सोमवार, 15 जून 2020

कोरोना से सबक

कोरोना से सबक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना कहर के बीच सरपंचों के साथ वीडियो-कांफ्रेंसिंग में गत दिवस कहा है कि ‘‘कोरोना ने कई मुसीबतें पैदा की है। लेकिन, इसका सबसे बड़ा सबक है कि हमें अत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। गांव, जिला, राज्य और देश अपने स्तर पर मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर बने। यह जरूरी हो गया है कि जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरों का मुंह न देखना पड़े।’’ 


       उन्होंने आसन्न संकट से बचने के लिए फिर मंत्र दोहराया, ‘‘दो गज देह की दूरी, संगरोध, बच्चों व वृद्धों का एकांतवास, बारबार साबुन से हाथ धोना, सेनिटाइजेशन करना और मुखौटा धारण करना।’’ के नियमों का पालन तब तक करना चाहिए, जब कोरोना वायरस से पूर्णतया मुक्ति नहीं मिल जाती।
इसी तरह की बात डब्ल्यूएचओ के मलेरियारोधी कमेटी प्रमुख प्रो. मार्सेल टेनर ने कही है,‘‘भारत में जनसंख्या धनत्व बहुत ज्यादा है। यहां कामगार एक राज्य से दूसरे राज्य आते-जाते हैं। ऐसा ही यूरोप में होता है। यूरोपीय देश सोच, व्यवहार और चिंतन में खुद को चीन और दक्षिण कोरिया की तुलना में भारत को अपने करीब पाते हैं। ऐसे में लाकडाउन के बाद भारत अपने लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक हितों को कैसे नियंत्रित करता है, यह प्रबंधन दुनिया के लिए एक सबक हो सकता है?’’



        दुनियाभर में कोरोना का कहर जारी है। कोरोना ने उन मुल्कों की हालत ज्यादा खराब कर दी है, जिन्हें सुविधासंपन्न समझा जाता था। फिर चाहे वह अमेरिका, इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, रूस, चीन या ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड ही क्यों न हो। सारी दुनिया इन देशों की स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और संपन्नता से आकर्षित होकर वहां जाना, रहना, काम करना और बसना चाहती थी।

        भारत सहित दुनियाभर के लोग वहां पढ़ने, जाब करने और इलाज कराने के लिए लालायित रहते थे। लेकिन, कोरोना वायरस ने इन देशों की पोलपट्टी खोलकर रख दी है। लोगों की धारणाओं को बदलकर रख दिया है।
        यूएन के महासचिव एंटोनियो गुतेरेस ने कोरोना महामारी को दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के लिए सबसे बड़ा संकट करार दिया है। उन्होंने कहा है कि कोरोना से ऐसी मंदी आनेवाली है, जैसी हाल के दिनों में कभी नहीं आई है। 

        येे देश  दौलतमंद जरूर हैं, लेकिन इनके पास न संस्कार, संस्कृति है, न आस्था, पारिवारिकता व सामाजिकता है, जो दुनिया के संस्कारवान व संस्कृतिवान अविकसित मुल्कों के पास है।


इटली आदि धनी मुल्कों में कोरोना से लड़ने के जब संसाधन कम पड़ने लग गए, तब वहां की सरकारों ने बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़कर युवाओं का सुध लेना आरंभ किया था।

        यहां तक कि कोरोना से मृत व्यक्तियों के बीच वृद्धों को मरने के लिए यूं ही छोड़ दिया गया था। यह कैसा संस्कार है, जो वृद्धों को असहाय और अशक्त जानकर उन्हें मरने के लिए यूं छोड़ दिया जाता है?
जबकि भारत आदि संस्कारी मुल्कों में वृद्धों को भी उतना ही तवज्जो दिया जाता है, जितना कि एक जवान को। यहां वृद्ध और जवान में भेदभाव नहीं किया जाता है, बल्कि वृद्धों, महिलाओं व बच्चों को सदैव प्राथमिकता में रखा गया है।

कोरोना के संकट के दृष्टिगत उससे सबक इस प्रकार लिया जा सकता है।

1. सुरसा के मंुह की तरह बढ़ती जनसंख्या को गंभीरता से नियंत्रित करना सबकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि बढ़ती जनसंख्या न केवल सभी समस्याओं की जननी है, अपितु कोरोना जैसी महामारी के दरमियान जनसंख्या का घनत्व विकराल समस्या के रूप में सामने आकर चुनौतियां पेश कर रहा है।

2. इसके लिए प्रत्येक भारतीय परिवार के लिए ‘हम दो, व हमारे दो’ की नीति को पूर्ण संजीदगी व कठोरता से लागू करना-करवाना ही एकमात्र उपाय होना चाहिए। एक बच्चे वाले परिवारों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए.

3. गरीबी और बेरोजगारी को भी हरहाल में समाप्त करना चाहिए। गरीबी दूर करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता में रखना होगा। गरीबों को कामधंधे से लगाने के लिए ठोस योजनाएं बनानी व चलानी होगी। योजनाएं ऐसी होनी चाहिए, जो न केवल गरीबी का उल्मूलन करे, अपितु बेकारी का भी शमन करे।

4. शिक्षा की योजनाओं को विस्तारित करना होगा। नए-नए स्कूल-कालेज खोलने होंगे। उनमें साधन-सुविधाएं एवं शिक्षक व स्टाफ की व्यापक पैमाने पर भर्ती करनी होगी।

5. वर्क फ्राम होमः जब कोरोनाकाल में सरकार, कंपनियां और अन्य संस्थान वर्क फ्राम होम से काम चला सकती हैं और उसमें सफल भी हो सकती हैं, तो इस कार्य-संस्कृति को परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में भी अपनाया जाना चाहिए। इससे जहां सड़कों पर भीड़-भाड़ कम होकर प्रदूषण न्यूनतम रहेगा, वहीं दुर्घटनाओं में खासी कमी आएगी।

6. सरकार को राष्ट्रीय विपदा के दरमियान निजी स्वास्थ्य सेवाओं सहित उन समस्त सेवाओं व संस्थानों का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए, जो राष्ट्रीय आपदा के दरमियान मददगार साबित हो सकते हैं।

7. पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। उसको दैवीय व मानवीय आपदाओं से लड़ने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। इसके प्रशासनिक सुधार और पुलिस सुधार को अमलीजामा पहनाने की जरूरत है।

8. विपदा के कठिन वक्त में पुलिस व फौज को पूरा अधिकार देना चाहिए, ताकि वे निष्पक्षता व निर्भीकता से अपने काम को अंजाम दे सकें। उनपर राजनीतिक हस्तक्षेप कतई बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।

9. अभी देश में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 151 पुलिसकर्मी हैं, जो अपर्याप्त है। इस संख्या को हर हाल में नई भर्ती कर बढ़ाया जाना चाहिए। इससे जहां बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, वहीं पुलिस को आपदा से निपटने में बल मिलेगा।

10. वर्तमान में देश में प्रति 1 लाख आबादी पर 10 डाक्टर हैं, जो अत्यल्प है। देश में एक ओर डाक्टरों की कमी से एक बड़ी आबादी इलाज से वंचित रह जाती है, वहीं एमबीबीएस पास नौजवान बेकारी से परेशान रहते हैं। इसी तरह स्वास्थ्यकर्मियों व तकनीशियनों का भी युद्धस्तर पर नियुक्ति की जानी चाहिए।

11. पूजा व इबादत स्थलों के प्रवेश-निषेध पर नए कानून बनाने की आवश्यकता है, ताकि लोग धर्म के बजाय राष्ट्र को प्राथमिकता में रखें और कोई धार्मिक अनुष्ठान व क्रियाकलाप करने के पूर्व राष्ट्र के नियमों व अधिनियमों का पालन अक्षरशः करना सीखें।

12. धर्म की आढ़ में संवैधानिक कायदे-कानून का उल्लंधन ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और ऐसे बंदों को देशनिकाला या कड़ी-से-कड़ा सजा दिया जाना चाहिए।

13. देश में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, जलसे, समारोह के आयोजन के लिए कड़े कायदे-कानून बनाना चाहिए और उसे संजीदगी से पालन करवाना चाहिए।

14. स्वच्छता और साफ-सफाई को अभियान के रूप में चलाया जाना चाहिए। नालियों, तालाबों, नदी-नालों की सफाई नियमित की जानी चाहिए। जलस्त्रोतों के रखरखाव का विशेष प्रबंध किया जाना चाहिए।

15. अपनी पूरी ताकत से कोरोना के खिलाफ संग्राम कर रहे स्वयंसेवी संस्थाओं को चिंहित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें भी बीमा संरक्षण देना चाहिए।

16. चीन जैसे चालबाज देशों को छोड़कर अन्य देशों के निवेशकों को भारत में पूंजी-निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहिए और अधिकाधिक उद्योग-धंधे स्थापित कर बेरोजगारों को रोजगार देना चाहिए।

17. जो लोग या संस्था आपदा कानून का पालन नहीं करते हैं और देश को खतरे में डालते हैं, उनके खिलाफ रासुका के तहत कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए।



18. एक राज्य से दूसरे राज्य में श्रमिक के रूप में प्रवास करनेवाले श्रमवीरों का दोनों राज्यों में पंजीयन किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों की वास्तविक जानकारी केंद्र व राज्य के पास रहे, जिससे योजनाओं में उनको सबसे पहले लाभ दिया जा सके।

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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से virendra Dewangan/amazon.com में सर्च किया जा सकता है।
         

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