलाने के फेर में हैं, जो दुश्मन देश चीन भी सहयोग लेने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। ।

विदंबना यही है कि बाद की सरकारों ने भी इसे रोकने के बजाय इसमें भागीदारी और भाग ही खेलया, जो यही दर्शाता है कि जम्मू-कश्मीर खुला लूट का अड्डा बना हुआ था। इससे जहां जम्मू-कश्मीर आतंकवाद आतंकवाद की आग में झुलस गया, वहीं हिंदूविहीन होने का उनका षड़यंत्र अपने मुकाम पर पहुंचने के करीब पहुंच गया।

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

धर्मांतरण के खिलाफ कानून

  

यूपी सरकार छल-कपट, प्रलोभन या विवाह के लिए धर्म परिवर्तन रोकने के वास्ते सख्त कानून बनाने की तैयारी में है। राज्य विधि आयोग के प्रस्ताव को गृह विभाग ने न्याय एवं विधाय विभाग को भेज दिया है। प्रस्ताव में ऐसे आरोपों में गैरजमानती प्रवाह में मामला और दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है।

गौरतलब है कि राज्य में कानपुर, बुलंदशहर, सहारनपुर, बागपत, मेरठ सहित यूपी के कई शहरों में विवाह विवाह के लिए धर्म परिवर्तन या धर्म छिपाकर विवाह करने के मामले सामने आए हैं।

विधि आयोग के प्रस्तावित खिलौनेदे के प्रभावी होने पर गलत नीयत से धर्म परिवर्तन या शादी के लिए धर्म परिवर्तन धर्म परिवर्तन कानून के तहत होगा। 

'लव जिहाद' शब्द से परहेज

प्रदेश सरकार ने धर्म परिवर्तन रोकने के लिए प्रस्तावित कानून के खिलौनेदे में 'लव जिहाद' शब्द के इस्तेमाल से गुरेज किया है। लव जिहाद पर पहचान कानून को 'अवैध रूप से धर्म परिवर्तन निषेध विधेयक 2020' कहा जाएगा। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि कानूनी तौर पर इस शब्द की कोई वैधता नहीं है। ऐसा नहीं है, लोगों में यह संदेश भी नहीं है कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म विशेष पर लक्षित है।

विशेष प्रावधान 

1. धर्म परिवर्तन के लिए मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना भी नए कानून के दायरे में होगी।

2. धर्मांतरण के मामले में यदि माता-पिता, भाई-बहन या अन्य ब्लड रिलेशन से कोई शिकायत नहीं है, तो उनकी शिकायत पर कार्रवाई की शुरूआत की जा सकती है।

3. धर्मलिंग के लिए दोषी पाए जाने पर एक साल से लेकर पांच साल तक की सजा की सिफारिश की गई है, जिसमें 15 हजार तक जुर्माना लगेगा।

4. समूहिक धर्म पालन करने के मामले में कम से कम 2 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान करने की तैयारी है। साथ ही 50 हजार रुपये से अधिक जुर्माने का प्रावधान रहेगा।

5. धर्मांतरण में सहयोग करनेवालों को भी मुख्य आरोपी बनाया जाएगा और अपराधी को सजा दी जाएगी। शादी के लिए धर्मांतरण करानेवालों को भी सजा देने का प्रावधान इस कानून में होगा।

6. किसी लड़की का धर्म परिवर्तन विवाह प्रक्रिया केवल से किया गया है, तो विवाह शून्य घोषित किया जा सकेगा।

7. धर्म-पालन संज्ञेय अपराध और गैरजमानती होगा। अभियोग का विचारण प्रथम श्रेणी धार्मिकता की अदालत में होगा।

8. अनुसूचित जाति या जनजाति की महिला का जबरन धर्म परिवर्तन कराने के मामले में कम-से-कम दो साल और अधिकतम सात साल की सजा और 25 हजार जुर्माने का प्रावधान होगा।

9. प्रस्तावित गेमडे के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है या शादी के लिए धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे एक महीने पहले संबंधित जिले के कलेक्टर के यहां अनिवार्य रूप से आवेदन देना होगा। बिना आवेदन के धर्मांतरण किया गया, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।

एजेंडे में शामिल 

धर्मांतरण पर कानून बनाने की पहल कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार न केवल संघ परिवार व भाजपा के एजेंडे पर, बल्कि जनता की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरने की दिशा में दो कदम आगे बढ़ चुके हैं।

हिंदुत्व के प्रतीक योगी आदित्यनाथ 2017 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दरमियान इस मसले पर काफी सहयोगी थे। उन्होंने यूपी में सरकार बनने पर 'कैराना को कश्मीर न बनने देने' और 'अब कोई जोधा नहीं होगा अकबर के साथ' जैसे भाषणों से अपने नेक इरादे जाहिर कर दिए थे। साथ ही, हिंदुत्व के सरोकारों पर अपने संकल्प का संदेश भी दे दिया था।

कानून बनाने के निहितार्थ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि सिर्फ शादी धर्म परिवर्तन का आधार नहीं हो सकता है। धर्म परिवर्तन का आधार आस्था है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पहले भी कई मर्तबा ऐसा कहा है। देश के अन्य राज्यों के उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक इस दिशा में कानून की आवश्यकता बता चुके हैं।

योगी आदित्यनाथ ने धर्मांतरण पर कानून बनाने की पहल कर आरएसएस, विहिप या संघ परिवार के अन्य आनुषंगिक संगठनों और नवंबर महीने की शुरूआत में दिल्ली में संतो ँकेकाशक मंडल की बैठक में धर्म परिवर्तन पर रोक की उनकी अपेक्षा को पूरी करने की दिशा में कदम उठाया। के सरोकारों पर काम को अंजाम देने का कार्य किया है। साथ ही, कोर्टीनटे को संजीदगी से पूरा करने का प्रयास किया है।

धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के पीछे धर्मांतरण पर दोष से रोक और तुष्टीकरण पर दृढ़ता से अंकुश के इरादे नजर आते हैं। कारण, धर्म छिपाकर विवाह करने की ज्यादातर घटनाओं में मुख्य कारण धर्मांतरण ही निकलता रहा है। जाहिरा तौर पर योगी सरकार ने इस कानून के जरिये धोके से हिंदू लड़कियों के धर्म परिवर्तन कराने पर अंकुश लगाने का स्तुत्य प्रयास किया है।

इसी के साथ, उन्होंने यह भी जाहिर किया है कि भले ही उनके फैसले को लेकर कुछ लोग सवाल खड़े करें, सांप्रदायिकता का आरोप पाते हैं, किंतु योगी आदित्यनाथ हिंदू समाज के उन मसलों पर काम करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं, जिनके लिए वे चुनकर सत्तासीन हुए हैं। हैं।

उन्होंने 30 अक्टूबर को जौनपुर की सभा में कहा था कि सरकार लव जिहाद को सख्ती से रोकेगी।

गौर करने वाली बात यह भी कि मध्यप्रदेश सरकार ने भी धर्मांतरण के खिलाफ ऐसा ही कानून बनाया है और हरियाणा सहित अन्य भाजपा शासित राज्य धर्मांतरण के विरूद्ध कानून बनाने की तैयारी में हैं।

अल यह कि कतिपय राजनीतिक दल इसे 'गैरजरूरी कवायद' करार देकर इसे 'प्यार पर पहरा' का नाम देते हुए इसका मखौल उड़ा रहे हैं।

समझनेवाली बात यह है कि जब छल-कपट से या जबरन धर्म परिवर्तन कर विवाह किया जाता है, तब उसे क्या कहा जाना चाहिए? यह तो धोखा और दादागीरी से किया गया विवाह हुआ, जिसे अंतरधार्मिक विवाह कतई नहीं कहा जा सकता है।

यह कटु सत्य है कि अंतरधार्मिक विवाह के मुद्दे में यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि लड़की को लड़के का धर्मयोग्य करने की बाध्यता होती है। इसके बिना अंतरधर्म विवाह की कल्पना ही बेमानी है।

ऐसे ज्यादातर हिंदू, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई, जैन युवतियों के द्वारा मुस्लिम युवकों से निकाह के मामले में होता है। इसलिए ये समाजों के संगठन ऐसे विवाह का विरोध करते हैं। यह कोरी कल्पना नहीं, अपितु वास्तविकता है। इस हकीकत से वही व्यक्ति मुंह मोड़ सकता है, जो जान-समझकर ऐसे विवाहों का समर्थक होता है।

ऐसे विवाह को प्रेम-विवाह भी नहीं कहा जा सकता है, जिसमें धर्म परिवर्तन अपरिहार्य शर्त हो सकती है।

हमारे देश में ही अंतरधार्मिक विवाह के कई युगलों ने किया है और अपना-अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता को बरकरार रखा है, जो अंतरधार्मिक विवाह की गरिमा के अनुकूल है। उनके बच्चों को भी यह आजादी मिली है कि वे जिस धर्म को पसंद करते हैं, वह उसका अपना हो सकता है। 

यह एक माडल है, जिसकी प्रशंसा होनी चाहिए। वह अंतरधार्मिक विवाह का उच्चआदर्श है, जिसे कई ल्योनलों ने प्लेया है और सफलतापूर्वक गार्हस्थ जीवन बिताया है। 

यद्यपि विशेष विवाह अधिनियम अलग-अलग धर्मों को माननेवाले संदेह को अपनी-अपनी धार्मिक आस्थाओं को कायम रखने की अनुमति देता है, हालांकि ऐसे कई मामलों में धार्मिक आस्था बदलकर क्या साबित किया जा रहा है?

उधर, भारतीय जनता पार्टी के महासचिव अरुण सिंह ने 'लव जिहाद' को एक गंभीर समस्या बताते हुए अपनी राज्य सरकारों के खिलाफ इसके कानून बनाने का खुलकर समर्थन किया है। जबकि विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि भाजपा समाज को बांटने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि ऐसा कोई कानून बनाना संविधान का उल्लू होगा।

वहीं कतिपय बुद्धिजीवियों का यह भी कहना है कि मप्र हो या उप्र प्रस्तावित कानून वैवाहिक संबंधों में धार्मिक छल के खिलाफ है, तो यह सही है, लेकिन अगर यह महिला-अधिकारों की स्वतंत्रता के खिलाफ है, तो गलत है।

वास्तव में विवाह ऐसा ही संवेदनशील और वैयक्तिक मुद्दा है, जिसमं अरंजे मैरिज विफल हो जाते हैं, तो नस्क को कसूरवार ठहराया जाता है। अंतरजातीय प्रेमविवाह विफल होने पर 'लड़की के चयन' को दोषपूर्ण जाता है। उनके विपरीत, अंतरधार्मिक विवाह में जबरदस्ती धर्म बदलने पर 'लव जिहाद' कहा जाता है।

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मंगलवार, 24 नवंबर 2020

टीआरपी घोटाला


समाचार-पत्रों के जमाने में पीत पत्रकारिता होती थी, जिसमें किसी को बदनाम करने के लिए खबरें मिर्च-मसाला लगाकर परोसी जाती थीं। इलेक्ट्रानिक मीडिया आने पर फर्जी न्यूज और फेक न्यूज परोसा जाने लगा, तो अब टीआरपी का खेल बढ़-चढ़़कर खेला जा रहा है।

यह सच है कि सुशांत सिंह राजपूत के मामले को कई टीवी चैनलों ने सुशांत को न्याय दिलाने के नाम पर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है। इसमें बालीवुड की ड्रग्सलीला भी उजागर की गई है, जो एनसीबी की कार्रवाई पर आधारित है।

मुंबई पुलिस का दावा है कि उसने ऐसे रैकेट का पर्दाफाश किया है, जो टेलीविजन रेटिंग पाइंट (टीआरपी) बढ़ाने के लिए पैसे देकर सिस्टम से छेड़छाड़ करता है।

विदित हो कि टीवी चैनलों के लिए टीआरपी वह माध्यम है, जिससे पता चलता है कि किसी चैनल को लोग कितनी मर्तबा या कितने वक्त तक देखते हैं। इसमें कई घरों में डेटा जुटानेवाला बैरोमीटर लगा होता है, जिसमें टीवी को देखने का रिकार्ड दर्ज होता रहता है। इसी से यह भी पता चलता है कि किस टीवी कार्यक्रम को सबसे ज्यादा देखा गया? दर्शकों की पसंद क्या है? चैनलों की भीड़ में किस चैनल की लोकप्रियता कितनी है? 

पुलिस का दावा है कि घपला यही है कि कई टीवी चैनल अपनी टीवी को लगातार चलाए रखने के लिए बैरोमीटर लगे घरवालों को प्रतिमाह 400 से 500 रुपया देते हैं, जो रिश्वत की श्रेणी में आता है। टीआरपी की निगरानी के लिए एक अकेले मुंबई में ही दो हजार से अधिक बैरोमीटर स्थापित किए गए हैं। देशभर में यह लाखों में है।

बैरोमीटर की निगरानी के लिए बार्क ने ‘हंस’ एजेंसी को ठेका दिया है। ‘हंस’ एजेंसी ने ही टीआरपी रैकेट की शिकायत मुंबई पुलिस से की थी, जिसके आधार पर अपराध दर्ज किया गया है। 

मुंबई पुलिस का यह भी कहना है कि हमे संदेह है अगर यह खेल मुंबई में चल रहा है, तो देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसा खेल निश्चित तौर पर चल रहा होगा।

पुलिस का यह भी दावा है कि जो लोग अंग्रेजी नहीं समझते, उन लोगों के घरों में भी पैसे देकर एक ही चैनल लगातार चलवाया जाता था।

कहा जाता है कि टीआरपी में हेराफेरी का खेल विज्ञापन के लिए किया जाता है। इसके जरिए विज्ञापन बाजार का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी ओर खिंचा जाता है। टीवी चैनलों के लिए विज्ञापन का यह बाजार 30 हजार करोड़ रुपए के आसपास का है। टीआरपी के इस खेल में तीन चैनलों के नाम सामने आए हैं, जिसमें चार लोगों को हिरासत में लिया गया है।

बार्क वह एजेंसी है, जो टीवी चैनलों के लिए हर हफ्ते रेटिंग पाइंट जारी करता है। बार्क मीडिया उद्योग का ही एक निकाय है, जिसका गठन सटीक, विश्वसनीय और समय पर टीवी दर्शकों की संख्या मापने के लिए किया जाता है।

इन्हीं तथ्यों के दृष्टिगत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने निजी टीवी चैनलों के लिए एडवाइजरी जारी कर कहा है,‘‘केबल टेलीविजन नेटवर्क (रेगुलेशन) अधिनियम, 1995 के तहत किसी भी कार्यक्रम में अर्द्धसत्य या किसी की मानहानि करनेवाली सामग्री का प्रसारण नहीं होना चाहिए। टीवी कार्यक्रमों में ऐसी कोई सामग्री नहीं होना चाहिए, जो अश्लील, मानहानिकारक, झूठे या अर्धसत्य हों। या फिर किसी व्यक्ति, समूह, समाज के तबके, जनता या देश के नैतिक जीवन की आलोचना करने, लांछन लगाने या अपमानित करनेवाली न हों।’’

मंत्रालय का यह भी कहना कि सुशांत सिंह राजपूत व तब्लीगी जमात के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने भी टिप्पणी की है कि हाल के दिनों में बोलने की आजादी के हक का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है।

ब्राडकास्ट आडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) ने बड़ा फैसला करते हुए कहा है कि टीवी रेटिंग जारी करनेवाली इस संस्था ने सभी भाषाओं-हिंदी, क्षेत्रीय व अंगे्रजी के समाचार चैनलों की साप्ताहिक रेटिंग जारी करने पर फिलहाल 8 से 12 हफ्तों तक रोक लगा दी गई है। इसका मकसद मापन के वर्तमान मानकों की समीक्षा करना और उनमें सुधार करना है। 

बार्क इंडिया के चेयनमैन ने कहा है,‘‘यह रोक इसलिए जरूरी था, ताकि उद्योग और बार्क मिलकर अपने पहले से ही कड़े प्रोटोकाल की समीक्षा कर सके और उसमें सुधार कर सके। इससे उद्योग विकास और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए सहयोग केंद्रित कर सकेगी।

उधर, मुंबई पुलिस ने 11 अक्टूबर को रिपब्लिक टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विकास खनचंदानी और अन्य से गहन पूछताछ की है। मुंबई पुलिस को शंका है कि गिरफ्तार व्यक्तियों में-से एक व्यक्ति ने चार या पांच व्यक्तियों से अपने बैंक खाते में एक करोड़ रुपए से अधिक की राशि प्राप्त की है।

इधर, रिपब्लिक टीवी का दावा है कि टीआरपी घोटाले में बार्क ने उसका नाम नहीं लिया है, लेकिन मुंबई पुलिस रिपब्लिक टीवी को बदनाम करने के लिए बगैर सबूत इस मामले में घसीट रही है। 

रिपब्लिक टीवी का यह भी कहना है कि मुंबई पुलिस ने उसके खिलाफ अंग्रेजों के जमाने का कानून इस्तेमाल कर संविधानप्रदत्त ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को दबाने का प्रयास की है। 

उसने रिपब्लिक टीवी से चार साल के खर्च का व्यौरा मांगा है। यही नहीं, उसके संपादकों सहित 1000 पत्रकारों पर प्राथमिकी दर्ज कर पूछताछ की गई है कि आपकी जानकारी का स्त्रोत क्या है? इतने बड़े पैमाने पर पत्रकारों पर एक साथ एफआइआर दर्ज करना, पत्रकारिता के इतिहास में यह पहली घटना है।

महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले की चहुंओर कटु आलोचना हो रही है। केंद्रीय वित्तमंत्री ने इसे कांग्रेस का डीएनए में होना कहा है, तो अन्य केंद्रीय मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों ने इसे आपातकालीन घटना की याद दिलाना कहा है। कंगना रनावत ने इसे ‘कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली’ कहकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है। वहीं साधु-संतों ने इसका पुरजोर विरोध कर सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की बात कही है।

सुप्रीमकोर्ट ने रिपब्लिक मीडिया समूह से कहा है कि टेलीविजन रेटिंग पाइंट हेराफेरी को लेकर मंुबई पुलिस द्वारा दर्ज मामले में वह बांबे हाईकोर्ट जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमें उच्च न्यायालयों में भरोसा रखना चाहिए।

उधर, हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया ट्रायल पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि जब आप ही जांचकर्ता, अभियोजक और जज बन जाएंगे, तब अदालतों की क्या जरूरत है?

अदालतों के ऐसे फटकारों के बावजूद टीवी चैनलों द्वारा टीआरपी के लालच में मीडिया ट्रायल की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा तथा आस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों में मीडिया ट्रायल के नियमन के लिए कानून है, पर हमारे यहां वैसा कानून नहीं है। क्यों नहीं है, समझ से परे है? जबकि देश में टीवी चैनलों की संख्या 400 से अधिक है, जो जनमत को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं।

वहीं, सूचना प्रौद्यागिकी पर संसदीय स्थायी समिति को अधिकारियों ने जानकारी दी है कि टीआरपी मापने की वर्तमान व्यवस्था वैज्ञानिक नहीं है। इसमें हेराफेरी की गुंजाइश है। इसकी वर्तमान प्रणाली दर्शकों की वास्तविक तस्वीर पेश नहीं करती। कारण कि इसमें आंकड़े एकत्रित करनेवाले केंद्र बहुत कम हैं।

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मंगलवार, 21 जुलाई 2020

पार्टियों में बगावत

पार्टियों में बगावत
सबसे अधिक समय तक सत्ता का स्वाद चखनेवाली कांग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की बगावत कोई नई घटना नहीं है। कांग्रेस इसकी अभ्यस्त है। कांग्रेस में बागियों की लंबी-चैड़ी फेहरिस्त है। फिर चाहे कोई कद्दावर नेता हो या छुटभइया; ज्यादातर बागी तेवर सत्ता लोलुपता के लिए गीदड़ भभकी माना जाता है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की नासमझी और नाकामी से वह विध्वंसकारी साबित हुआ करता है।


इमेरजेंसी के आसपास के इतिहास पर गौर फरमाएं। कांग्रेस से बगावत करके ही मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक पहले गैर-कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने थे। इसी दौरान बाबू जगजीवनराम भी कांग्रेस से किनारा कर जनता पार्टी की सरकार में उपप्रधानमंत्री बन गए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी बोफोर्स के मुद्दे पर कांग्रेस का दामन छोड़कर जनता दल का गठन कर लिया था। इससे कांग्रेस को करारा झटका लगा था। तब, वह हासिये में चली गई थी। इसके बाद देश का राजनीतिक घटनाचक्र तेजी से बदला था। वीपी सिंह 1 दिसंबर 1989 से 7 नवंबर 1990 तक ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें अविश्वास प्रस्ताव से पदत्याग करना पड़ा था।

1980 में एके एंटनी, 1986 में प्रणव मुखर्जी, 1996 में माधवराम सिंधिया और 2001 में पी चिंदमबरम में इसी राह के राही थे। हालांकि ये नेता कुछ समय उपरांत कांग्रेस में वापस आ गए थे। एके एंटनी और पी चिदंमबरम तो बाद की कांग्रेस सरकारों में मंत्री भी रहे। आदरणीय प्रणव मुखर्जी 25 जुलाई 2012 से 24 जुलाई 2017 तक कांग्रेस के समर्थन से भारत के राष्ट्रपति भी रहे।

कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1987 में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई। महाराष्ट्र के धाकड़ नेता शरद पवार, पूर्वाेत्तर के नेता पीए संगमा और तारीक अनवर भी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को गरमाकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना लिए।

आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर वाईएसआर कांग्रेस का गठन कर लिया और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे।

छत्तीसगढ़ में बगावती तेवर वाले नेताओं में स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, अरविंद नेताम और अजीत जोगी प्रमुख थे। विद्याचरण शुक्ल का तो सारा जीवन कांग्रेस से अंदर-बाहर होने में बीता था। दिवंगत महेंद्र कर्मा ने भी कई मर्तबा बागी तेवर दिखाए थे।

केंद्र में लंबे समय तक कृषि राज्यमंत्री रहे अरविंद नेताम तक ने एक समय कांग्रेस का दामन छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया था। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी की तो बात ही निराली थी। वे अपनेआप को उधर श्रीमती सोनिया गांधी का भक्त बताते रहे, उधर कांग्रेस से दरकिनार कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बना लिया था।

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस से विलग होकर दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट बना लिया और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए।

यही नहीं, कांग्रेस से अलग होकर पुडुचेरी में एन रंगास्वामी, एनआर कांग्रेस और नगालैंड में नेफ्यू रियो, एनपीएफ का गठन कर अपने-अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। इसी तरह महाराष्ट्र का विदर्भ जनता कांग्रेस और तमिलनाडु का तमिल मनीला कांग्रेस भी कांग्रेस के ही टूटे हुए घड़े हैं।

1980 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई। भाजपा से जुदा होकर 17 पार्टियां बनी, लेकिन सबके सब फिसड्डी साबित हुए। भाजपा से उप्र के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होकर जनक्रांति पार्टी बनाई। भाजपा से मप्र की मुख्यमंत्री रही फायरब्रांड नेत्री उमा भारती ने जनशक्ति पार्टी बनाई। भाजपा से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल ने जीपीपी बनाई और झारखंड में बाबूलाल मरांडी ने जेवीएम बनाई।

लेकिन अफसोस यह कि इनमें-से कोई नेता अपना अस्तित्व बचा न सका। ये सभी नेता वापस अपने घर लौट आए। यही नहीं, यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा भी भाजपा से अलग होकर अलग-अलग राग अलापते रहते हैं, लेकिन उनको कोई गंभीरता से नहीं लेता।

इमेरजंेसी के बाद वजूद में आये जनता दल भी बार-बार टूटा और टूटकर इस कदर बिखरा कि मूल पार्टी का नामोनिशान तक मिट गया। इसकी वजह बनी नेताओं की महत्वाकांक्षा, अहम, कलह और कटुता।

जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनानेवाले मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश; राष्ट्रीय जनता दल बनानेवाले लालू यादव, बिहार; जनता दल यूनाइटेड बनानेवाले नीतीश कुमार बिहार और बीजू जनता दल बनानेवाले नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए।

इसके अलावा व्यापक पैमाने पर आयाराम और गयाराम भी हुआ है। नेतागण अपने अनुयायियों सहित यहां से वहां गए। कई नई पार्टी में रम गए हैं, तो कई पुरानी पार्टी में वापस लौट भी आए। आने और जाने का सिलसिला देशभर में कहीं-न-कहीं हरदम चलता ही रहता है।

दक्षिण में एनटी रामाराव की मौत के बाद तेलुगु देशम पार्टी भी टूटा। तमिलनाडु में जयललिता की मृत्यु के उपरांत एआईएडीएमके भी दो टुकड़ों में बंट गया। समाजवादी पार्टी में बाप-बेटा और चाचा-भतीजा की लड़ाई सतह पर आ गई। लालू यादव के जेल में रहने से उनके बेटों का झगड़ा पार्टी में आम हो गया।

यहां तक कि नवगठित राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी में भी बगावत हुआ। इसके कई नेता पार्टी नेतृत्व पर तानाशाही का आरोप लगाकर पार्टी से अलग हो गए। कुछ बीजेपी में शामिल हो गए, तो कइयों ने मिलकर योगेन्द्र यादव की अगुआई में स्वराज पार्टी का गठन कर लिया।

आशय यह कि आजादी के बाद से भारतीय राजनीतिक दलों में सैकड़ों टूट-फूट और अलगाव-विलगाव हुआ है। इससे कोई पार्टी अछूता नहीं है। बगावत की काली छाया सभी पार्टियों पर पड़ी है।

हालांकि किसी नेता का पार्टी के साथ बने रहना या पार्टी से विलग होना, उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन इससे जनभावना आहत होती है। लोकतंत्र का मखौल उड़ता है। बगावत में मनमुटाव, खरीद-फरोख्त, टकराव और रोमांच हो सकता है, किंतु नैतिकता और सिद्वांत कहीं नहीं दिखता।

सौ बात की एक बात, जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठता है, तब पार्टी के अंदरुनी लोकतात्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जनविश्वास का भट्ठा बैठता है। लोगों की धारणा यही बनती है कि जो पार्टी अपने लोगों की मनोभावनाओं और विचारों का सम्मान नहीं कर सकती, वह जनता की भावनाओं का क्या खाक ख्याल रखेगी?

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बुधवार, 15 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद-2




चीन की विस्तारवादी गतिविधि न केवल भारत, अपितु दुनिया को भी डराने लगा है। उसके ‘एडवांस्ड सोशलिस्ट कंट्री’ के ख्वाब से दुनिया भयग्रस्त है। वह अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए 2049 तक का समय निश्चित किया हुआ है। वह इस बीच सैन्य व आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका की चैधराहट को समाप्त कर देना चाहता है और स्वयं नंबर वन पर काबिज होना चाहता है।

बांग्लादेश पर निगाह

भारत को घेरने और डराने के लिहाज से जहां उसने पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान पर डोरे डाल रखा है, वहीं बांग्लादेश को भी अपने निवेशजाल में उलझा दिया है। वह बांग्लादेश में 2030 तक 100 स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए चीनी कंपनियां आंख मूंदकर निवेश करने के लिए कमर कसी हुई हैं।

भारत के पड़ोसी देशों को सहायता देकर उपकृत करना और भारत को परेशानी में डालना चीन की सोचीसमझी रणनीति का हिस्सा है। जिस बांग्लादेश का संबंध सदियों से भारत के साथ रहा हो, जो कभी अखंड भारत का हिस्सा रहा हो, उसके क्षेत्र में निवेश करना, भारत के लिए नई मुसीबतों का रोपण है। जिस बांग्लादेश के कारण भारत में घुसपैठियों की समस्या विकराल हो गई हो, उसका चीन की शरण में जाना भारत के लिए खतरे की घंटी है।

यही हाल नेपाल का हो गया है। वहां के पीएम श्रीमान ओली चीन की शह पर भारत विरोध का नारा बुलंद किए हुए है। वे कोई ऐसा मौका हाथ से गंवाना नहीं चाह रहे हैं, जिसमें भारत-नेपाल के सबंधों पर बुरा असर पड़ता हो। लगता है-वे पूरी तरह चीन के पिट्ठू बन गए हैं और चीन के इशारों पर नाच रहे हैं।

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

एक और परियोजना है, जिसे बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) कहा जाता है। इसका आरंभ 2013 में किया गया है। इसके अनुसार, 2049 तक संसार के करीब 70 मुल्कों में चीन आधारभूत संरचना का निर्माण करनेवाला है। इसमें एशिया व यूरोप में सड़कों व बंदरगाहों का जाल बिछाना भी लक्ष्य है, जिससे चीनी सामानों की आवाजाही सुगम हो सके।

इस मामले में दुनिया बंटी हुई है। यदि यह परियोजना पूरी हो गई, तो दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी इसमें समाहित हो जाएगी और 40 प्रतिशत व्यापार इसी रास्ते से होने लगेगा। कई देश चीन की इस वैश्विक परियोजना  के समर्थक हैं, तो कई विरोधी। समर्थक इसे दुनिया के लिए हितकर बता रहे हैं, तो विरोधक शातिर खेल।

दरअसल, बुनियादी सुविधाओं का निर्माण महज एक दिखावा है, इसका असल मकसद अपना एकाधिकार कायम करना है। भारत को डर है कि इस नव उपनिवेशवादी परियोजना से चीन भारत को धेरने में कामयाब हो जाएगा।

मेड-इन चाइना

चीनी सरकार ने इसकी लांचिंग 2015 में की है। इसका मकसद चीन को 2025 तक तकनालाजी हब बनाना है, जो तकनीकी के दम पर दुनिया को दहला सके। मेड-इन चाइना में एयरोस्पेस, टेलीकम्युनिकेशंस, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलाजी, इलेक्ट्रिक वाहन आदि क्षेत्रों में ऐसे कलपुर्जों का निर्माण शामिल करना है, जो दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। यह संभव हुआ, तो समझिए अमेरिका, रूस सहित तमाम यूरोपीय देशों के वैश्विक बाजारों का भट्ठा बैठ जाएगा।

पैटेंट का जुनून

मेड-इन चाइना को धरातल पर उतारने के लिए चीन ने पैटेंट कानून का जमकर दोहन किया है। वल्र्ड इंटेलिएक्चुअल प्रापर्टी आर्गनाइजेशन के मुताबिक, चीन अमेरिका को पीछे धकेलकर पैटेंट करवाने के मामले में दुनिया में अव्वल हो गया है। कारण यह कि वह नवीकरण व तकनीक पर एकाधिकारवाद प्राप्त करना चाहता है। इस मामले में उसकी संचार कंपनी हुवाई टेक्नोलाजिस सबसे आगे है, जिसे अब तक 3500 के आसपास पैटेंट मिल चुका है।

अंतरिक्ष में चीन

चीन अंतरिक्ष में भी ऊंची छलांग लगाकर दुनिया में दूसरे नंबर पर काबिज हो गया है। यूनियन आफ कंसर्न साइंटिस्ट द्वारा 31 मार्च 2020 को जारी आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका 1326, चीन 363, रूस 169, भारत 121 और अन्य 686 उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुके हैं।

इससे चीन के पड़ोसी देश-ताइवान और अन्य सहित अमेरिका आशंकित है। चीन इसका इस्तेमाल अपने शत्रु देशों की जासूसी के लिए कर सकता है। इस आशंका को इसलिए भी बल मिलता है, क्योंकि ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्टेªशन’ चीनी सेना का अनुभाग है। इसका प्रशासनिक तंत्र चीनी सेना के लिए न केवल काम करता है, अपितु यह उसके प्रति जवाबदेह भी है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस

चीन हर मामलों की भांति आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में भी बढ़त बनाए हुए है। उसका ऐलान है कि वह अभी इस मामले में 8.4 अरब डालर का निवेश कर रहा है, लेकिन 2030 तक वह इसमें 150 अरब डालर का निवेश करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा।

उपसंहार

आशय यह कि चीन की हर योजना और परियोजना डरानेवाली है। इससे न केवल अविकसित व अल्पविकसित देश भयभीत हैं, अपितु विकसित देश भी भयाक्रांत हैं। उसकी शातिर चालों से जहां पड़ोसी देशों के कान खड़े हो गए हैं, वहीं दूरस्थ देश व यूनाइटेड नेशंस तक में चर्चा गर्म हो गई है कि डेªगन के नवसाम्राज्यवाद को किस तरह काबू में किया जाए। देखना यही है कि दुनिया चीनी उपनिवेशवाद की रोकथाम के लिए कौन-सा और कैसा कदम उठाती है।
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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद

चीन का विस्तारवाद

17वीं-18वीं शताब्दी मे दुनिया के चतुर-चालाक कहे जानेवाले मुल्कों ने जिन देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकता का अभाव था; उनके सत्ता-केंद्रों पर ऐन-केन-प्रकारेण दबदबा कायम किया। उनपर कब्जा किया और उन्हें गुलाम बनाया।

उनके संसाधनों पर कब्जा जमाकर उनका दोहन किया। कई छोटे, मध्यम व गरीब देशों से सुरक्षा के नाम पर उनसे वार्षिक फिरौतियां और रंगदारियां वसूली।

21वीं शताब्दी में चीन इसी नक्शेकदम पर चल रहा है, लेकिन जरा दूजे तरीके से। एकतरफ वह 6 पड़ोसी देशों के 41,13,709 वर्ग किमी क्षेत्र को हथिया लिया है, वहीं दूसरी तरह कमजोर व लाचार देशों में निवेश को हथियार बनाकर उन्हें गुलाम बनाने की हरचंद कोशिश कर रहा है। उसके द्वारा इन देशों से हथियाया गया क्षेत्रफल उसके सकल क्षेत्रफल का लगभग 43 फीसदी हिस्सा हो गया है।

वह तिब्बत, मंगोलिया, ताइवान, हांगकांग, मकाऊ और पूर्वी तुर्किस्तान को अपने देश का हिस्सा बताकर या तो कब्जा कर लिया है या कब्जाने के प्रयास में सतत लगा हुआ है। वह भारत के लद्दाख-केंद्र शासित प्रदेश के सियाचिन को भी 1962 में हड़़प लिया है। अभी उसकी कुदृष्टि गलवान घाटी पर लगी हुई है।

सियाचिन के संबंध में उसका दावा है कि यह क्षेत्र उसी का है, जिसे गुलाम भारत में अंगे्रजों ने जीतकर भारत में मिला लिया था। यही नहीं, वह आएदिन भारत के अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम में घुसपैठ करवाता रहता है। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत दृष्टांत है।

यही कारण है कि भारत के शत्रु देश-पाकिस्तान को वह अपना दोस्त बना लिया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का बचाव कर दुनिया को धोखा देने का काम करते रहते हैं। यह नीति चोर-चोर मौसेरे भाई जैसा है। चीन पाकिस्तानी आतंकवाद के समर्थन में खड़ा हो जाता है, तो पाकिस्तान, चीन में होनेवाले उइगर मुसलमानों के अत्याचार पर चुप्पी साथ लेता है।

चीन, बरबादी की ओर अग्रसर पाकिस्तान में 2442 किमी लंबा इकोनामिक कारिडोर बना रहा है, जो चीन के झिंजियांग को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ता है। इससे तेल, गैस सहित तमाम जरूरी चीजों का यातायात चीन के लिए सुगम होता चला जाएगा।

इसके बदले में चीन पाकिस्तान को 3.45 लाख करोड़ रुपए देगा। चीन बदले में अपने 5 लाख नागरिकों को ग्वादर पोर्ट पर बसाएगा। वाह क्या साठगांठ है, जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस चुका है? लेकिन, पाकिस्तान है कि कश्मीर की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है।

ऐसा ही मायाजाल वह श्रीलंका पर भी फेंका है। वह हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर ले लिया है। वहीं, श्रीलंकाई हवाईअड्डों, थर्मल पावर केंद्रों सहित विशाल बांधों में 36 हजार करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है।

यह निवेश फोकट में न होकर मोटे ब्याज में है। इससे श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है। परिणामतः, चीनी कंपनियां वहां के संसाधनों पर मालिकाना हक जताने लगी हैं।

चीन छोटे-से देश भूटान, जिसे भूगोल की भाषा में बफरस्टेट कहा जाता है, उसकी पूर्वी सीमा पर अपना दावा ठोंका है। यह सीमा भारत के अरुणाचल प्रदेश से लगती है। यही नहीं, वह पश्चिम व मध्य क्षेत्र को भी विवाद में घसीट लिया है। इस सबंध में चीन-भूटान के मध्य कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है।

दक्षिणी चीन सागर को वह अपना सागर बताता है। वह सेनकाकू द्वीप पर अपना दावा ठोंककर जापान से उलझता रहता है। जाहिरातौर पर इस दावे से वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान और ब्रुनेई के क्षेत्र में अतिक्रमण होता है, तो वे भी अपनी फौज लेकर वहां पहुंच जाते हैं। फिलीपींस के साथ इनकी दुश्मनी जगजाहिर है।

यही नहीं, चीन ने कैरेबियाई व दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के गरीब देशों को अपने औपनिवेशिक मोहपाश में उलझा दिया है। इस क्षेत्र में उसके निवेश का एकमात्र कारण अमेरिका व यूरोपीय देशों के वर्चस्व को तोड़ना है और अपना धाक जमाना है।
समंकों ने अनुसार, उसने जहां 2005-10 के दरमियान 59 देशों में अपना पैसा लगाया है, वहीं 2011 से 2019 तक 66 राष्ट्रों को अपने विनिवैशिक पाश में फांस लिया है।

मौजूदा दौर में चीन की विस्तारवादी नीति जमीन हड़पने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह छोटे-छोटे देशों की आर्थिक गतिविधियों को हथियार बनाकर उनके अर्थतंत्र को प्रभावित करने भी है। संसाधनों पर मालिकाना हक हासिल करने की है।

इन्हीं सब परिस्थितियों से परेशान होकर विश्व के 27 मुल्कों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में जाने का निश्चय किया है। इस मुद्दे पर यूएन महासभा में अनौपचारिक बहस भी हुई है, जिसकी अगुवाई अमेरिका और ब्रिटेन ने की है।

यह तय है कि भारत, चीन से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो चुका है। एक तो जमीन कब्जाने और निवेश कर फांसने की उसकी कुटिल नीति और दूसरे कोरोनावायरस से उत्पन्न तबाही से सारा विश्व उसके खिलाफ हो गया है। केवल पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को छोड़कर समूची दुनिया भारत को समर्थन देने और उसके साथ मिलकर चीन को सबक सिखाने के लिए आमादा है।

इन्हीं परिस्थितियों के दृष्टिगत भारतीय प्रधानमंत्री ने लद्दाख के 11 हजार फीट ऊंचे सैन्य ठिकाने नीमू में थलसेना, आईटीबीपी और वायुसेना के जवानों से मेल-मुलाकात कर सिंहनाद किया है,‘‘भारतीय सेना ने पराक्रम की पराकाष्ठा दिखाई है। अपनी वीरता से पूरी दुनिया को भारत की ताकत का संदेश दिया है। इतिहास गवाह है कि विस्तारवादी ताकतें मिट जाती हैं। विकासवाद जिंदा रहता है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लोग बांसुरीधारी कृष्ण को भी पूजते हैं और सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण को भी पूजते हैं। भारत शांति चाहता है, लेकिन मातृभूमि की रक्षा के लिए हमारा संकल्प हिमालय से भी ऊंचा है। लेह, करगिल और सियाचिन तक बर्फीली चोटियों से लेकर गलवान की ठंडे पानी की धारा तक; हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा, हर कंकड़-पत्थर भारतीय वीरों की पराक्रम की गाथा सुना रही है।

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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से amazon.com /virendra Dewangan से सर्च किया जा सकता है।

बुधवार, 1 जुलाई 2020

चीनी सामान का बहिष्कार

   चीनी सामान का बहिष्कार
     

         प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा देश में बने उत्पाद खरीदने के लिए आमजन से  अपील की गई है। इसके महज एक दिन पश्चात् केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी ऐलान किया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के सभी कैंटीन में 10 लाख जवानों के लिए 1 जून से सिर्फ स्वदेशी उत्पाद बिकेंगे।
उन्होंने इस बाबत देश की जनता से भी अपील की है कि आप देश में निर्मित उत्पाद ही ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल करें।

गौरतलब है कि सीएपीएफ में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल, नेशनल सिक्योरिटी गाड्र्स शामिल हैं। इन बलों की कैंटीन से 2800 करोड़ रुपया का सामान खरीदा जाता है।

स्वदेशी पर महात्मा गांधी के विचार

         महात्मा गांधी स्वदेशी के हिमायती थे। उन्होंने आजादी के संघर्ष के दौरान स्वदेशी आंदोलन चलाया। स्वदेशी पर उनका विचार इस प्रकार है,‘‘स्वदेशी की भावना हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती गांव, शहर व प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। हमें अपने पड़ोसियों और स्थानीयों के द्वारा बनाई गई वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए। इससे भारत का हर गांव और शहर एक स्व-आश्रित व स्वयं में पूर्ण इकाई बन जाएगा।

शिक्षाविद और इनोवेटर सोनम वांगचुक की मुहिम

          भारत-चीन टकराव के मध्य शिक्षाविद और इनोवेटर सोनम वांगचुक ने चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान आरंभ किया है। उन्होंने चीन को सबक सिखाने और उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर करने के लिए एक मुहिम छेड़ी है।

        उनका कहना है,‘‘अभी हम निर्माण, हार्डवेयर, दवा, मेडिकल उपकरण, चप्पल-जूते और इलेक्ट्रानिक्स व इलेक्ट्रिकल चीजों के लिए चीन पर निर्भर हैं। हमारे देश में इन सामानों का उत्पादन महंगा होता है, लेकिन चीनी सामान सस्ता मिलता है। यहीं देश की जनता को समझना होगा कि इन सामानों को बेचकर चीन अस्त्र-शस्त्र बनाता है और हमारे खिलाफ ही इस्तेमाल करता है। इसलिए हमें चीनी सामान का बायकाट क्रमबद्ध तरीके से करने की जरूरत है।’’


उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया, ‘‘जैनधर्मी लहसुन-प्याज व मीट-मटन नहीं खाते। वे प्रतिबद्ध हैं कि चाहे कुछ हो जाए, वे इसका सेवन नहीं करेंगे। नतीजतन, इसका असर बाजार पर पड़ा। ऐसे भोजनालय आरंभ हुए, जो शुद्ध शाकाहारी हैं। बदलती मांग ने नया बाजार विकसित किया। जिस तरह जैनियों के लिए जैन फूड बनाया जाता है, उसी तरह चीन पर निर्भरता खत्म करने के लिए गैरचायनीज बाजार खड़ा करना होगा।’’

मेड-इन-इंडिया मुहिम

       यह सत्य है कि चीन की कमर तोड़ने के लिए हमें स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करना चाहिए। मेड-इन चायना का बहिष्कार कर मेड-इन इंडिया को अपनाना होगा। भारत, चीन से हर साल 4.40 लाख करोड़ का सामान खरीदता है और 1.10 लाख करोड़ का सामान चीन भेजता है। इसलिए यह जरूरी है कि आयात घटाया जाए और निर्यात बढ़ाया जाए।

        यही नहीं, सरकार चीनी उत्पादों पर ड्यूटी बढ़ाता है, तो 1 लाख करोड़ का लाभ होता है। केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने लोगों से जहां चीनी सामान के बहिष्कार की अपील की है, वहीं चीनी उत्पादों पर बीआईएस के गुणवत्ता नियम सख्ती से लागू करने की बात कही है।


गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद 7 करोड़ दुकानदारों के संगठन कैट ने मुहिम आरंभ किया है-भारतीय सामान-हमारा अभियान। कैट ने चीनी सामानों की करोल बाग में होली जलाई है। कैट ने भारतीय अभिनेताओं और खिलाड़ियों से अपील की है कि वे चीनी सामान का विज्ञापन न करें।


       प्रधानमंत्री ने भी अपील की है कि व्यापारी हौसला बुलंद रखकर आत्मनिर्भर अभियान की अगुवाई करें। वहीं भारतीय रेलवे ने चीनी कंपनी का 471 करोड़ का ठेका और पार्ट लेने का करार रद्द कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने भी भविष्य में चीनी कंपनियों के साथ कोई समझौता नहीं करने को कहा है।


      उधर केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवाले ने कहा है कि चीन धोखेबाज देश है। भारत में चायनीज फूड बेचनेवाले सभी रेस्टोरेंट और होटल बंद कर दिए जाने चाहिए।


       इधर महाराष्ट्र सरकार ने 5020 करोड़ के तीन बड़े समझौते रोक दिए है, जो उन्होंने चीनी कंपनियों के साथ किए थे। गोवा सरकार का भी ऐसा ही संकेत है।

राज्यों में चीनी घुसपैठ      

       भारत के राज्य सरकारों तक में चीनी कंपनियों की घुसपैठ है। इनमें गुजरात राज्य चीनी निवेश के मामले में अग्रणी है, जहां 28 हजार करोड़ का निवेश हुआ है। इसके अलावा हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश में चीनी कंपनियां छाई हुई हैं। यही नहीं, ई-कामर्स, मीडिया/सोशल मीडिया और लाजिस्टिक क्षेत्र की 75 से ज्यादा कंपनियों में चीनी निवेश है। आशय यह कि स्टार्टअप की 60 प्रतिशत से अधिक कंपनियों में चीनियों का पैसा बोल रहा है।

चीन का व्यापार        

         भारतीय वाणिज्यिक मंत्रालय के अनुसार, चीन भारत को स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिकल उपकरण, खाद, आटो पार्ट, स्टील उत्पाद, टेलीकाम उपकरण, मेट्रो रेल कोच, लोहा, फार्मास्युटिकल सामग्री, केमिकल, बच्चों के खिलौने, घरेलू उपकरण, पटाखे, फुलझड़ियां, ईश्वरों की मूर्तियां, मच्छर मारने का इलेक्ट्रानिक रैकेट आदि-इत्यादि सामान कम दर पर बेचता है। यह आयात सकल भारतीय आयात का 14 प्रतिशत है।

       यही नहीं, उसने 150 से अधिक मुल्कों को कर्ज में जकड़ रखा है। इन मुल्कों को उनके द्वारा दिया गया कर्ज डायरेक्ट लोन और टेªड क्रेडिट के रूप में करीब 112.50 लाख करोड़ रुपए का है।


         यह वैश्विक जीडीपी का 5 प्रतिशत के बराबर है, जो विश्वबैंक व मुद्राकोष से भी बड़ा कर्जदाता है। भारत में भी चीन का निवेश और प्रोजेक्ट 26 अरब डालर के आसपास है।



चीन की नीयत खोटी       

       चीन का तमाम पड़ोसी देशों से सीमा-विवाद है। जापान, फिलिपींस, वियतनाम, ताइवान, तिब्बत, नेपाल, मलेशिया यहां तक कि रूस उसके विस्तारवादी कुनीति से परेशान हैं। वह एक साम्राज्यवादी देश है, जिसकी कुदृष्टि हमेशा अपने पड़ोसियों पर लगी रहती है।

       यही नहीं, वह दुनियाभर में अपने सैनिक अड्डे बना रखा है। विश्व के तमाम देशों का यही आरोप है कि कोरोनावायरस का जनक वही है। अमेरिकी राष्ट्रपति तक ने उसपर खुलेआम आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं, वुहान की लैब से निकला चीनी वायरस है।


       इतना ही नहीं, वह भारत को नीचा दिखाने के लिए पाकप्रायोजित आतंकवादियों तक का समर्थन करता है और सुरक्षा परिषद में अन्य देशों के द्वारा आतंकियों के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर बारबार वीटो करता रहता है।
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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से amazon.com /virendra Dewangan से सर्च किया जा सकता है।

boycott of chinese product

'रौशनी ' भूमि घपला

जम्मू जिला प्रशासन के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के अब तक के सबसे बड़े 25 हजार करोड़ के रौशनी भूमि संघ में सरकार व वनभूमि पर कब्जा जनेवले 1768 अचि...