सोमवार, 1 जून 2020

महापलायन से सवाल

                                                           

देशभर के गांवों, कस्बों व छोटे शहरों से बड़े शहरों में कामकाज और दिहाड़ी करने के वास्ते करीब 10 करोड़ लोग जाते-आते हैं। इनमें से ज्यादातर, सीलबट्टा बनाने, कूली-मजूरी करने, फुटपाथ पर रेहड़ी लगाने, पटरी पर छोटे-मोटे सामान बेचने, धनकुबेरों के यहां झाडू-पोछा-बरतन, माली का काम करने व खाना बनाने का काम करते हैं।


        वहीं, कई मुफलिस दुकानों में सामान बेचने, ईंट बनाने, भवनों का निर्माण करने, रिक्शा व तांगा चलाने, बागवानी व खेती में काम करने, फार्म हाऊसों की देखरेख करने, आटो, रिक्शा व ई-रिक्शा चलाने, गन्ने व फलों का जूस बेचने, मनिहारी का सामान बेचने, फेरी लगाने, पेपर बेचने और छोटे-मोटे अन्य कार्यों में लगे रहते हैं। इन्हें रोज कमाने और रोज खानेवालांे में शुमार किया जाता है।

         लाकडाउन का एकाएक एलान होना और यात्री परिवहन के संसाधनों का सहसा बंद हो जाना इनके लिए कोढ़ में खाज साबित हो गया। एक ओर कुंआ, दूसरी ओर खाई बन गया। इन्हें जब परिवहन के साधन की अनुलब्धता दिखी, तो वे मरते क्या न करते, अपने-अपने घरों की ओर पैदल, सायकिल, ट्रक और अन्य साधनों से निकल पड़े।

         ये लोग दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बैंगलुरु, अहमदाबाद, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद, लखनऊ आदि तमाम बड़े नगरों-शहरों में जाकर दिन में काम करते हैं और रात को किसी फुटपाथ, पुल के नीचे, टेंट में या किसी सूने भवन में रात गुजारते हैं या किराये के एक कमरे में रहते हैं।

          जब लाकडाउन हुआ, इनकी रोजी-रोटी छिन गया। संस्थाओं और व्यक्तियों ने इन्हें काम से निकाल दिया। दुकान और कामधाम बंद हो गया, तो ये स्वभावतः बेरोजगार हो गए। गरीब तबके के ये लोग जो कुछ बचा कर रखे थे, कुछ दिनों के खाने-पीने में लगा दिए।

          शासकों और प्रशासकों ने इनपर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए था। काल सेंटरों से कोई रिस्पांस नहीं मिला। वे या तो नाट रिस्पांस पाए गए या इतना बिजी कि कोई उनको रिस्पांस करने के लिए दिन-दिनभर खाली नहीं मिला।

         यद्यपि सरकारों व स्वयंसेवी संस्थानों ने इनके लिए भोजन-पानी और रहने का प्रबंध किया, तथापि वे अपर्याप्त थे। लिहाजा, ये भूखे-प्यासे पैदल चल पड़े। कोई 1200 किमी की यात्रा तय किया, तो कोई 1000, 800, 500, 400, 200 व 100 किमी की यात्रा कर घर पहुंचने के लिए विवश हुआ।

         इनमें कइयों ने रास्ते पर दम तोड़ दिया। इसमें सर्वाधिक लोग यूपी, बिहार, झारखंड, मप्र व छत्तीसगढ़ के हैं, जो दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, मप्र आदि राज्यों में दिहाड़ी पर काम करते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल में दिखी, जहां 20 हजार से ज्यादा लोग बस पकड़ने के लिए पहुंच गए। बसवाले इनकी मजबूरी का बेजा फायदा उठाकर औने-पौने दाम वसूले।

        यही आलम द्वितीय लाकडाउन के ऐलान के बाद 14-15 अपै्रल के दरमियानी दिन में मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन, गुजरात के सूरत, पश्चिमी बंगाल के मुर्शिदाबाद में देखने को मिला।

         सरकारें फखत घोषणा करती रही कि इनके लिए रैन बसेरों और भोजन का प्रबंध किया गया है, लेकिन इंतजाम मिथ्या साबित हुआ। ऐसे मजलूमों से क्या सोशल डिस्टेंसिंग की नीति का पालन करवाया जा सकता था, जो भूखे-प्यासे हों?

       केंद्र सरकार को 24 मार्च को लाकडाउन करना जरूरी ही था, तो कम-से-कम तीन दिन पहले ऐलान करना चाहिए था कि देश में कोरोना संकट के कारण लाकडाउन किया जा सकता है। परिवहन के संसाधन बंद हो सकते हैं। जिस किसी को अपना घर जाना हो या कहीं सुरक्षित ठिकाना तलाशना हो, वहां वे 23 मार्च की रात तक पहुंच जाएं। इससे जहां अफरातफरी नहीं मचती, लोग भूख-प्यास से बच जाते, वहीं लाकडाउन का असल मकसद पूरा हो जाता।

        क्या नीति-नियंताओं को यह नहीं पता था कि देश में 21 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं? उन्हें दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है। ये गांव की गंदीबस्तियों, जंगलों, कंदराओं व नगरों-शहरों की झुग्गीझोपड़ियों में रहते हैं।

       देश में लगभग 10 करोड़ से अधिक लोग बेरोजगारी के चक्रब्यूह में उलझकर दिहाड़ी व हफ्तावारी मजदूरी करने और पलायन करने के लिए लाचार हैं। यह ऐसी आबादी है, जो ज्यादातर अशिक्षित, अल्पशिक्षित व असंगठित हैं। सरकार को इसकी सम्यक जानकारी रखनी चाहिए थी, फिर लाकडाउन का ऐलान किया जाना था।

      लाकडाउन 3 के बाद तो यह महापलायन ़त्रासदी में बदल गया। संभवतः ऐसा ह्दयविदारक दृश्य भारत-विभाजन के दरमियान भी नहीं देखा गया। मजबूरों का कारवां इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि देश सन्न रह गया। गाड़ी-मोटर के अभाव में नेशनल हाईवे में लोगों को 1200-1000 किमी से अधिक पैदल व सायकिल से चलना पडा।

      पैरों में छाले पड़ गए। छालों के दर्द से बच्चे, बूढे़ व जवान बिलख पड़े। रास्ते में चप्पल टूटने से 40-45 डिग्री तापमान में डामर व सीमेंट कांक्रीट की सड़कों पर पैदल चलना कितना कष्टकर हो सकता है, यह भुक्तभोगी ही बता सकता है। कोई अपने बच्चे को कंधे पर बिठाकर, पीठ पर बांधकर और सामान को सिर पर लादकर चला, तो कोई बच्चे को सूटकेस में सुलाकर।

हादसे-दर-हादसे

औरंगाबाद में 16 लोग रेलपटरी में सोते हुए मालगाड़ी की चपेट में आ गए। कइयों को बसों ने रौंद डाला। उप्र के चंदौली में पटरी पर सो रहे तीन महिला समेत चार श्रमिक स्पेशल टेªन से कटकर दम तोड़ दिए।

बिहार के पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून सादातपुर में लखनऊ-मुजफ्फरपुर हाईवे किनारे इसलिए रोते-बिलखती रही, क्योंकि उसके पति को एक ट्रक ने ठोकर मारकर उसका एक पैर तोड़ दिया था।

मुसाफिरों को दिल का दौरा पड़ गया। भूखे-प्यासे दम तोड़ दिए। कई परिवार एक रोटी को चार-चार टुकड़े कर खाते दिखे। बच्चों को दूध तो क्या, पानी तक नसीब नहीं हुआ? यह श्रमिकवर्ग का भीषण जद्दोजहद व त्रासदी था, जिसे देख, सुन व पढ़कर रूह कांप उठी।

औरैया में हाईवे किनारे खड़े ट्रक को चूने से भरे दूसरे ट्रक ने ठोकर मारी और स्वयं पलट गया। इसमें सवार 100 श्रमवीरों में-से 24 काल-कवलित हो गए। ये श्रमिक झारखंड, बिहार व प. बंगाल के थे।

मप्र के छतरपुर में सागर-कानपुर हाईवे पर कपड़े के लट्ठों से भरी लारी के पलट जाने से 6 श्रमिकों का देहांत हो गया। ये श्रममूर्ति महाराष्ट्र से यूपी के लिए रवानगी लिये थे। इस दर्दनाक हादसे में लारी में सवार यूपी की गुड़िया की मौके पर मृत्यु हो गई। 5 साल की बेटी आलिया गंभीर रूप से आहत है। 2 साल का मासूम पुत्र अपनी मां के मृत देह के पास घंटों इस आस में बिलखता रहा कि उसकी मां कभी तो उठेगी। उसके पिता का 6 माह पूर्व निधन हो चुका है। 11 वर्षीय पूजा और कृष्णा ने भी इस दुर्धटना में अपने माता-पिता को सदा-सर्वदा के लिए खो दिया।

आगरा में एक्सप्रेस-वे पर लोडर ने एक आटो को ठोकर मारी। आटो से बिहार जा रहे अशोक व उनकी पत्नी को मौत अपने घर ले गई। 6 साल का अबोध बेटा यहीं रह गया। अलीगढ़ में एक मां-बेटा भी हादसे के शिकार हो गए।

बलिया, बनारस और दानापुर में 5 विशेष टेªनों में 5 श्रमवीरों के शव बरामद हुए। ये टेªनें मुंबई, सूरत सहित 5 विभिन्न शहरों से पहुंची थीं। वहीं मुंबई से हावड़ा जाने के लिए निकले 29 साल के हिजबुल रहमान की रायपुर में मृत्यु हो गई।

सूरत से यूपी के जौनपुर लौटे तीन प्रवासियों की तेज बुखार, खांसी व सांस की दिक्कत से मौत हो गई।
पुलिस में दर्ज केसों के अनुसार, देशभर में लाकडाउन के 65 दिनों में 150 से अधिक श्रमवीरों ने अपनी ईहलीला समाप्त कर ली है। वहीं मद्रास हाईकोर्ट के बेंच ने केंद्र सरकार व तमिलनाडु सरकार से जवाबतलब करते हुए इन हादसों पर टिप्पणी की है,‘‘एक महीने से प्रवासी मजदूरों की दयनीय दशा देखकर कोई अपनी आंसूं नहीं रोक सकता। यह मानवीय त्रासदी के अलावा और कुछ नहीं है। काफी इंतजार के बाद मजदूर पैदल ही घर लौटने को मजबूर हुए हैं।’’


रेल मंत्रालय ने करीब 5000 श्रमिक स्पेशल रेलों की व्यवस्था तो की, लेकिन वहीं तक, जहां तक ले जाने की मांग राज्य सरकारों द्वारा पेश की गई। श्रमिक स्पेशल टेªनें लोगों से कीमत वसूली गई। रेलों से करीब 20 लाख मजदूर गंतव्य तक पहुंचे। इधर केंद्र का कहना है कि राज्यों से जितनी मांग आई, उतनी रेलगाड़ियां चलाई। उधर, राज्य सरकारों का दावा है कि हमने जितनी मांग की, उतनी रेलगाड़ियां नहीं चलाई।

इसकी जानकारी दो राज्यों से आनी थी। एक उस राज्य से जहां से मजदूर निकल रहे हैं, दूसरे उस राज्य से जहां मजदूर पहुंचना चाह रहे हैं। राज्यों में आपसी तालमेल का अभाव दिखा। मजबूर मजदूर आवागमन के साधनों के अभाव में पैदल घर के लिए निकल पड़े। जिन्हें ट्रकों का सहारा मिला, वे भेड़-बकरियों की तरह लदकर भारी-भरकम किराया देकर पहुंचे।

प्रशासन पंगु दिखा। कहीं कोई नियंत्रण नहीं, जांच नहीं, लाकडाउन व आपदा प्रबंधन के नियम का पालन नहीं। कुपरिणाम यह कि जहां मजदूर हलाकान हुए, वहीं कोरोना के संक्रमितों की संख्या एकाएक बढ़ती चली गई। हालांकि व्यवहारिक रूप से यह काम उतना आसान नहीं, जितना दिखता है, लेकिन सरकारों का यूं घुटने टेंकना कई सवाल भी खड़े करता है।

जिन राज्यों में ये मजदूर काम कर रहे थे, वहां वे कृषि, उद्योग और सेवाक्षेत्र की रीढ़ हैं। ये मजदूर भले ही किसी एक राज्य से संबंध रखते हों, परंतु वे दो राज्यों की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं। एक राज्य में काम करते हैं, तो दूसरे राज्य में अपने परिवारों के पालनपोषण के लिए रुपया भेजते हैं। आय और व्यय का यह अर्थतंत्र परस्पर जुड़ा हुआ है। इनसे देश के विकास व उन्नति का अन्योन्याश्रित संबंध है।

जिस तरह विदेशगामी व्यक्ति विदेशी मुद्राभंडार बढ़ाने में अहम योगदान देता है, उसी तरह कमाने-खाने के लिए परप्रदेश गया हुआ व्यक्ति अपने गृहप्रदेश के अर्थतंत्र को मजबूती प्रदान करता है। जैसे थल के बिना जल नहीं ठहरता, वैसे ही श्रमिकों के बिना निर्माण, प्रगति, उन्नति और विकास नहीं हो सकता। श्रमिक वे थल हैं, जिनके बगैर विकास का जल नहीं ठहरता।

प्रवासी मजदूरों के लिए आललाइन डैशबोर्ड

लाकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की आवाजाही की प्रक्रिया आसान बनाने और उनकी कांन्टैक्ट टेªसिंग के लिए केंद्र सरकार ने एक आनलाइन डैशबोर्ड लांच किया है, जिसका नाम नेशनल माइग्रंेट इंफो सिस्टम है। दावा है कि इससे केंद्र सरकार व राज्य सरकारों में आपसी समन्वय बेहतर होगा। वे इसके माध्यम से मजदूरों से आसानी से संपर्क कर सकेंगे। डैशबोर्ड की विशेषता इस प्रकार होगी।


1. प्रवासी मजदूरों को भेजनेवाले और बुलानेवाले राज्य पोर्टल पर एक-दूसरे को जानकारी देंगे।

2. पोर्टल पर प्रवासी मजदूरों का नाम, उम्र, मोबाइल नंबर, गंतव्य और यात्रा की तारीख दर्ज होगी। इससे पता चलेगा कि किस राज्य से कितने प्रवासी गए और कितने आए।

3. मोबाइल नंबर से श्रमिकों पर नजर रखी जा सकेगी। यह पता करने में मदद मिलेगी कि वह पिछले दिनों किस-किस से मिला।

4. हर प्रवासी को विशेष पहचान संख्या भी आवंटित की जाएगी। उससे संबंधित सभी जानकारियां दर्ज रहेंगी।

5. केंद्र के नोडल मंत्रालय भी पोर्टल के जरिये प्रवासियों की आवाजाही पर नजर रख सकेंगे।

इस भागमभाग में बहुतेरे सदभावी फरिश्तों ने मजदूरों के आंसू पोंछने का खूब प्रयास किया है, कोई उन्हें खाना खिलाया है, कोई पानी पिलाया है, कोई चप्पलें बांा है, कोई अपने साधनों से इन्हें इनके घरों तक पहुंचाया है। ये छोटे प्रयास काबिलेतारिफ हैं।

लेकिन असल सवाल करोड़ों-करोड़ मजदूर-परिवारों का है। उनकी जीवन-मृत्यु का है। अस्मिता का है। सरकारों को इनके लिए ठोस कदम उठाने का है। इनका आंसूं पोंछना और बेहतर भविष्य के निर्माण का है।

ये मजदूर देश के निर्माण में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं, इसलिए महापलायन की इस भयावह त्रासदी में हे सरकार जागो! ...और अपने मजदूरों की फिक्र करो।

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