गुरुवार, 9 जुलाई 2020

चीन का विस्तारवाद

चीन का विस्तारवाद

17वीं-18वीं शताब्दी मे दुनिया के चतुर-चालाक कहे जानेवाले मुल्कों ने जिन देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकता का अभाव था; उनके सत्ता-केंद्रों पर ऐन-केन-प्रकारेण दबदबा कायम किया। उनपर कब्जा किया और उन्हें गुलाम बनाया।

उनके संसाधनों पर कब्जा जमाकर उनका दोहन किया। कई छोटे, मध्यम व गरीब देशों से सुरक्षा के नाम पर उनसे वार्षिक फिरौतियां और रंगदारियां वसूली।

21वीं शताब्दी में चीन इसी नक्शेकदम पर चल रहा है, लेकिन जरा दूजे तरीके से। एकतरफ वह 6 पड़ोसी देशों के 41,13,709 वर्ग किमी क्षेत्र को हथिया लिया है, वहीं दूसरी तरह कमजोर व लाचार देशों में निवेश को हथियार बनाकर उन्हें गुलाम बनाने की हरचंद कोशिश कर रहा है। उसके द्वारा इन देशों से हथियाया गया क्षेत्रफल उसके सकल क्षेत्रफल का लगभग 43 फीसदी हिस्सा हो गया है।

वह तिब्बत, मंगोलिया, ताइवान, हांगकांग, मकाऊ और पूर्वी तुर्किस्तान को अपने देश का हिस्सा बताकर या तो कब्जा कर लिया है या कब्जाने के प्रयास में सतत लगा हुआ है। वह भारत के लद्दाख-केंद्र शासित प्रदेश के सियाचिन को भी 1962 में हड़़प लिया है। अभी उसकी कुदृष्टि गलवान घाटी पर लगी हुई है।

सियाचिन के संबंध में उसका दावा है कि यह क्षेत्र उसी का है, जिसे गुलाम भारत में अंगे्रजों ने जीतकर भारत में मिला लिया था। यही नहीं, वह आएदिन भारत के अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम में घुसपैठ करवाता रहता है। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत दृष्टांत है।

यही कारण है कि भारत के शत्रु देश-पाकिस्तान को वह अपना दोस्त बना लिया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का बचाव कर दुनिया को धोखा देने का काम करते रहते हैं। यह नीति चोर-चोर मौसेरे भाई जैसा है। चीन पाकिस्तानी आतंकवाद के समर्थन में खड़ा हो जाता है, तो पाकिस्तान, चीन में होनेवाले उइगर मुसलमानों के अत्याचार पर चुप्पी साथ लेता है।

चीन, बरबादी की ओर अग्रसर पाकिस्तान में 2442 किमी लंबा इकोनामिक कारिडोर बना रहा है, जो चीन के झिंजियांग को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ता है। इससे तेल, गैस सहित तमाम जरूरी चीजों का यातायात चीन के लिए सुगम होता चला जाएगा।

इसके बदले में चीन पाकिस्तान को 3.45 लाख करोड़ रुपए देगा। चीन बदले में अपने 5 लाख नागरिकों को ग्वादर पोर्ट पर बसाएगा। वाह क्या साठगांठ है, जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस चुका है? लेकिन, पाकिस्तान है कि कश्मीर की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है।

ऐसा ही मायाजाल वह श्रीलंका पर भी फेंका है। वह हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर ले लिया है। वहीं, श्रीलंकाई हवाईअड्डों, थर्मल पावर केंद्रों सहित विशाल बांधों में 36 हजार करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है।

यह निवेश फोकट में न होकर मोटे ब्याज में है। इससे श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है। परिणामतः, चीनी कंपनियां वहां के संसाधनों पर मालिकाना हक जताने लगी हैं।

चीन छोटे-से देश भूटान, जिसे भूगोल की भाषा में बफरस्टेट कहा जाता है, उसकी पूर्वी सीमा पर अपना दावा ठोंका है। यह सीमा भारत के अरुणाचल प्रदेश से लगती है। यही नहीं, वह पश्चिम व मध्य क्षेत्र को भी विवाद में घसीट लिया है। इस सबंध में चीन-भूटान के मध्य कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है।

दक्षिणी चीन सागर को वह अपना सागर बताता है। वह सेनकाकू द्वीप पर अपना दावा ठोंककर जापान से उलझता रहता है। जाहिरातौर पर इस दावे से वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान और ब्रुनेई के क्षेत्र में अतिक्रमण होता है, तो वे भी अपनी फौज लेकर वहां पहुंच जाते हैं। फिलीपींस के साथ इनकी दुश्मनी जगजाहिर है।

यही नहीं, चीन ने कैरेबियाई व दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के गरीब देशों को अपने औपनिवेशिक मोहपाश में उलझा दिया है। इस क्षेत्र में उसके निवेश का एकमात्र कारण अमेरिका व यूरोपीय देशों के वर्चस्व को तोड़ना है और अपना धाक जमाना है।
समंकों ने अनुसार, उसने जहां 2005-10 के दरमियान 59 देशों में अपना पैसा लगाया है, वहीं 2011 से 2019 तक 66 राष्ट्रों को अपने विनिवैशिक पाश में फांस लिया है।

मौजूदा दौर में चीन की विस्तारवादी नीति जमीन हड़पने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह छोटे-छोटे देशों की आर्थिक गतिविधियों को हथियार बनाकर उनके अर्थतंत्र को प्रभावित करने भी है। संसाधनों पर मालिकाना हक हासिल करने की है।

इन्हीं सब परिस्थितियों से परेशान होकर विश्व के 27 मुल्कों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में जाने का निश्चय किया है। इस मुद्दे पर यूएन महासभा में अनौपचारिक बहस भी हुई है, जिसकी अगुवाई अमेरिका और ब्रिटेन ने की है।

यह तय है कि भारत, चीन से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो चुका है। एक तो जमीन कब्जाने और निवेश कर फांसने की उसकी कुटिल नीति और दूसरे कोरोनावायरस से उत्पन्न तबाही से सारा विश्व उसके खिलाफ हो गया है। केवल पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को छोड़कर समूची दुनिया भारत को समर्थन देने और उसके साथ मिलकर चीन को सबक सिखाने के लिए आमादा है।

इन्हीं परिस्थितियों के दृष्टिगत भारतीय प्रधानमंत्री ने लद्दाख के 11 हजार फीट ऊंचे सैन्य ठिकाने नीमू में थलसेना, आईटीबीपी और वायुसेना के जवानों से मेल-मुलाकात कर सिंहनाद किया है,‘‘भारतीय सेना ने पराक्रम की पराकाष्ठा दिखाई है। अपनी वीरता से पूरी दुनिया को भारत की ताकत का संदेश दिया है। इतिहास गवाह है कि विस्तारवादी ताकतें मिट जाती हैं। विकासवाद जिंदा रहता है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लोग बांसुरीधारी कृष्ण को भी पूजते हैं और सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण को भी पूजते हैं। भारत शांति चाहता है, लेकिन मातृभूमि की रक्षा के लिए हमारा संकल्प हिमालय से भी ऊंचा है। लेह, करगिल और सियाचिन तक बर्फीली चोटियों से लेकर गलवान की ठंडे पानी की धारा तक; हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा, हर कंकड़-पत्थर भारतीय वीरों की पराक्रम की गाथा सुना रही है।

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विशेष टीप :: वीरेंद्र देवांगन के साहित्यिक ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome के माध्यम से amazon.com /virendra Dewangan से सर्च किया जा सकता है।

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