बुधवार, 15 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद-2




चीन की विस्तारवादी गतिविधि न केवल भारत, अपितु दुनिया को भी डराने लगा है। उसके ‘एडवांस्ड सोशलिस्ट कंट्री’ के ख्वाब से दुनिया भयग्रस्त है। वह अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए 2049 तक का समय निश्चित किया हुआ है। वह इस बीच सैन्य व आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका की चैधराहट को समाप्त कर देना चाहता है और स्वयं नंबर वन पर काबिज होना चाहता है।

बांग्लादेश पर निगाह

भारत को घेरने और डराने के लिहाज से जहां उसने पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान पर डोरे डाल रखा है, वहीं बांग्लादेश को भी अपने निवेशजाल में उलझा दिया है। वह बांग्लादेश में 2030 तक 100 स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए चीनी कंपनियां आंख मूंदकर निवेश करने के लिए कमर कसी हुई हैं।

भारत के पड़ोसी देशों को सहायता देकर उपकृत करना और भारत को परेशानी में डालना चीन की सोचीसमझी रणनीति का हिस्सा है। जिस बांग्लादेश का संबंध सदियों से भारत के साथ रहा हो, जो कभी अखंड भारत का हिस्सा रहा हो, उसके क्षेत्र में निवेश करना, भारत के लिए नई मुसीबतों का रोपण है। जिस बांग्लादेश के कारण भारत में घुसपैठियों की समस्या विकराल हो गई हो, उसका चीन की शरण में जाना भारत के लिए खतरे की घंटी है।

यही हाल नेपाल का हो गया है। वहां के पीएम श्रीमान ओली चीन की शह पर भारत विरोध का नारा बुलंद किए हुए है। वे कोई ऐसा मौका हाथ से गंवाना नहीं चाह रहे हैं, जिसमें भारत-नेपाल के सबंधों पर बुरा असर पड़ता हो। लगता है-वे पूरी तरह चीन के पिट्ठू बन गए हैं और चीन के इशारों पर नाच रहे हैं।

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

एक और परियोजना है, जिसे बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) कहा जाता है। इसका आरंभ 2013 में किया गया है। इसके अनुसार, 2049 तक संसार के करीब 70 मुल्कों में चीन आधारभूत संरचना का निर्माण करनेवाला है। इसमें एशिया व यूरोप में सड़कों व बंदरगाहों का जाल बिछाना भी लक्ष्य है, जिससे चीनी सामानों की आवाजाही सुगम हो सके।

इस मामले में दुनिया बंटी हुई है। यदि यह परियोजना पूरी हो गई, तो दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी इसमें समाहित हो जाएगी और 40 प्रतिशत व्यापार इसी रास्ते से होने लगेगा। कई देश चीन की इस वैश्विक परियोजना  के समर्थक हैं, तो कई विरोधी। समर्थक इसे दुनिया के लिए हितकर बता रहे हैं, तो विरोधक शातिर खेल।

दरअसल, बुनियादी सुविधाओं का निर्माण महज एक दिखावा है, इसका असल मकसद अपना एकाधिकार कायम करना है। भारत को डर है कि इस नव उपनिवेशवादी परियोजना से चीन भारत को धेरने में कामयाब हो जाएगा।

मेड-इन चाइना

चीनी सरकार ने इसकी लांचिंग 2015 में की है। इसका मकसद चीन को 2025 तक तकनालाजी हब बनाना है, जो तकनीकी के दम पर दुनिया को दहला सके। मेड-इन चाइना में एयरोस्पेस, टेलीकम्युनिकेशंस, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलाजी, इलेक्ट्रिक वाहन आदि क्षेत्रों में ऐसे कलपुर्जों का निर्माण शामिल करना है, जो दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। यह संभव हुआ, तो समझिए अमेरिका, रूस सहित तमाम यूरोपीय देशों के वैश्विक बाजारों का भट्ठा बैठ जाएगा।

पैटेंट का जुनून

मेड-इन चाइना को धरातल पर उतारने के लिए चीन ने पैटेंट कानून का जमकर दोहन किया है। वल्र्ड इंटेलिएक्चुअल प्रापर्टी आर्गनाइजेशन के मुताबिक, चीन अमेरिका को पीछे धकेलकर पैटेंट करवाने के मामले में दुनिया में अव्वल हो गया है। कारण यह कि वह नवीकरण व तकनीक पर एकाधिकारवाद प्राप्त करना चाहता है। इस मामले में उसकी संचार कंपनी हुवाई टेक्नोलाजिस सबसे आगे है, जिसे अब तक 3500 के आसपास पैटेंट मिल चुका है।

अंतरिक्ष में चीन

चीन अंतरिक्ष में भी ऊंची छलांग लगाकर दुनिया में दूसरे नंबर पर काबिज हो गया है। यूनियन आफ कंसर्न साइंटिस्ट द्वारा 31 मार्च 2020 को जारी आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका 1326, चीन 363, रूस 169, भारत 121 और अन्य 686 उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुके हैं।

इससे चीन के पड़ोसी देश-ताइवान और अन्य सहित अमेरिका आशंकित है। चीन इसका इस्तेमाल अपने शत्रु देशों की जासूसी के लिए कर सकता है। इस आशंका को इसलिए भी बल मिलता है, क्योंकि ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्टेªशन’ चीनी सेना का अनुभाग है। इसका प्रशासनिक तंत्र चीनी सेना के लिए न केवल काम करता है, अपितु यह उसके प्रति जवाबदेह भी है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस

चीन हर मामलों की भांति आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में भी बढ़त बनाए हुए है। उसका ऐलान है कि वह अभी इस मामले में 8.4 अरब डालर का निवेश कर रहा है, लेकिन 2030 तक वह इसमें 150 अरब डालर का निवेश करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा।

उपसंहार

आशय यह कि चीन की हर योजना और परियोजना डरानेवाली है। इससे न केवल अविकसित व अल्पविकसित देश भयभीत हैं, अपितु विकसित देश भी भयाक्रांत हैं। उसकी शातिर चालों से जहां पड़ोसी देशों के कान खड़े हो गए हैं, वहीं दूरस्थ देश व यूनाइटेड नेशंस तक में चर्चा गर्म हो गई है कि डेªगन के नवसाम्राज्यवाद को किस तरह काबू में किया जाए। देखना यही है कि दुनिया चीनी उपनिवेशवाद की रोकथाम के लिए कौन-सा और कैसा कदम उठाती है।
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