शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

फिर एक बैंक घोटाला

फिर एक बैंक घोटाला

       बैंक लुटेरे विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चैकसी और विक्रम कोठारी का मामला अभी सुलझा नहीं है कि बैंकिंग क्षेत्र में एक और महाघोटाला सामने आया है। इस बार पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी बैंक में गड़बड़ी को लेकर प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज किया है।
       इसमें महाराष्ट्र के बड़े नेता, बैंक के प्रबंध निदेशक, नौकरशाह और कंपनियाॅं लपेटे में आई हैं। यह सहकारी बैंक क्षेत्र की लूट है। अभी कुछेक नाम सामने आएं हैं। जाने कितने बैंकों के अनगिनत लुटेरे और होंगे, जो सांठगांठ से गिरफ्त में आने से बचे हुए हैं।
      बैंकें अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बैंकों ने देश को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने; महाजनों व साहूकारों से मुक्ति दिलाने; उच्चवर्ग को व्यावासायिक और औद्योगिक सामथ्र्य प्रदान करने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। मध्यमवर्ग को मकान, मोटरगाड़ी, बच्चों को शिक्षा की सुविधा; किसानों को स्वावलंबी बनाने में उनका अहम योगदान है।
      सरकारी योजनाओं को चलाने; पेंशन और तमाम स्कीमों में लोकधन का भुगतान करने और वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने में उनके महती दायित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
      तमाम आलोचनाओं के बावजूद बैंकें आज भी लोकधन को सुरक्षित रखने का एकमेव साधन है। बैंकों में नागरिकों और सरकारों का धन न केवल सुरक्षित है, अपितु उसमंे जमाराशि पर  ब्याज का भुगतान भी होता रहता है।
      ये बैंकों के उजलेपक्ष पक्ष हैं, जो बैंकों के कर्तव्य और आवश्यकता को प्रतिपादित करते हैं। इसके लिए गांवों, कस्बों व छोटे शहरों में कार्यरत कर्मचारियों व शाखा प्रबंधकों का बैंकतंत्र बधाई का पात्र है। इन्होंने जनधन समेत लघु बचत के खाता खोलने, सरकारी योजनाओं सहित निराश्रित व वृद्धा पेंशन का भुगतान करने एवं छोटे-छोटे ऋण देकर आमजन की माली हालत सुधारने में अहम दायित्व निभाया है।
      गांवों, कस्बों व शहरों के ये बैंकिंग कर्मचारी-अधिकारी बैंकिंग पद्धति के वास्तविक खेवनहार हैं। लेकिन, इनकी शिकायत गंभीर है कि बैंक प्रबंधन इनसे केवल काम लेता है। किसी रसूखदार को ऋण देने में अपनी चलाता है। प्रबंधन तानाशाह है। बंधुआ मजदूर की तरह काम करवाता है। किंतु, समय पर वेतन नहीं देता। वेतन आयोग के स्वत्वों का भुगतान करने में हीलाहवाला करता है।
      ग्रामीण और कस्बाई इलाकों के ब्राॅंचों में कर्मचारियों की बेहद कमी है। छोटे से छोटे बैंकों में कम से कम तीन स्टाॅफ होना चाहिए। एक मैनेजर, एक कैशियर और एक लेखापाल। लेकिन बैंक प्रबंधन की धनधोर लापरवाही की वजह से स्वीकृत पदों पर भी भर्तियाॅं नहीं की जाती।
     देश में एक ओर बेरोजगारी सिर चढ़कर बोल रही है, युवा नौकरी के अभाव में दिग्भ्रमित हो रहे हैं, तो दूसरीओर बैंकों और सरकारी कार्यालयों में पदरिक्त हैं। यह प्रबंधन की गैरजिम्मेदारी का नतीजा है? इससे जहाॅं काम का अनावश्यक बोझ बढ़ता है, वहीं काम के बिगड़ने का अंदेशा बना रहता है। कर्मचारी असमय बीमार होकर बूढ़ा हो जाता है।
      इसे बदहाली कहा जाता है। बैंकों की दुर्दशा का आलम यह है कि कहीं केवल एक कर्मचारी है, तो कहीं दो। इससे कार्य का बोझ कितना बड़ जाता है। इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि बैंकों के छोटे कर्मचारी देर रात तक और अवकाश के दिनों में भी कार्य करते देखे जाते हैं।
     बैकिंग प्रणाली का एक स्याहतंत्र भी है, जो अत्यंत डरावना, विभत्स और लोकधन का लुटेरा है। ये उन गब्बर सिहों, लाखन सिंहों और मलखान सिहों से भी ज्यादा खतरनाक हैं, जो बंदूक का खौफ दिखाकर सरेआम लोगों को लूटते थे। ये बैंकिंग प्रणाली के वे महाडाकू हैं, जो पद के नशे में चूर राष्ट्रधन पर गुपचुप सेंधमारी करने में लगे हैं।
      यह वह अधिकारसंपन्न तंत्र है, जो केवल हुक्म फरमाता है। दलालों, माफियाओं, धनकुबेरों व रसूखदारों से रिश्वत लेकर अनापशनाप ऋणों की स्वीकृतियाॅं करता है। दूसरें शब्दों में बैंकतंत्र के ये वे बागड़ बिल्ले हैं, जो जिस बागड़ की हिफाजत के लिए तैनात हैं, उसी को तहस-नहस करने पर आमादा हैं।
     बैंके ऋण देने के सामान्य नियम का भी पालन कर लेते, तो बैंकों पर यूॅं ऊॅंगलियाॅं नहीं उठती। इधर आम आदमी को एक कर्ज रहते दूसरा कर्ज नहीं मिलता; उधर खास आदमी को बैंकें कर्ज पर कर्ज देती रहती हैं। ऊपर से जमानतदार व नो ड्यूस लगता है। वे तमाम दस्तावेज लगते हैं, जिसको जुटाते-जुटाते साधारण आदमी की कमर टूट जाती है।
     अब रिजर्व बैंक सहकारी बैंकिंग क्षेत्र मंे बड़े बदलाव पर विचार कर रहा है। सवाल यही कि अब क्यों? पहले क्यों नहीं किया? जबकि सहकारी बैंक दोहरे नियमन से गुजरते हैं। ये रिजर्व बैंक के दायरे में तो हैं, लेकिन उनपर वास्तविक नियंत्रण सहकारी समितियों का रहता है। इन समितियों पर नेता काबिज रहते हैं। बंदरबाट उनका एकसूत्रीय कार्यक्रम रहता है।
     बैंक के डकैतों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, ताकि कोई भविष्य में लूटकांड करने के पहले सौ बार सोचे। लोन देने की सारी प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। आडिटतंत्र व निरीक्षणतंत्र को भी जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। अधिकारियों-कर्मचारियों का तबादला भी 3-4 साल में अनिवार्यतः होना चाहिए। कर्मचारी-अधिकारियों की भर्ती भी युद्धस्तर पर किया जाना चाहिए।

     बैंकों के प्रबंधकीयवर्ग को हरेक ऋण-प्रदायगी के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। आरबीआई को बैंकों के बैंक के रूप में तथा सरकार के वित्त मंत्रालय को निदेशक एवं नियंत्रक के रूप में जवाबदेहीपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। तभी बैंकों की विश्वसनीयता कायम रह सकती है।

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