सोमवार, 22 जून 2020

चीन की चालबाजी

चीन की चालबाजी
कोरोनाकाल में भी अपनेआप को मजबूत देश और अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ताकतवर नेता दर्शाने के लिए चीनी सैनिकों ने उस गलवान घाटी पर भारतीय सैनिकों से हिंसक झड़प किया, जहां 1962 में जंग की शुरूआत की गई थी।

हिंसक झड़प में 15 जून 2020 की रात जहां 43 चीनी सैनिक मौत को प्राप्त हुए, वहीं एक कर्नल, एक सूबेदार, एक नायक, दो नायब सूबेदार, तीन हवलदार सहित 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए।

इनमें-से कईयों की शादी अभी-अभी हुई थी। कईयों के मां-बाप बूढ़े हैं। कईयों के बच्चे हैरानी से देख रहे हैं कि उसके पापा को क्या हो गया, जो ताबूत में कैद हैं, उठ नहीं रहे हैं? इस साजिशन हमले में 76 जवान घायल हो गए हैं। 18 जवानों की चोटें गंभीर हैं, तो 58 जवानों को हल्की चोटें आई हैं।

गलवान घाटी समुद्रतल से करीब 15 हजार फीट ऊंचाई पर है, जहां भरी गरमी में भी दिन का तापमान जीरो डिग्री सेल्सियस से कम रहता है। कहा जाता है कि 15 जून को चीनी राष्ट्रपति-शी जिनपिंग का जन्मदिन था। उधर चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी जश्न मना रही थी, इधर चीनी सेना दरिंदगी पर उतारू थी।
1962 की जंग के 58 साल बाद यह पहला अवसर है, जिसमें गलवान क्षेत्र में हिंसात्मक नोंकझोंक, झड़पें, छड़बाजी-लोहे के राड से हमला और पत्थरबाजी हुई, जिसमें दोनों ओर के सैनिक हताहत हुए।

सूत्रों के अनुसार, यहां गोली एक भी नहीं चली, परंतु झड़पें खूनी संघर्ष में बदल गईं। खूनी हाथापाई व धक्कामुक्की घाटी की चोटी पर हुआ, इसलिए 4 जवान गलवान नदी में गिर पड़े, जिनकी जान बर्फानी ठंड की वजह से चली गई। गौरतलब है कि गलवान क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के चुसूल काउंसिल के अंतर्गत आता है। यहां आटोनामस हिल डेवलपमेंट काउंसिल कार्यरत है।


झड़पों का इतिहास

इसके पूर्व 2017 में अरुणाचल प्रदेश के चीनी सीमा पर डोकलाम में गतिरोध उत्पन्न हुआ था। भारतीय सेना ने चीनी सड़क बनाने की कोशिशों का जमकर विरोध किया था। यह विवाद 73 दिनों तक चला था।

2018 में चीनी सैनिकों ने डेमचोक सेक्टर-लद्दाख के अंदर 300 मीटर दूर टेंट का निर्माण किया था। इससे विवाद और टकराव बढ़ गया था।

9 मई 2020 को 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित नाकू-ला में भारत-चीन के 150 सैनिक आमने-सामने आ गए थे। इसमें मुक्केबाजी, खींचतान, धक्कामुक्की और घूसाघूसी हुई थी, जिसमें 10 फौजी आहत हो गए थे।

5 मई 2020 को पेंगोंग त्सो झील-लद्दाख के उत्तरी किनारे पर फिंगर-5 इलाके में भारत-चीन के लगभग 200 सैन्यबल एक-दूसरे के सामने आ गए। यहां भी मामूली झड़पें और धक्कामुक्की हुई।

2020 में करीब माहभर से अधिक समय से होनेवाली झड़पों को सुलझाने के लिए 6 जून, 10 जून और 12 जून को कोर कमांडर और लेफ्टिनेंट जनरल स्तरीय वार्ताएं हुईं, जिसमें यथास्थिति बहाल करने और अपने-अपने सैनिकों को वापस अपने बैरकों में बुलाने पर सहमति बनी थी।

सैनिकों को मौजूदा हालात से 2-3 किमी पीछे हटना था। किंतु, पैतरेबाज चीन बाज नहीं आया। वार्ता को अमलीजामा पहनाने की हिदायत पर बड़ी हिंसक वारदात को अंजाम दे बैठा।




वास्तविक नियंत्रण रेखा

भारत और चीन के मध्य 3,488 किमी की वास्तविक नियंत्रण रेखा-एलएसी है। यह तीन सेक्टरों में विभाजित है। पहला वेस्टर्न सेक्टर, जो लद्दाख में है। दूसरा मिडिल सेक्टर, जो उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में है। तीसरा, ईस्टर्न सेक्टर, जो अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में है।

गलवान घाटी गलवां नदी से निर्मित है। यह चीन के दक्षिणी शिनजियांग से लेकर भारत के केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख तक विस्तृत है। यह वही गलवां घाटी है, जो अक्साई चिन में है और भारत का क्षेत्र है, लेकिन चीन इसे 1962 के समर के बाद हड़प लिया है। इसे ही वास्तविक नियंत्रण रेखा माना गया है, जो अक्साई चिन को भारत से अलग करता है।

खूनी संघर्ष के बावजूद उधर चीनी विदेशमंत्री बयान जारी कर धोखेबाजी कर रहा है,‘‘चीन बातचीत से विवाद सुलझाने का पक्षधर है। वह शांति बनाने और तनाव घटाने के सभी कदम उठाएगा।’’ इधर चीनी सेना का एक कर्नल अपनी कुटिल मंशा को जाहिर कर रहा है,‘‘गलवान घाटी क्षेत्र पर संप्रभुता हमेशा चीन के पास रही है।’’

वहीं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है,‘‘भारत शांति चाहता है, लेकिन उकसाने पर हर हाल में यथोचित जवाब देने में सक्षम है। देश को शहीदों पर गर्व रहेगा कि वे मारते-मारते मरे हैं। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने से कोई हमें रोक नहीं सकता। भारत पूरी दृढ़ता से देश की एक-एक इंच जमीन और स्वाभिमान की रक्षा करेगा।’’




खूनी संघर्ष का कारण

1. गलवान नदी से सटे अक्साई चिन पर चीन का बेजा कब्जा है। भारतीय सैनिक गलवान नदी में नौका से गश्त करते हैं, लेकिन चीन को यह खटकता है।

2. खूनी संघर्ष का प्रधान कारण 273 किमी की वह सड़क है, जिसे भारत अपने सीमाक्षेत्र-पूर्वी लद्दाख में अपने सैनिकों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए करीब 15 साल से बना रहा है। जो लाईन आफ एक्चुअल कंट्रोल के समानांतर बनाई जा रही है।

3. करीब 15 साल से निर्माणाधीन यह महत्वाकांक्षी सड़क सरहद के अंतिम गांव दरबूक-श्योक से दौलतबेग ओल्डी तक पूर्णता की ओर है। इस सड़क पर गलवान घाटी में निर्माणाधीन हिस्से पर चीन को परेशानी है। यही विवाद की मुख्य वजह है।

4. सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी काराकोरम रेंज का हिस्सा है। काराकोरम रेंज में नियंत्रण मजबूत करने के लिए दौलत बेग ओल्डी पर होल्ड बढ़ाना भारत के सड़क निर्माण का मकसद है। लद्दाख की राजधानी-शहर लेह से दरबूक तक पहले से सड़क है।

5. भारतीय सेना चाहती है कि यहां कम-से-कम एक ब्रिगेड का सेक्टर तैनात हो, जिनकी निर्बाध आवाजाही सड़क बनाने से ही संभव है। चीन यही नहीं चाहता। इसी से वह बौखलाया हुआ है।

6. वर्तमान में यहां लद्दाख स्काउट्स और इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस के जवान तैनात हैं।



सड़क की आवश्यकता

निर्माणाधीन यह सड़क सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चूंकि दौलत बेग ओल्डी, जिसे सैन्यभाषा में सब-सेक्टर-नार्थ कहते हैं, यह लद्दाख का उत्तरी कोना है, जो एलएसी से 10 किमी से भी कम दूरी पर है, इससे भारत पूरे इलाके में आसान नजर रख सकता है।

दौलत बेग ओल्डी संसार का सबसे ऊंचा एयरबेस है, जो 13 हजार फीट की ऊंचाई पर है। यहां जहाजों के लिए ईधन, उपकरण और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हमेशा हवाई यातायात से संभव नहीं है। इसलिए सड़क बनाना नितांत आवश्यक है।

इस सड़क का निर्माण बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन द्वारा किया जा रहा है। इसमें आधुनिकतम शैली में पुल-पुलिया निर्मित है, इसलिए बारोंमास यातायात के लिए सुलभ व सुविधाजनक है। यही रोड पहले श्योक नदी में पुल के अभाव में यातायात के लिए सुलभ नहीं था।

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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से virendra Dewangan/amazon.com में सर्च किया जा सकता है।
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