मंगलवार, 21 जुलाई 2020

पार्टियों में बगावत

पार्टियों में बगावत
सबसे अधिक समय तक सत्ता का स्वाद चखनेवाली कांग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की बगावत कोई नई घटना नहीं है। कांग्रेस इसकी अभ्यस्त है। कांग्रेस में बागियों की लंबी-चैड़ी फेहरिस्त है। फिर चाहे कोई कद्दावर नेता हो या छुटभइया; ज्यादातर बागी तेवर सत्ता लोलुपता के लिए गीदड़ भभकी माना जाता है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की नासमझी और नाकामी से वह विध्वंसकारी साबित हुआ करता है।


इमेरजेंसी के आसपास के इतिहास पर गौर फरमाएं। कांग्रेस से बगावत करके ही मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक पहले गैर-कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने थे। इसी दौरान बाबू जगजीवनराम भी कांग्रेस से किनारा कर जनता पार्टी की सरकार में उपप्रधानमंत्री बन गए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी बोफोर्स के मुद्दे पर कांग्रेस का दामन छोड़कर जनता दल का गठन कर लिया था। इससे कांग्रेस को करारा झटका लगा था। तब, वह हासिये में चली गई थी। इसके बाद देश का राजनीतिक घटनाचक्र तेजी से बदला था। वीपी सिंह 1 दिसंबर 1989 से 7 नवंबर 1990 तक ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें अविश्वास प्रस्ताव से पदत्याग करना पड़ा था।

1980 में एके एंटनी, 1986 में प्रणव मुखर्जी, 1996 में माधवराम सिंधिया और 2001 में पी चिंदमबरम में इसी राह के राही थे। हालांकि ये नेता कुछ समय उपरांत कांग्रेस में वापस आ गए थे। एके एंटनी और पी चिदंमबरम तो बाद की कांग्रेस सरकारों में मंत्री भी रहे। आदरणीय प्रणव मुखर्जी 25 जुलाई 2012 से 24 जुलाई 2017 तक कांग्रेस के समर्थन से भारत के राष्ट्रपति भी रहे।

कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1987 में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई। महाराष्ट्र के धाकड़ नेता शरद पवार, पूर्वाेत्तर के नेता पीए संगमा और तारीक अनवर भी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को गरमाकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना लिए।

आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर वाईएसआर कांग्रेस का गठन कर लिया और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे।

छत्तीसगढ़ में बगावती तेवर वाले नेताओं में स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, अरविंद नेताम और अजीत जोगी प्रमुख थे। विद्याचरण शुक्ल का तो सारा जीवन कांग्रेस से अंदर-बाहर होने में बीता था। दिवंगत महेंद्र कर्मा ने भी कई मर्तबा बागी तेवर दिखाए थे।

केंद्र में लंबे समय तक कृषि राज्यमंत्री रहे अरविंद नेताम तक ने एक समय कांग्रेस का दामन छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया था। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी की तो बात ही निराली थी। वे अपनेआप को उधर श्रीमती सोनिया गांधी का भक्त बताते रहे, उधर कांग्रेस से दरकिनार कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बना लिया था।

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस से विलग होकर दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट बना लिया और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए।

यही नहीं, कांग्रेस से अलग होकर पुडुचेरी में एन रंगास्वामी, एनआर कांग्रेस और नगालैंड में नेफ्यू रियो, एनपीएफ का गठन कर अपने-अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। इसी तरह महाराष्ट्र का विदर्भ जनता कांग्रेस और तमिलनाडु का तमिल मनीला कांग्रेस भी कांग्रेस के ही टूटे हुए घड़े हैं।

1980 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई। भाजपा से जुदा होकर 17 पार्टियां बनी, लेकिन सबके सब फिसड्डी साबित हुए। भाजपा से उप्र के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होकर जनक्रांति पार्टी बनाई। भाजपा से मप्र की मुख्यमंत्री रही फायरब्रांड नेत्री उमा भारती ने जनशक्ति पार्टी बनाई। भाजपा से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल ने जीपीपी बनाई और झारखंड में बाबूलाल मरांडी ने जेवीएम बनाई।

लेकिन अफसोस यह कि इनमें-से कोई नेता अपना अस्तित्व बचा न सका। ये सभी नेता वापस अपने घर लौट आए। यही नहीं, यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा भी भाजपा से अलग होकर अलग-अलग राग अलापते रहते हैं, लेकिन उनको कोई गंभीरता से नहीं लेता।

इमेरजंेसी के बाद वजूद में आये जनता दल भी बार-बार टूटा और टूटकर इस कदर बिखरा कि मूल पार्टी का नामोनिशान तक मिट गया। इसकी वजह बनी नेताओं की महत्वाकांक्षा, अहम, कलह और कटुता।

जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनानेवाले मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश; राष्ट्रीय जनता दल बनानेवाले लालू यादव, बिहार; जनता दल यूनाइटेड बनानेवाले नीतीश कुमार बिहार और बीजू जनता दल बनानेवाले नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए।

इसके अलावा व्यापक पैमाने पर आयाराम और गयाराम भी हुआ है। नेतागण अपने अनुयायियों सहित यहां से वहां गए। कई नई पार्टी में रम गए हैं, तो कई पुरानी पार्टी में वापस लौट भी आए। आने और जाने का सिलसिला देशभर में कहीं-न-कहीं हरदम चलता ही रहता है।

दक्षिण में एनटी रामाराव की मौत के बाद तेलुगु देशम पार्टी भी टूटा। तमिलनाडु में जयललिता की मृत्यु के उपरांत एआईएडीएमके भी दो टुकड़ों में बंट गया। समाजवादी पार्टी में बाप-बेटा और चाचा-भतीजा की लड़ाई सतह पर आ गई। लालू यादव के जेल में रहने से उनके बेटों का झगड़ा पार्टी में आम हो गया।

यहां तक कि नवगठित राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी में भी बगावत हुआ। इसके कई नेता पार्टी नेतृत्व पर तानाशाही का आरोप लगाकर पार्टी से अलग हो गए। कुछ बीजेपी में शामिल हो गए, तो कइयों ने मिलकर योगेन्द्र यादव की अगुआई में स्वराज पार्टी का गठन कर लिया।

आशय यह कि आजादी के बाद से भारतीय राजनीतिक दलों में सैकड़ों टूट-फूट और अलगाव-विलगाव हुआ है। इससे कोई पार्टी अछूता नहीं है। बगावत की काली छाया सभी पार्टियों पर पड़ी है।

हालांकि किसी नेता का पार्टी के साथ बने रहना या पार्टी से विलग होना, उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन इससे जनभावना आहत होती है। लोकतंत्र का मखौल उड़ता है। बगावत में मनमुटाव, खरीद-फरोख्त, टकराव और रोमांच हो सकता है, किंतु नैतिकता और सिद्वांत कहीं नहीं दिखता।

सौ बात की एक बात, जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठता है, तब पार्टी के अंदरुनी लोकतात्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जनविश्वास का भट्ठा बैठता है। लोगों की धारणा यही बनती है कि जो पार्टी अपने लोगों की मनोभावनाओं और विचारों का सम्मान नहीं कर सकती, वह जनता की भावनाओं का क्या खाक ख्याल रखेगी?

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