शुक्रवार, 15 मई 2020

फिर गैस त्रासदी


कोरोना संकट के दौरान आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम के आरआर वेंकटपुरम गांव में स्थित एलजी पौलिमर प्लांट में 7 मई की अल्सुबह स्टाइरीन गैस में रिसाव हो गया, जिसमें 8 साल के बच्चे सहित 11 लोगों की मौत दम घुटने से हो गई और 300 से अधिक बुरी तरह से आहत हो गए।


तालाबंदी की वजह से प्लांट बंद था। कहा जाता है कि शीतलीकरण इकाई में गड़बड़ी के कारण गैस रिसाव हुआ। जब तापमान 20 डिग्री से कम रहता है, तब तरल रहता है। किंतु, शीतलीकरण की गड़बड़ी ने तरलता को गैस में बदल दिया।

        इस गैस का उपयोग सिंथेटिक रबड़ व रेजिन बनाने में होता है। यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि हादसे के वक्त सायरन नहीं बजा था।

प्लांट दक्षिण कोरिया की है, जिसकी स्थापना 1970 में की गई थी, जो ‘हिंदुस्तान पालिमर’ के नाम से जाना जाता था। तब इसका स्वामित्व मशहूर लोनर विजय माल्या के स्वामित्व में था।           1997 में एलजी पालिमर्स ने इसका अधिग्रहण कर लिया था। हादसे के लिए प्रबंधन को जिम्मेदार मानते हुए गैरइरादतन हत्या और लापरवाही का केस दर्ज किया गया है।

फैक्टरी के 5 किमी के दायरे में आनेवाले 5 गावों में हजारों लोगों की आंखों में जलन, सांस लेने में कष्ट, चक्कर आना, तन पर चकते और उल्टियां होने लगी।  

        तड़के करीब 3 बजे जब गैस रिसाव हुआ, तब आदतन लोग सो रहे थे। कई लोग तो नींद में ही बेसुध होकर प्राण गंवा बैठे। 

        जब लोगों को हादसे का पता चला, तब वे जान बचाकर भागने लगे, लेकिन रास्ते में ही बेहोश हो गए। कई के मुंह से झाग निकल रहे थे। लोग तड़फडा रहे थे। हजारों पशु-पक्षी अचेत हो गए। पेड़-पौधे मुरझा गए। फसलें सूख गईं।

        दो लोग दौड़ते-भागते बोलवेल में गिरने से मर गए। बचाव के लिए पहुंचे पुलिसकर्मी भी सुधबुध खो बैठे। सड़कों पर लोग खड़े-खड़े गिर पड़े।

        दो दिन बाद प्लांट ओसारे के बाहर सैकड़ों लोग धरने पर बैठ गए। उन्होंने कंपनी को वहां से हटाने और प्रबंधकों को गिरफ्तार कर कार्रवाई की मांग में नारे लगाए।

इधर, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के पुसौर शक्ति पेपर मिल में 5 मई को जहरीली गैस का रिसाव हुआ, जिसमें 7 मजदूर लपेटे में आ गए। मजदूरों को आननफानन में अस्पताल में भर्ती किया गया।

         इसकी जानकारी संचालक ने छिपाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि प्रशासन ने मिल को सीलबंद कर दिया।

उधर, अमेरिका, जापान व दक्षिण कोरिया की करीब 1000 कंपनियां चीन को छोड़कर भारत आना चाहती हैं। ये कंपनियां भारतीय दूतावासों, केंद्रीय विभागों, राज्य सरकारों के संपर्क में हैं। 

           इसमें आश्चर्य नहीं कि भारत का भ्रष्टतंत्र इन्हें भारत में उद्योग लगाने की अनुमति भी दे दे। कई राज्य तो पर्यावरण को धता बताकर इसकी स्थापना के लिए पलक पावड़े बिछाए बैठै हैं। 

            खबर है कि भारत सरकार इन्हें 5000 वर्ग किलोमीटर का काम्पलेक्स बनाकर देने की चेष्टा कर रही है।
            इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून, श्रम कानून और जमीन के दस्तावेजों का कम्प्यूटरीकरण और पुर्नविचारण किया जा रहा है, जिसका कि भारतीय श्रमिक संघ ने विरोध जताया है।

हालांकि यह भी सच है कि देश में बेरोजगारी विकराल है, तालाबंदी से इसकी विकरालता संकटपूर्ण हो गई है, लेकिन यह चुनौती पर्यावरण संरक्षण की कीमत पर नहीं स्वीकार किया जाना चाहिए। 

           वर्तमान में देश में बेरोजगारों की संख्या करीब 10 करोड़ के आसपास है, जिसको छोटे उद्योग-धंधों में खपाने की जरूरत है। 

            इससे जहां पर्यावरण संरक्षित रहेगा, वहीं लोगों को आजीविका का साधन प्राप्त होगा और औद्योगिक त्रासदियों से बचा जा सकेगा।

क्या यह विचारणीय नहीं कि 2-3 दिसंबर 1984 को भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार अमेरिका स्थित यूनियन कार्बाइट कंपनी का आज तक कुछ नहीं बिगाड़ा गया, जबकि इस हादसे में 15 हजार से अधिक लोगों की जानें चली गई?

          लेकिन, अफसोस कि सरकार ने केवल 3,787 लोगों के मारे जाने की ही पुष्टि की। वहीं, गैस रिसाव में प्रभावितों की संख्या मरनेवालों से दोगुनी से अधिक है।

          यही नहीं, उसके भारत प्रमुख-वारेन एंडरसन को मक्कार सियासत ने जान-बूझकर विदेश भाग जाने का अवसर तक दिया।

इस भयावह औद्योगिक त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस का रिसाव हुआ था, जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने में होता था। 


          रसायन और बहुलक बनानेवाली कंपनी यूनियन कार्बाइट को इसके लिए जिम्मेदार पाया गया, लेकिन कंपनी ने इस त्रासदी के लिए खुद को उत्तरदायी मानने से साफ इंकार कर दिया।


       हादसाग्रस्त लोग आज भी अपाहिज हैं। उनकी संतान तक में विकलांगता के दोष पाए जा रहे हैं। कई-कई परिवार पूरी तरह तबाह हो गए। उनके घरों में कमाने व रोनेवाला कोई नहीं बचा है। 

       आखिर इसका न्याय कौन करेगा? क्या यह सरकार के दायित्वों में शुमार नहीं है? जबकि इस बीच देश-प्रदेश में कई सरकारें आईं और चली गईं। 

       यही कारण है कि देश में जब कभी कोई संयंत्र स्थापना की बात सामने आती है या घटना-दुर्धटना होती है, तब उसका व्यापक विरोध आरंभ हो जाता है.  सरकारें केवल लकीर पीटती रह जाती हैं। लीपापोती में लग जाती हैं।

--00--

शुक्रवार, 8 मई 2020

सामुदायिक संक्रमण

                                                               
किसी महामारी का तीसरा स्टेज, जिसे सामुदायिक संक्रमण कहा जाता है, सबसे ज्यादा मारक और खतरनाक होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कम्युनिटी ट्रांसमिशन (सामुदायिक प्रसार) की स्थिति तब आती है, जब बड़ी संख्या में वायरस के कंफर्म मामलों के बारे में पता न किया जा सके कि वायरस कहां से या किससे फैला है? 



सामुदायिक संक्रमण में वायरस के स्त्रोत का पता नहीं चलता और यह लोगों में इस कदर फैलता चला जाता है कि त्राहि-त्राहि मच जाता है।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव का कहना है कि देश में अभी सामुदायिक फैलाव नहीं हो रहा है। लेकिन, कई राज्य सरकारें मान रही है कि वहां सामुदायिक फैलाव होने लगा है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के मुताबिक, जब 20 से 30 प्रतिशत ऐसे मामले आने लगे, जिनमें संक्रमण के कारण का पता न चल सके, तब यह समझना चाहिए कि वायरस फैलने का तीसरा स्टेज आ चुका है। मंत्रालय का यह भी कहना है कि हालांकि भारत जैसे विशाल देश में ऐसे कुछ ही मामले आए हैं, जहां स्त्रोत का पता नहीं चला है, लेकिन ये मामले नगण्य हैं। वैसे यह प्रक्रिया आसान नहीं है। इसमें समय लगता है।

पहला स्टेजः यह वह चरण है, जब विदेश से आए लोग वायरस को लाते हैं। दुनियाभर में वायरस बांटनेवाला देश चीन है। या तो चीनी लोग विदेश जाकर वायरस बांट आए हैं या वे लोग जो चीन गए हुए थे, अपने देश में वायरस ले आए हैं। यह चक्र बार-बार चला और पूरी दुनिया इसकी चपेट में आ गया। ऐसा माना जाता है कि भारत में कोरोना वायरस चीन से नहीं, बल्कि इटालियन पर्यटकों के मार्फत आया।

दूसरा स्टेजः ये वे संक्रमित लोग हैं, जो विदेश तो नहीं गए, लेकिन उन विदेशी लोगों के संपर्क में आए, जो भारत में आकर वायरस बांट रहे थे। यह दूसरा स्टेज स्थानीय प्रसार या लोकल ट्रांसमिशन कहलाता है। यह किसी क्षेत्र-विशेष में भी फैल सकता है या समूचे देश में भी परस्पर संपर्क से फैल सकता है। लेकिन, सही समय पर संक्रमितों का पता चलने से इसके विस्तार को रोका जा सकता है।

 इसके लिए सेल्फ आइसोलेशन और क्वारेंटाइन को जरूरी समझा गया है। भारत इसी स्टेज पर है, इसीलिए देश को बार-बार लाकडाउन किया जा रहा है। पूरे देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिकता को रोका गया है, ताकि पारस्परिक संपर्क से कोरोना का प्रसार न हो सके।

तीसरा स्टेजः तीसरा स्टेज एक व दो से खतरनाक है। इसमें व्यक्ति सोचता ही रह जाता है कि वायरस उसको कहां से और किसके मार्फत जकडा, जबकि वह कहीं गया नहीं, किसी संपर्क किया नहीं।

चैथा स्टेजः चैथा स्टेज महामारी की होती है। इसमें एक-के बाद एक लोग संक्रमित होते चले जाते हैं। किसी को कोई भान नहीं रहता कि यह कहां से आया? इस स्टेज में व्यापक तबाही मच जाती है। इस स्टेज में कोरोनावारियर्स तक इसके चपेट में आने लगते हैं और देखरेख करनेवाला और इलाज करनेवाला कोई नहीं रहता। अमेरिका के न्यूयाॅर्क शहर में यही हो रहा है।

मान लो, मोहन विदेश से आया। उसे प्रारंभ में कोरोना का कोई लक्षण नहीं था, इसलिए बगैर सेल्फ आइसोलेशन के समाज में धुमता-फिरता रहा। जब उसको पता चला कि उसको सूखी खांसी, तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ हो रही है, तो वह अस्पतालों की ओर रूख किया और समुचित इलाज से ठीक हो गया। यह महामारी का पहला स्टेज है।

इस बीच वह जिनसे मिला, उनमें-से 50 लोगों सहित सोहन व दिनेश को भी कोरोना के लक्षण दिखने लगे। सोहन व दिनेश भी सही समय पर सही इलाज से ठीक हो गए, लेकिन जो 50 लोग सैकड़ों-हजारों को संक्रमित किए, उनमें से 100 लोगों की सही समय पर इलाज के अभाव में मौत हो गई। बाकी 200 के स्त्रोत का पता चल गया, वे सब भी ठीक हो गए। इसके बावजूद हजारों लोग संक्रमित होकर देशभर में वायरस का संचार करने लगे। इसमें स्त्रोत का पता चल जाने से इसे दूसरा स्टेज कहा जा सकता है।

जब यह ऐसी स्थिति में बदल जाती है, जहां स्त्रोत का पता नहीं चलता, तब मामला गंभीर हो जाता है, जो तीसरा स्टेज कहलाता है। यह दहशतनाक स्थिति की शुरूआत है। भारत अभी तीसरे स्टेज में न जाने के लिए जूझ रहा है। चैथा स्टेज इससे ज्यादा भयावह है, जो अस्पतालों को मुर्दाघर में तब्दील कर देता है। इटली, स्पेन व अमेरिका इसी स्थिति से जूझ रहे हैं।

ये दृष्टांत फ्लेग, चेचक, मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, स्पैनिश फ्लू, बर्ड फ्लू, सार्स वायरस सभी के लिए सटीक बैठती है। जब 1918-20 में दुनियाभर में स्पैनिश फ्लू फैला, तब भी सेल्फ आइसोलेशन, क्वारेंटाइन व सेनेटाइजेशन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बीमार लोगों को नमक पानी के गरारे लेने, हाथ धोने की सलाह दी जाती थी। संवेदनशील शहरों को लाॅकडाउन कर दिया गया था। स्कूल, चर्च, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व सार्वजनिक स्थान बंद कर दिए गए थे।

स्पैनिश फ्लू दुनिया में 15 महीने रहा और चैथे स्टेज में पहुंच गया था। भारत तब अंग्रेजों का गुलाम था। हास्पिटल व डाक्टर कम मात्रा में थे, इसलिए कम्युनिटी हालों को अस्पतालों में बदल दिया गया था। मास्क न पहनने व भीड़ बढ़ाने से जेल का प्रावधान किया गया था। तब भारत में फ्लू से लाखों लोग मारे गए थे।


1918 की गर्मी में स्पैनिश फ्लू स्पेन के किसी पक्षी या स्तनपायी से वायरस इंसानी शरीर में दाखिल हुआ था। इस भीषण महामारी ने दुनिया के 5 करोड़ लोगों की जानें ले ली थी। अमेरिका में तब 6 लाख से अधिक लोग मारे गए थे। महामारी की यही विकट स्थिति आज कोरोनावायरस की नजर आ रही है।

अतः महामारियों से बचने का एक ही उपाय है कि इसे द्वितीय स्टेज से तीसरे स्टेज पर जाने से रोकने के लिए सख्ती की जाए। भारत तमाम विसंगतियों के बावजूद तीसरे स्टेज में न जाने के लिए संघर्षरत है। सिंगापुर, ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान ने इसे दूसरे से तीसरे स्टेज में न जाने के लिए कठोरता से रोका है। इन देशों के शासक अपने देश को कोरोना के भयंकर त्रासदी से बचाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं।

--00--


शनिवार, 2 मई 2020

तालाबंदी के दौरान दूधबंदी

यह हैरतअंगेज है कि जो दूध कोरोनाकाल के पूर्व चाय ठेलों, मिठाई की दुकानों, होटलों, रेस्टारेन्टों, केटरिंग करनेवालों, शादी समारोहों, जन्म संस्कारों, भोज पार्टियों व घरों सहित विविध रस्म रिवाजों में धड़ल्ले से बिक करता था, वह लाकडाउन के चलते जाने कहां गायब हो गया है कि कहीं नजर नहीं आ रहा है? 



कोरोनाकाल में प्रशासनिक आदेशों के मद्देनजर सभी व्यवसाय व समारोह या तो बंद हैं या विराम को प्राप्त हैं। कतिपय मुनाफाखोरों, जमाखोरों और काले कारोबारियों ने तो अपना बोरिया बिस्तर तक समेट रखा है।


इसी में-से एक है दूध का धंधा। जो दूध कोरोना कहर के पहले धड़ल्ले से बिकता था, वह एकाएक गायब हो गया है। आश्यर्चजनक यह भी कि किसान आंदोलन की तरह गुस्सा जाहिर करने के लिए दूध को सड़कों पर नहीं बहाया गया है, रास्ते व नाली पर नहीं फेंका गया है, सस्ते दामों पर भी नहीं दिया जा रहा है। टेंकर का वाल्ब खोलकर सड़कों को दूधिया भी नहीं किया जा रहा है।

आश्चर्य तो तब है, जब दूध लंबे समय तक सुरक्षित रखा नहीं जा सकता। जाहिर है कि इसका दही, मक्खन, मही व घी भी नहीं बनाया जा रहा है, अन्यथा यह बिकने के लिए शहरों के गली-मोहल्ले में आता। इसलिए सवाल उठना लाजिमी है कि तालाबंदी के दौर में आखिर दूध जा कहां रहा है? होटल व रेस्टारेंट बंद हैं, तो इससे मावा-मिठाई बनाने का प्रश्न ही नहीं उठ रहा है।


2018 में एनिमल वेलफेयर बोर्ड आफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि इस देश में जितना दूध बेचा जाता है, उसका 68.7 फीसदी मिलावटी होता है। यानी किसी शहर में 10 हजार लीटर दूध बिकता है, तो उसमें 6800 लीटर दूध मिलावटी है। दूध में मिलावट के लिए डिटरजेंट, कास्टिक सोडा, ग्लुकोज, व्हाइट पेंट और रिफाइंड आइल का उपयोग किया जाता है। 

देश में, खासकर मध्यप्रदेश में टैंकर का दूध और पैकेज्ड दूध स्टेट लेबोरेटरी में अवमानक पाया जा चुका है। जबकि दुनियाभर के दुग्ध-उत्पादन का 18.5 फीसदी हिस्सा भारत से दुनिया को निर्यात किया जाता है।


खतरनाक कैमिकलों से निर्मित कृत्रिम दूध मप्र के भिंड में पकड़ी जा चुकी है। इस नकली दूध निर्मात्री फैक्ट्री में हर दिन सैकड़ों लीटर दूध तैयार होकर बाजार, घर व होटल में पहुंचाया जा रहा था। लोग इसे अच्छी सेहत के लिए इस्तेमाल कर सेहतमंदी की गलतफहमी पाले हुए थे। 

मिलावटी दूध में कास्टिक सोडा, यूरिया, वनस्पति तेल और पेट्रोल की तरह अन्य खतरनाक पदार्थ मिलाए जा रहे थे। कृत्रिम दूध तरह-तरह की बीमारियों समेत कैंसर का कारक बना हुआ था, किंतु इस खतरे से अनजान लोग स्वास्थ्य की बुलंदी के लिए इसका सेवन जारी रखे हुए है।


इतना ही नहीं, बनावटी दूध का कारोबार करनेवाले माल्टोस डेक्सट्रिन की मिलावट दूध में करते हैं। इससे दूध का एसएनएफ यानी फैट बढ़ जाता है। लैब टेस्ट में दूध में पानी की मिलावट एनालिस्ट भी नहीं पकड़ पाते हैं। दूध में माल्टोस डेक्सट्रिन की मिलावट पूरी तरह प्रतिबंधित होने के बावजूद इसे मिलाया जा रहा था। वहीं, माल्टोस डेक्सट्रिन के मुकाबले यूरिया सेहत के लिए ज्यादा हानिकारक है, जो गली-कूचों व गांव-देहातों में यूं ही मिल जाया करता हैं।



नेशनल मिल्क सेफ्टी और क्वालिटी सर्वे रिपोर्ट कहती है कि 6 फीसदी दूध के नमूनों में कैंसर की बीमारी के लिए जिम्मेदार रसायन एफ्लाटाॅक्सिन एम-1 पाया गया है, जो लिवर कैंसर पैदा करता है। इसमें 551 में-से 88 सैंपल में रसायन का स्तर उच्चतम पाया गया था, जो मानव तन के लिए सर्वथा नुकसानदेह है।


फूड सैफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी आफ इंडिया ने 2019 के अंत में 1.06 लाख खाद्य पदार्थों के नमूनों का परीक्षण किया, जिसमें से 3.7 फीसदी नमूनों को भारत में असुरक्षित पाया गया। वैसे तो मिलावट का बाजार सभी राज्यों में गर्म है, किंतु तमिलनाडु में यह सर्वाधिक है। वहां 45 फीसदी नमूना जांच में 12.7 प्रतिशत सेंपल मिलावटी पाए गए, जो सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं।

यह हैरत करनेवाली बात है कि देश के प्रत्येक राज्य में फूड एवं ड्रग कंट्रोल व नागरिक खाद्य आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए भारी-भरकम महकमा है, लेकिन यह महकमा कहां-क्या काम करता है, किसी को कुछ पता ही नहीं चलता? वरना, मिलावटखोरी का कालाबाजार दम तोड़ने में कितना समय लगाता?

--00--


शनिवार, 25 अप्रैल 2020

उन्मादी भीड़ की हिंसा


महाराष्ट्र के पालघर के गड़चिंचली इलाके में दो साधुओं-वयोवृद्ध कल्पवृक्ष गिरि महाराज और सुशीलगिरि महाराज सहित तीन लोगों की कोरोना वायरस संकटकाल में 20 अप्रैल 2020 को बच्चाचोरी के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। माब लिंचिंग की इस घटना के 5 प्रमुख आरोपी सहित 101 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं करीब 250 लापता हैं। सपड़ाए इन आरापिता में कई नाबालिग भी हैं। मामले में दो पुलिस अफसरों को निलंबित किया गया है। 




घटना से उद्वेलित अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने साधुओं से अपील की है कि सभी 13 अखाड़ों के साधु-संतों से अनुरोध है कि लाकडाउन के दौरान कोई संत-महात्मा ब्रह्मलीन होता है, तो उनकी समाधि में न जाएं। हम लाकडाउन के खत्म होने के बाद सभी अखाड़ों के सदस्यों को लेकर महाराष्ट्र सरकार का घेराव करेंगे।


वहीं विश्व हिंदू परिषद की जम्मू-कश्मीर इकाई ने मामले की जांच की मांग कंेद्रीय एजेंसी से की है। माब लिंचिंग को लेकर आलोचना करनेवालों को एनसीपी नेता शरद पवार ने जवाब दिया है, ‘‘यह वक्त सियासी लड़ाई का नहीं है। हम घटना की निंदा करते हैं। मामले में लगता है कि ऐसा गलतफहमी की वजह से हुआ है।’’

यह दुःखद घटना धर्मांतरण और वामपंथी हिंसक गतिविधियों की ओर भी इशारे कर रही है, जिसमें ईसाई मिशनरियों के द्वारा आदिवासी समुदायों में घुसपैठ से इंकार नहीं किया जा सकता। ज्यादातर आदिवासी इलाकों में मिशनरियों ने पांव पसार लिए हैं, पैठ जमा लिए हैं।

ज्वलंत सवाल यह कि इस देश में रहवासियों में इतनी गलतफहमियां है कि वे साधु, जो बुर्जुर्गवार व निरीह हैं; सही से चल नहीं पा रहे हैं, उन्हें लाठी-डंडे से पीटकर निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया जाता है। क्या यही है, इस देश की संस्कृति व संस्कार? यह तो सोचा-समझा जधन्य अपराध है।

इंदौर, मुरादाबाद सहित देश के अन्य हिस्सों में कोरोनावारियर्स पर पत्थरबाजी की गई, जिसमें सैकड़ों कोराना युद्धवीर आहत होने के साथ-साथ देश के लिए प्राणोत्सर्ग कर बैठे। चेन्नई में कोरोना रणवीर एक डाक्टर की मौत के बाद शव को दफनाने गए लोगों पर प्राणधातक हमला क्या कहता है?

गत वर्षो की घटनाएं

1. गत वर्ष प. बंगाल के अलीपुरदुआर जिले में बच्चाचोर होने के शक में लोगों ने एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, घटना तेसाटी चायबागान में शाम को उस समय हुई, जब लोगों ने एक व्यक्ति को इलाके में संदिग्ध हालात में घूमते देखा। 250 से अधिक लोगों ने उसे लाठी-डंडे से मार डाला।

2. बिहार में तीन मवेशी चोर भीड़ के हाथों जान से हाथ धो बैठे।

3. झारखंड में डायन होने के शक में बेकाबू भीड़ के द्वारा चार लोग मौत के घाट उतारे गए।

4. उप्र में गौमांस देखकर उन्मादी भीड़ के द्वारा थाने में धावा बोला गया।

5. तमिलनाडु में जंगल पर अतिक्रमण रोकने गई वन अधिकारी पर प्राणधातक हमला हुआ।

6. मध्यप्रदेश में एक विधायक अपने समर्थकों सहित बैट से इंदौर नगरनिगम के अधिकारियों पर बैट-बल्ले से बैटिंग किया।

7. महाराष्ट्र में एक नेता और समर्थकों ने नेशनल हाइवे पर एक इंजीनियर पर कीचड़ उड़ेला और बांधने का प्रयास किया।

8. पं. बंगाल में ‘जय श्री राम’ कहने पर तृणमूल कार्यकर्ताओं ने बीजेपी समर्थकों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।
9. उप्र व बिहार में ‘जय श्रीराम’ न कहने पर जानलेवा हमला किया गया।

10. पहले जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी आम थी, अब अनुच्छेद 370 हटने के उपरांत वहां पथराव पर विराम लगा हुआ है।

11. दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत के दौरे के दौरान भीषण दंगा-फसाद हुआ, जो माब लिंचिंग का ही नवरूप है।

माब लिंचिंग का कारण
 भीड़ की हिंसा से हरवर्ग और समुदाय आहत और मौत को प्राप्त है। वर्तमान परिदृष्य में कहा नहीं जा सकता कि कब भीड़ किस पर हमला कर दे? यह कहना कि यह किसी अल्पसंख्यक समुदाय, खासवर्ग और संप्रदाय को निशाना बनाने के लिए किया जाता है, सरासर अतार्किक, अबौद्धिक और बचकाना है। इसके शिकार, गरीब, आदिवासी, कर्मचारी, अधिकारी, साधु-संत, दलीय कार्यकर्ता से लेकर देश की सेना तक हो रही है।

भीड़ की हिंसा का कारण केवल सांप्रदायिक या जातीय नहीं है। जैसा कि प्रचारित किया जाता है। देश के अनेक इलाकों में प्रेम प्रसंग, मामूली चोरी, बच्चाचोरी, लूटमार, हाथापाई व गालीगलौच आदि आरोपों में पकड़े गए लोगों की हत्या भीड़ द्वारा इसलिए कर दी जाती है कि इन्हें छोड़ देंगे, तो लंबी कानूनी प्रक्रिया, पहुंच या पैसे के दम पर कोर्ट से छूट जाएंगे और फिर अपराध को अंजाम देंगे।

इसके लिए जहां लचर पुलिस व्यवस्था, खोखली प्रशासनिक व्यवस्था, सुस्त न्याय व्यवस्था और गैरजिम्मेदार राजनीतिक व्यवस्था जवाबदेह है, वहीं देश में अपराधियों की सजा का कम प्रतिशत भी कम जवाबदार नहीं है।

सुप्रीमकोर्ट का केंद्र व राज्यों को नोटिस

सुप्रीमकोर्ट ने भीड़ के पीट-पीटकर मार डालने (माॅब लिंचिंग) की बढ़ती घटनाओं को रोकने और कोर्ट के गत वर्ष के माब लिंचिंग रोकने के आदेश को कड़ाई से लागू करने की अपील पर केंद्र सरकार, मानवाधिकार आयोग और 11 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाबतलब किया है। शीर्ष कोर्ट ने केंद्र सहित जिन राज्यों से जवाब मांगा है, वे हैं-उप्र., जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, आंध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, प. बंगाल, बिहार, असम, मप्र और दिल्ली।


ये नोटिस गैर सरकारी संगठन एंटी करप्शन काउंसिल आॅफ इंडिया ट्रस्ट की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किए गए हैं। याचिका में अन्य बातों के अलावा मांग की गई है कि कोर्ट संसद से कहे कि वह माब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए इस अपराध को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध बनाए। साथ ही, अपराध समझौते से खत्म होनेवाला कदापि न हो।

केंद्र सरकार को चाहिए कि माब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं को गंभीरता से ले और कड़े कानून बनाए। कानून जितनी जल्दी बने और अमल में लाई जाए, उतना ही देश के सेहत के लिए बेहतर होगा। इसमें तमाम बातों के साथ इस बात का भी प्रावधान होना चाहिए कि आपराधिक मामलों में पुलिस पर नेताओं के दबाव तथा नेताओं की अनर्गल बयानबाजी और भड़काऊ भाषण पर भी सजा का प्रावधान हो। तभी इस संजीदा अपराध पर जीरो टालरेंस को साकार किया जा सकता है।

--00--


बुधवार, 15 अप्रैल 2020

मास्क पहनने का तरीका


देश-दुनिया के नगरों, शहरों, कस्बों व गांवों में कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए मास्क पहनना इसलिए अनिवार्य किया गया है, ताकि लोग कोरोना के प्रसार को रोकें। अपने ऊपर इस जानलेवा महामारी के आक्रमण से बचाव करें और परिवार व समुदाय को भी सुरक्षित करते रहें। लेकिन, सवाल यह कि मास्क को सही तरीके से पहनना भी जरूरी है, अन्यथा पहनना, न पहनना बराबर है। यदि किसी ने सही तरीके से मास्क नहीं पहना है, तो इससे न उसका बचाव हो सकता है, न उसके संपर्क में आनेवाले लोगों को।

कई लोग कहने को तो मास्क पहने रहते हैं, लेकिन सांस लेने के लिए उसे नाक के नीचे ले आते हैं या बात करने के लिए चेहरे से हटाकर गले तक ले आते हैं या ठुड्डी से ऊपर खींच लेते हैं। ये सब तरीके मास्क पहनने के प्रति अनभिज्ञता की ओर इशारे करते हैं, जो जोखिमभरा हो सकता है।

अतएव मास्क को इस तरह न पहने कि नाक का हिस्सा या नथुना खुला रह जाए। सांस मास्क के अंदर से ही लिया और छोड़ा जाए। किसी से बात करते समय उसको मुंह के नीचे भी नहीं ले जाना चाहिए। मास्क पहने-पहने ही बात की जानी चाहिए। उसे इतना ऊपर भी न खींचे कि ठुड्डी दीखे, मास्क से ठुड्डी भी ढंकी होनी चाहिए, ताकि आपका मुंह, नाक पूरी तरह बाहरी संक्रमण से मुक्त रहे।

मास्क इतना ढीला-ढाला भी न रहे कि उसके अंदर दाएं-बाएं से हवा प्रवेश करता रहे। इससे तो बाहरी बारीक कण, जो हवा में उड़ते रहते हैं, वे आपको संक्रमित कर सकते हैं। वे आसानी से आपके नाक-मुंह में प्रवेश कर आपको बीमार बना सकते हैं।

मास्क ऐसे पहने कि ऊपर आपका नाक और नीचे आपकी ठुड्डी पूरी तरह से ढंका रहे। उसमें दाएं-बाएं से हवा के प्रवेश की कोई गुंजाइश न हो। इसे इस कदर सिर के पीछे बांधा जाए या कान पर लटकाया जाए कि वह चेहरे को पूर्णतया ढंका रहे और आरामदायक लगे।

सदैव स्मरण रखें की मास्क पहनने और खोलने के पूर्व व पश्चात दोनों हाथों को अच्छी तरह साबुन या हैंडवाश से कम-से-कम 20 सेकंड तक धो लें। मास्क जब पहने व उतारें, तभी उसकी डोर को पकड़कर उतारें। फिर सेनिटाइज कर किसी सुरक्षित स्थल पर रख दें, ताकि दुबारा इस्तेमाल कर सकें या नया मास्क प्रयोग करें। 

स्मरण रहे बगैर सेनिटाइज किए मास्क का दुबारा इस्तेमाल न करें। यह जरूरी नहीं कि आप बाजार से महंगा मास्क ही खरीदकर इस्तेमाल करें। यदि आपका जेब मास्क खरीदने की इजाजत नहीं देता या आपको कहीं से दान से प्राप्त नहीं होता, तो आपके पास रूमाल या गमछा हो, तो भी उसको दोहरी परत में मोड़कर मंुह-नाक को बांधा जा सकता है। उद्देश्य यह कि संक्रमणकाल में आपका नाक-मंुह ढंका रहना चाहिए। लेकिन याद रहे कि इसको प्रयोग के उपरांत इसको अच्छी तरह धो लेना स्वास्थ्य के लिए बेहतर रहता है।

यह सही है कि मास्क सीमित सुरक्षा प्रदायकर्ता है। साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग-लोगों से 1 मीटर से अधिक दूरी बनाए रखना व बार-बार हाथ धोने को भी प्राथमिकता देना भी जरूरी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि किसी असंक्रमित व्यक्ति को मास्क पहनने की आवश्यकता नहीं है। हू की सलाह है कि सिर्फ उसी शख्स को मास्क पहनना चाहिए, जो कोरोना मरीज के साथ रह रहा है। उसका इलाज कर रहा है या खुद सर्दी-जुकाम से पीड़ित है या स्वयं कोरोना संक्रमित है।

इसी तरह भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार का कहना है कि यदि देश के 80 प्रतिशत लोग मास्क पहनें, तो कोरोना पर लगाम कसा जा सकता है। यह मास्क मेडिकल से खरीदा हुआ या घर का बना हुआ हो सकता है।

वहीं चीन के सेंटर फार डिसीज कंट्रोल ने लोगों को सलाह दी है कि वे घर से बाहर निकलने पर मास्क पहनें। इसी तरह आस्ट्रिया, चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया ने अपने लोगों में मास्क पहनना अनिवार्य किया है। हांगकांग में भी बाहर निकलते समय 99 प्रतिशत लोग मास्क पहनने हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका व इंग्लैंड में, जहां मौतों का आंकड़ा आश्यर्चजनक ढंग से बढ़ रहा है, वहां मास्क पहनना अनिवार्य नहीं किया गया है।

--00--

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

कोरोना के रणवीरों से बदसलूकी


दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी मरकज में लाकडाउन और कफ्र्यू के दौरान एक मस्जिद में 9000 के आसपास लोग 13 से 15 मार्च के बीच इकट्ठे हुए। इनमें से करीब एक-चैथाई विदेश से आए थे। देश में जब 22 मार्च को जनता कफ्र्यू व 24 मार्च को लाकडाउन का ऐलान हुआ, तब भी यहां करीब 1500 लोग बेखौफ मौजूद थे और मौलानाओं के बेवकूफाना अंदाज में दिए गए तकरीर व तहरीर को छींकते-खांसते सुन रहे थे। 

ये लोग इंडोनेशिया, नेपाल, श्रीलंका, कनाडा, थाईलैंड, मलेशिया आदि देशों और भारत के विभिन्न प्रांतों से यहां पहुंचे थे। बाद में सरकार ने इन 960 विदेशियों को ब्लैकलिस्ट करते हुए उनका वीजा रद्द कर दिया है।

        इस बेहिसाब व बेकाबू भीड़ में शामिल 2361 लोगों में-से अब तक 10 से अधिक मौत कोरोना वायरस से हो चुकी है। 1800 से अधिक लोगों की पहचान संक्रमित के रूप में की गई है, जिनमें से 280 से अधिक विदेशी हैं। यही कारण है कि भारत के 14 राज्यों में 10 हजार लोगों के संचरित होने का खतरा भयावह रूप से मंडराने लगा है।

भारत से शामिल लोगों में तेलगाना, यूपी-आगरा, फिरोजाबाद, एटा, आंध्रप्रदेश-हैदराबाद, निजामाबाद, दिल्ली, असम, छग-दुर्ग-भिलाई, कर्नाटक, महाराष्ट्र, अंडमान-निकोबार, झारखंड, गुजरात, बिहार, मप्र, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों से थे। इनमें भी सर्वाधिक तमिलनाडु के 501 लोग थे।

निजामुद्दीन मरकज से निकलकर कोराना वायरस संक्रमण देशभर में फैल गया। इसमें राजस्थान-भीलवाड़ा में 7 व जयपुर में 8; पंजाब-नवाशहर में 13, दिल्ली-दिलशाद गार्डन 1 व निजामुद्दीन 2; मध्यप्रदेश-इंदौर 12; गुजरात-अहमदाबाद 11; महाराष्ट्र-मुंबई 9 एवं पुणे 10; कर्नाटक-बैंगलुरु 14, तमिलनाडु-इरोड 16, केरल-पथनमिट्ठा 3 एवं कासरगोड 4; उप्र-नोएडा 5 व मेरठ 6 एवं अंडमान निकोबार 15 में कोरोनावायरस से संदिग्ध लोग पाए गए हैं, जिनसे मरकज से निकले लोग संपर्क में आए हैं।

यह दुस्साहस लाकडाउन, धारा 144 और आपदा प्रबंधन कानून 2005 का खुला उल्लंधन है। सरकार इधर इक्के-दुक्के लोगों पर डंडे बरसाकर सख्ती का इजहार कर रही है, उधर हजारों की संख्या में लोग मस्जिदों में जमा रहकर आपदा प्रबंधन कानून का मखौल उड़ा रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि वायरस फैल नहीं रहा है, बल्कि जानबूझकर फैलाया जा रहा है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अनुसार सरकारी आदेश का उल्लंधन करनेवालों पर एक साल के कारावास या जुर्माना अथवा दोनांे सजाएं एक साथ हो सकती है। आदेश का पालन नहीं करने पर अगर किसी की जान जाती है या जीवन को खतरा होता है, तो दोषसिद्धि पर दो साल तक के कारावास का प्रावधान है।

         एक बार गरीबों, मुफलिसों व जरूरतमंदों के एक शहर से अपने गंतव्य गांव तक का पलायन उनकी विवशता और भूख से अपने बीवी-बच्चों की जान बचाने की व्याकुलता हो सकती है। इसी तरह मजनूं की टोली में सीमा को बंद कर देने से 200-250 लोग मजबूरी में गुरुद्वारा में कैद रह सकते हैं, लेकिन गली-कूचों के चैपालों में साथ-साथ गांजा का कश भरना, बीच चैराहे पर सिगरेट के छल्ले उड़ाना, पान-ठेलों व चैक-चैबारों में हा-हा-ही-ही करना, सब्जी मंडियों व बाजारों में सोशल व फिजिकल डिस्टेंट को दरकिनार करना, विदेश से लौटकर क्वारेंटाइन न करना और क्वारेंटाइन पूरी करवाए बगैर अस्पताल से भाग जाना, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-गिरिजाघरों में धर्म के नाम पर भीड़भाड़ करना ‘देशद्रोह’ नहीं, तो किसी ‘देशद्रोह’ से कम भी नहीं है? 

        ऐसी अनियमित गतिविधि उन करोड़ों भारतीयों के जीवन के साथ खिलवाड़ और मजाक है, जो दिन-रात लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए अपना काम-धाम बंद कर घरों में कैद हैं। कोरोनाबंदी के इस दौर में ये करोड़ों लोग गृहबंदी कर यही कामना कर रहे हंै कि देश कोरोनामुक्त हो जाए।

मस्जिद प्रशासन के लोगों का यह कहना गले नहीं उतरता कि मस्जिद में ऐसा धार्मिक आयोजन 100 साल से हो रहा है और हमें लाकडाउन की जानकारी बाद में लगी। यह तर्क उथला और थोथा है। भारत में ‘नवरात्र’ का आयोजन 100 क्या हजारों साल से हो रहा है, लेकिन कोरोना के कहर के कारण इस साल इसका आयोजन कहीं नहीं हुआ।

        दूसरा, जब कोरोना की आहट भारतीयों को होने लगी थी, तब उन्होंने भारत के एक महत्वपूर्ण पर्व होली, जो 10 मार्च को थी, उसमें कई परिवार घर से बाहर ही नहीं निकले और जो मनाए वे सादगीपूर्ण तरीके से मनाए।
तीसरा, कोरोनावायरस की शुरूआत चीन में दिसंबर के पहले सप्ताह में ही हो गई थी, जबकि उसका विस्तार दुनिया में जनवरी-फरवरी में हुआ। माना जाता है कि जानलेवा वायरस कोविड-19 भारत में चीन से नहीं, इटली के पर्यटकों के मार्फत फरवरी अंत में भारत आया। 

सर्वविदित हो कि भारत में इस प्राणलेवा वायरस से पहली मौत 11 मार्च 2020 को कर्नाटक के एक 76 वर्षीय बुजुर्ग की हुई थी। संयोग से इसी दिन डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया था।

दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज से भाग खड़े हुए जमातियों की तलाश में बिहार पुलिस जब मधुबनी मस्जिद पहुंची, तब वहां मौजूद लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस 4 लोगों को धरदबोची। दूसरी ओर, इंदौर के एक मोहल्ले में जांच के लिए गई स्वास्थ्यकर्मियों की टीम पर पत्थरबाजी की गई। उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीटने की कोशिश हुई।

        तीसरी तरफ, दिल्ली के मरकज से भागे हुए 97 जमातियों को रेलवे के डीजल शेड टेªनिंग स्कूल हाॅस्टल में जब रखा गया, तब ये लोग स्वास्थ्यकर्मियों व रेलवेकर्मियों के साथ दुव्र्यवहार कर रहे थे। ये ऐेसे बदमिजाज हैं, जो डाॅक्टरों पर ही थूक रहे थे; इधर-उधर धूमकर फिजिकल डिस्टेंडिंग का मखौल उड़ा रहे हैं। सेवादाताओं को ही हलाकान कर रहे हैं।

       इधर, यूपी के गाजियाबाद में अस्पताल में भर्ती जमाती अश्लील हरकतों पर उतर आए थे। अस्पताल के सीएमओ ने पुलिस को पत्र लिखकर अपनी व्यथा व्यक्त की है,‘‘ये लोग वार्ड में नग्न घूमकर नर्सों को अश्लील इशारे कर रहे हैं। बीड़ी-सिगरेट की मांग कर रहे हैं। इनपर कार्रवाई की जाए।’’

        कोरोना के संदिग्ध मरीजों का इलाज करने के लिए आई नर्सों को देखकर भद्दे इशारे करना, केवल यही दर्शाता है कि हिंसक-से-हिंसक जानवर भी अपने उपचारकर्ता की तरफ अहसान और कृतज्ञता के भाव से देखता है। लगता है ये उन हिंस्त्र जानवरों से भी अधिक क्रूर, हिंसापसंद और बदमिजाज हैं। इन्हें यह नहीं पता कि ‘दवा तो सिर्फ मर्ज का इलाज करती है, मरीज को स्वस्थ तो डाक्टर और स्वास्थ्यकर्मी ही करते हैं।’

        उप्र के ही कन्नौज में जुमे की नमाज के लिए मस्जिद में 25-30 लोगों की भीड़ जुटी हुई थी। पुलिस उन्हें हटाने पहुंची, तो नमाजियों ने पथराव शुरू कर दिया। ईंटों व पत्थरों से किए गए हमले में एक कांस्टेबल सहित दो लोग घायल हो गए।

       वहीं, यूपी पुलिस ने डाक्टर अथवा सफाईकर्मियों पर हमला करनेवालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत केस करने का ऐलान किया है। गाजियाबाद के अस्पताल में जिन 6 जमातियों ने नर्सों के साथ अश्लील हरकतें की हैं, उनपर रासुका लगाया  जा रहा है।

        राजस्थान के चितौड़गढ़ की एक मस्जिद में जुटे दो दर्जन लोगों पर केस दर्ज किया गया है। साथ ही, अफवाह फैलानेवाले एक शख्स को गिरफ्त में लिया गया है। उधर, वे टीक-टाकिये, जो अपने संदेश में देश में नफरत व सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, उनपर भी कड़ी कार्रवाई करने का संकेत सरकारों ने दिया है।

        क्या इन्हें इत्ती-सी बात समझ में नहीं आ रही है कि इस्लाम के सबसे बड़े इबादतगाह मक्का-मदीना को भी कोरोना संक्रमण के चलते जब पहले से बंद किया गया है, तब वे भारत की मस्जिदों को क्यों बंद नहीं करना चाहते?

       तबलीगी जमात को यह समझने की जरूरत है कि राष्ट्र से बड़ा धर्म नहीं होता। धर्म का अस्तित्व तभी है, जब राष्ट्र है। राष्ट्र यदि आपदा से पीड़ित है, तो यह राष्ट्रवासियों का प्राथमिक दायित्व है कि वे सरकार के आदेश का अक्षरशः पालन करें। ‘‘घर में रहें, घर में रहें और एक काम करें, घर पर ही रहें’’

क्या है तबलीगी मरकजः तबलीगी का मतलब धर्म के विस्तार की शिक्षा और मरकज उसके मुख्यालय या केंद्र को कहते हैं। इसे इस्लामिक धार्मिक शिक्षा केंद्र भी कहा जा सकता है।

       इसके लिए मौलाना साद, जो निजामुद्दीन मरकज के प्रमुख हैं और तब्दीली जमात के कई लोगों पर नामजद केस दर्ज किया गया है। मुकदमें मंे साजिश की धाराएं लगाई गई हैं। यानी पुलिस मानकर चल रही है कि ये सब सुनियोजित षड़यंत्र है। दूसरी ओर खबर यह भी है कि दिल्ली की जाकिर नगर वेस्ट की एक मस्जिद में 50 विदेशी आकर ठहरे हुए थे। 22 मार्च की रात से 41 विदेशी लापता हैं। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पुलिस को आदेश दिया है कि इन्हें तलाशकर तुरंत बाहर निकालें।

सवाल यह कि और कितने ऐसे विदेशी हैं, जो देश के तमाम मस्जिदों और धर्मस्थलों में पनाह लिए हुए हैं? बगैर वैध वीजा देश में इन्होंने प्रवेश कैसे कर लिया और इतने दिनों तक रह लिया? जिन लोगों ने इन अवैध घुसपैठियों को पनाह दिया है, आखिर वे कौन लोग हैं? उनका मकसद क्या है?

दरअसल, तबलीगी जमात के ये मौलाना पर्यटन वीजा पर भारत आते हैं और भारतीय कानून-व्यवस्था को झांसा देकर काम मिशनरी वीजा का करते हैं। मिशनरी वीजा समयबद्ध होता है, जिसमें उन्हें जांच एजेंसियों के जांच से गुजरना पड़ता है और तय समय के बाद भारत से रुखसत होना पड़ता है।

टूरिस्ट वीजा में यह डर नहीं रहता और उन्हें बरसोंबरस तक भारत में धर्म-प्रचार का बेजा छूट मिल जाता है। इसी छूट का फायदा ये इस्लामिक धर्मप्रचारक उठाते हैं।

इसको सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध के एंगल से भी जांचा जाना चाहिए कि क्या ये विदेशी देश के खिलाफ किसी गहरी साजिश और वारदात को अंजाम देने के लिए भारत के धर्मविशेष के लोगों के घरों में पनाह तो नहीं पाए हुए हैं। कारण यह कि लाख समझाइश के बावजूद और कोरोनावायरस के खतरे के बावजूद शाहीनबाग में किसी पड़यंत्र की नाई विरोध-प्रदर्शन जारी रखा गया था।

किसी कवि ने खूब कहा हैः-
पत्थर उनपर बरसाए तुमने,
जो तुम्हें बचाने आए थे।
उनसे कैसा धर्म निभाया तुमने,
जो धर्म निभाने आए थे।
खुदा के रहम को ठुकराकर,
जानते हो क्या चूक गए?
बंदे भेजे उसने हिफाजत को,
तुम उन्हीं पर थूक गए!
ये फरिश्ते, तो फिर आएंगे,
इनमें खुदाई जिंदा है।
पर तुम्हारे अमानवीय व्यवहार से,
आज इंसानियत शर्मिंदा है।

--00--

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

‘निर्भया’ केस का सबक


आखिरकार, निर्भया के चार गुनेहगारों को 20 मार्च 2020 को कोरोनावायरस की गहमागहमी में 7 साल 3 माह बाद उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया। अक्षय ठाकुर, पवन गुप्ता, मुकेश सिंह और विनय शर्मा का आखिरी दिन नर्क जैसा बीता। वे जान की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाते रहे। छह में-से एक दरिंदा रामसिंह पहले ही खुदकुशी कर अल्ला को प्यारा हो चुका था।



कोरोना कहर के बीच देशवासियों के नजरों से एक बड़े मामले का पटापेक्ष यूं हो गया, गोया कुछ हुआ ही न हो। जबकि यह एक ऐसा मामला था, जिसने देश की आत्मा और अस्मिता को झकझोर कर रख दिया था।


        एक हैवान नाबालिग होने का फायदा उठा गया और मामूली सजा भुगत कर बरी हो गया। नाबालिग शैतान का यूं बरी होना कानून-व्यवस्था पर सवाल उठता है कि यदि वह नाबालिग था, तो बलात्संग जैसा गंभीर अपराध करने के बाद जधन्य हत्या जैसे प्रयास में कैसे शामिल हो गया?

      वह तो कानून के उस सुराख का बेजा फायदा उठा गया, जिसपर अब कानूनदाओं को संजीदगी से विचार करना चाहिए और अब उन सबको इसकी गिरफ्त में लाना चाहिए, जो दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में संलग्ल पाए जाते हैं। अन्यथा ऐसे सिरफिरे कुंआरेपन का बेजा फायदा उठाते हुए कानून के राज की खिल्ली उड़ाते हुए समाज पर बोझ बने रहेंगे।

      ‘निर्भया’ केस कमजोर कानून-व्यवस्था, सरकारों की लचर दंडनीति, लंबी अदालती कार्रवाई, वकालत पेशे की नैतिकता, न्याय में विलंब जैसे कई सवाल खड़ी करती है, जिसका निकट भविष्य में समाधान नहीं किया गया, तो देशवासियों का विश्वास कानून के राज पर से उठने में देरी नहीं हो सकती।


       बलात्कार जैसे जधन्य अपराध के लिए न्याय मिलने में इतना विलंब अन्याय के समान है। यदि यह न्याय चार-छह महीने में मिल जाता, तो भारतीय न्याय-व्यवस्था की जीत होती, लेकिन सात साल और तीन माह में न्याय मिलना कैसा और कहां का न्याय हुआ? जबकि सबूत पुख्ता व ठोस थे। मसला पारदर्शी था। फिर भी न्याय में इतना विलंब होना, समूची कानूनी-व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

सवाल यह भी कि ये दरिंदे एक निजी बस में मामूली हैसियत वाले ड्राइवर, कंडेक्टर, क्लीनर, हेल्पर और फल विक्रेता थे। इनकी माली हालत ठीक नहीं थी। ये रोज कमाने व खानेवाले परिवारों से थे। आखिर इनको इतनी ताकत कहां से मिल रही थी कि ये सात साल और तीन माह तक केश को खींचते और उलझाते रहे। 

क्या एक साधारण औकात का इंसान विशेष न्यायालय, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में लाखों खर्च कर मुकदमेबाजी कर सकता है? वकीलों को मोटी फीस देकर यहां-वहां अपील कर सकता है! हरगिज नहीं!! न्यायालयों और उच्चाधिकारियों के दफ्तरों में अपील-दर-अपील वही आदमी कर सकता है, जिनके पास अकूत धन हो या धनकुबेरों से खासा धन खैरात में मिल रहा हो।


       यदि कोई आम इंसान ऐसा करता है, तो उसके बैंक बैलेंस न केवल खाली हो जाते हैं, अपितु उसके जेवर-जेवरात, घर-द्वार, जमीन-जायदाद तक बिक जाते हैं, तभी वह अधिवक्ताओं की मोटी फीस का जुगाड़ कर पाता है। सरकार के लिए यह जांच का विषय होना चाहिए कि इन जधन्य अपराधियों के फाइनेंसर कौन-कौन लोग थे? उसे सीबीआई या आईबी से इसकी पड़ताल करवानी ही चाहिए कि इनको दौलत व ताकत कौन-कौन लोग दे रहे थे?


अधिवक्ताओं के लिए भी यह केस सबक होना चाहिए कि वे अपने पेशे की गरिमा का ख्याल रखते हुए ऐसे जधन्य अपराधियों के लिए केस लड़ने से इंकार कर दें। विकसित देश हमसे नैतिकता में इसलिए भले हैं, क्योंकि वहां अपराधी को अपराधी की निगाह से देखा जाता है और ऐसे मुकदमे लड़ने से साफ इंकार कर दिया जाता है। क्या इस देश में माननीय अधिवक्ताओं को अपने गरिमामय पेशे की खातिर खुद के लिए ऐसा आचार संहिता नहीं बनाना चाहिए और संजीदगी से पालन नहीं करना चाहिए?

देश को ‘निर्भया’ को न्याय दिलाने के लिए लंबा संघर्ष वाली उस वकील और उसके सहयोगियों को सलाम करनी चाहिए, जो अपने पेशे को गरिमामय बनाए रखने में कोई कोरकसर उठा नहीं रखी। सरकारों को सोचने-विचारने की जरूरत है कि यदि वह बहादुरी के साथ सारे सबूतों को परत-दर-परत अदालतों के सम्मुख नहीं रखती थी, तो ‘निर्भया’ को न्याय कहां से मिलता? इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह ऐसे वकीलों को कम-से-कम ‘पद्मश्री’ से सम्मानित करे।


इस दुर्दांत केस में वे सारे साजोसामान बलात्कारियों के गिरेबान तक पहुचने में काम आए, जिन्हें ‘निर्भया’ और उसके साथी को मारने-पीटने में उपयोग किए गए थे और छीन-झपटी में हथियाए थे। मसलन, वह खून से सना हुआ राड, जिसका उपयोग निर्भया को लहूलुहान करने में उपयोग किया गया था। इसके अलावा घड़ी, चप्पल, रुपया, जो निर्भया और उसके साथी से छीने गए थे, वे सब बतौर सबूत दुष्कर्मियों की पहचान करने और उन्हें शूली तक ले जाने में कामयाब रहे। साथ ही वह फोरेंसिक जांच व दंत जांच, जिसमें निर्भया के बदन को काटा गया था, वह भी ठोस सबूत बना। यह फोरंेसिक जांच सिंगापुर में हुआ था।

निर्भया केस का संदेश यह भी है कि बच्चों के मां-बाप या अभिभावक अपने बच्चे को बेहतर नैतिक शिक्षा देने में कोताही न बरतें। निर्भया केस सभी अभिभावकों के लिए सबक है कि कैसे एक किशोर बलात्कारी या पशुवत सोचवाला युवा बन जाता है? 

क्या उसके लालन-पालन में कोई कमी रह जाती है, जिससे वह नैतिक पतन की धिनौनी राह पर चल पड़ता है? यह देखना माता और पिता का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। इसी तथ्य की ओर इंगित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में एक दफे कहा था कि ‘बेटे की गतिविधि पर भी अभिभावक वही पैनी नजर रखें, जो बेटियों के लिए रखते हैं।


क्या अब इन छहों दरिंदों के माता-पिता, भाई-बहन, बीवी और बच्चे किसी को मुंह दिखाने के काबिल रहेंगे? इनकी बहन, बेटियों से ब्याह कौन रचाएगा? इनके लड़के-बच्चे किस गटर में गिरकर गंदी नाली के कीड़े बनेंगे, कोई नहीं जानता?

इस सबंध में समाजशास्त्रियों का अभिमत है कि सरकार, समाज और अभिभावक को चाहिए कि वह बच्चों को प्राइमरी स्कूल से नैतिक शिक्षा अनिवार्यतः प्रदान करें। बच्चों को गणित व विज्ञान की शिक्षा की होड़ाहोड़ी में अभिभावक यह न भूलें कि बच्चों को संस्कारी बनाना भी आवश्यक है और यह नैतिक शिक्षा से संभव है। इसी के साथ इंटरनेट व सोशल मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगाकर अनैतिकता को रोकने का भरसक प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि देश और समाज में नैतिकता संपन्न लोगों की संख्या में इजाफा हो।

देश में 2014 से 2018 तक दुष्कर्म के 1.75 लाख मामले दर्ज हुए हैं। इसमें मध्यप्रदेश 25,229 मामलों के साथ सबसे आगे है। वहीं उत्तरप्रदेश 19,406 मामलों साथ दूसरे, राजस्थान 18,542 के साथ तीसरे और महाराष्ट्र 15,613 के साथ चैथे नंबर पर है। 2016 में दुष्कर्म के सर्वाधिक 38,947 मामले दर्ज किए गए।


सवाल यह भी कि 2014 से 2018 तक दुष्कर्म पीड़िता 1.75 लाख ‘निर्भयाओं’ के मामलों का क्या होगा? उनको इंसाफ कब मिलेगा? कैसे मिलेगा? क्या इनके ये दरिंदे अपने अंजाम तक पहुंचेंगे या कानूनी लूजपोल का फायदा उठाकर यूं ही छूट जाएंगे?

इन्हीं सब स्थितियों के मद्देेनजर ‘निर्भया’ की मां आशादेवी ने संकल्प व्यक्त की है कि वह इंसाफ के लिए रह गई बेटियों को त्वरित इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष करेंगी और 20 मार्च को प्रतिवर्ष ‘निर्भया दिवस’ मनाएंगी। अब, तो समस्त उत्तरदायी संस्थाओं को प्रतिदिन ‘निर्भया दिवस’ मनाने की जरूरत आन पड़ी है, ताकि सबको त्वरित न्याय मिले और अन्याय का मिलकर प्रतिकार कर सकें।


--00--

मंगलवार, 31 मार्च 2020

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना


       कोरोना राहत पैकेज का नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना रखा गया है, जो 1.7 लाख करोड़ रुपए का है। लेकिन अफसोस कि यह रकम 2019-20 के वित्तवर्ष में भारत के संशोधित जीडीपी का सिर्फ 0.89 प्रतिशत है। इसलिए इसे ऊंट के मुंह में जीरा कहना उचित जान पड़ता है। इस योजना के तहत निम्नांकित घोषणाएं की गई हैं।

1. मनरेगा के रोजेदारों की प्रतिदिन मजदूरी 20 रुपया बढ़ाई गई है, जो अब बढ़कर 202 रुपया हो जाएगी। इसके लिए बजट में 5600 करोड़ का प्रावधान किया गया है। सवाल यह कि मनरेगा जितना काम, उतना दाम वाली स्वैच्छिक ग्रामीण भारत की योजना है। हरसाल इसमें मजदूरी मार्च माह में आटोमेटिक रूप से बढ़ती है। फिर सरकार मनरेगा के मजदूरों की मजदूरी बढ़ाकर कौन सा ऐसा तीर मार दी, जो नया है। ऊपर से सामाजिक दूरी का पालन करने और घरों से नहीं निकलने देने की सूरत में मनरेगा का काम कैसे चलेगा; कौन करवाएगा?

2. 80 करोड़ लोगों को प्रतिमाह 5 किलो अतिरिक्त गेहूं या चावल तीन महीने का निःशुल्क दिया जाएगा। इसी के साथ हर परिवार को तीन महीने तक 1 किलो दाल फ्री दी जाएगी। यह राशन राज्य सरकारों द्वारा देय राशन के अतिरिक्त होगी। इसका बजट 40 हजार करोड़ का रखा गया है। इसका खुलासा नहीं किया गया है कि ये 80 करोड़ कौन लोग होंगे? लगता है ये वे लोग होंगे, जिनके पास गरीबी रेखा का राशनकार्ड मौजूद होगा? लेकिन तालाबंदी व बाजारबंदी के चलते नमक, तेल, चीनी, साग-सब्जी जैसे बुनियादी चीजों की उपलब्धता का कैसे होगी?

3. स्वयं सहायता समूहों के लिए कर्ज की रकम 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपया किया गया है, जो झुनझुना थमाने के सिवाय और कुछ नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह कि यह कोई लाभांश, रियायत या मदद नहीं है। जब स्वसहायता समूह किसी बैंक से कर्ज लेते हैं, तब उसको 10 के बजाय 20 लाख रुपये का कर्ज मिलेगा।

 बस इतनी सी बात है। एसजीएसवाई की इस योजना में केवल 3 लाख रुपये तक के कर्ज के ब्याज में छूट मिलती है। सेल्फ हेल्फ ग्रुप तीन लाख से ज्यादा लोन लेना भी नहीं चाहता, न बैंकें देना चाहती है। जिसमें न कोई बढ़ोतरी किया गया है, न इस आधी-अधूरी नीति को बदलकर कर बहुउपयोगी बनाया गया है।

4. महिलाओं के 20.40 करोड़ जनधन खाता में तीन महीने में 1500 रुपए का योगदान सरकार देगी। अर्थात प्रतिमाह 500 रुपया। इससे तो अधिक प्रतिदिन कुशल और उच्चकुशल लोग कमा लेते हैं और फिर पुरुषों को यह राहत क्यों नहीं दिया गया? इसके लिए बजट में 30 हजार करोड़ रुपए का बंदोबस्त किया गया है।

5. 8.7 करोड़ किसानों को अप्रैल महीने में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत 2 हजार रुपए दिए जाएंगे। इसके लिए बजट में 16 हजार करोड़ का इंतजाम किया गया है। वस्तुतः, किसान सम्मान निधि की यह रकम पूर्ववत अप्रैल महीने में किसानों को दी जानी थी, जो कोरोना राहत पैकेज में जोड़ दिया गया है। विचारणीय यह भी कि यह रकम जमीन के केवल मालिकाना हकदार किसानों को मिलना है। जो हलधर भूमिहीन, खेतिहर मजदूर हैं और जो सहायता के अत्यधिक आकांक्षी हैं, उन्हें अब भी कोई फायदा नहीं होनेवाला है।

6. 60 साल से अधिक उम्र के वृद्ध व विधवाओं को तीन महीने तक एक हजार रुपए इमदाद दी जाएगी। इसका बजट प्रावधान 3 हजार करोड़ रुपया है। योजना का यह भाग बुर्जुगों व विधवाओं के लिए मददगार साबित होगा; क्योंकि उन्हें अब तक 200 से 500 रुपए तक आर्थिक सहायता मिलती थी। कई राज्य सरकारें इस राशि में कुछ और मिलाकर इन गरीबों का कल्याण करती थीं।

7. 8 करोड़ परिवारों को उज्जवला योजना के तहत बीपीएल परिवारों को 3 महीने तक मुफ्त घरेलू गैस सिलेंडर दिया जाएगा। इसके लिए 13 हजार करोड़ का बजट रखा गया है। यह योजना गरीबों के लिए लाभकारी है। कारण कि गरीब परिवारों के पास इतना सामथ्र्य नहीं होता कि वे दूसरा या तीसरा सिलेंडर भरा सकें। गौरतलब है कि उज्जवला योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मई 2016 को उप्र के बलिया से लांच किया था। योजना के तहत 14.2 किलोग्राम का गैस सिलेंडर मुफ्त दिया जाता है।

8. सरकार उन 100 से कम स्टाफ वाली कंपनी के कर्मचारियों और कंपनियों के हिस्से का ईपीएफ योगदान देगी, जहां 90 फीसदी कर्मचारी 15 हजार या इससे कम वेतन पाते हैं। इसपर भांति-भांति के विचार हैं, इसलिए देखना यह कि इसका फायदा किस कंपनी के किस कर्मचारी को मिलता है और किसको नहीं?

9. वे स्वास्थ्यकर्मी, डाक्टर, नर्स आदि जिनकी कोरोनाबंदी के दौरान खुदा न खास्ता शहादत होती हैं, उनके परिवारों को 50 लाख का बीमा राहत दिए जाने का एलान किया गया है। यह प्रशंसनीय योजना है, बल्कि इसका विस्तारण उन सभी के लिए होना चाहिए, जो कोरोना संकट के दौर में देशवासियों की सेवा और प्राणों की रक्षा में लगे हुए हैं, फिर चाहे वे कोई हों।

10. आयुष्मान भारत योजना और राज्यों की तमाम स्वास्थ्य योजनाओं को मर्ज कर इन्हीं के तहत कोरोना के संक्रमितों का उपचार किया जाना चाहिए और चलित अस्पतालों का त्वरित निर्माण किया जाना चाहिए।

11. जवाहरलाल नेहरू विवि के पूर्व प्राफेसर और अर्थशास्त्री के अनुसार निजी लैबों में कोरोनावायरस टेस्टिंग के लिए जो 4500 रुपए की रकम निर्धारित की गई है, वह गरीबों में कोढ़ में खाज की तरह है। जिन गरीबों के पास खाने-पीने के लाले पड़े हों, वे कैसे इन लैबों का लाभ ले सकेंगे? यह जांच तो फ्री में या अत्यल्प राशि में होना चाहिए, तभी गरीबों को इसका फायदा मिल सकेगा।

         लब्बोलुआब यह कि सरकार राहत पैकेज के नाम पर कौडियां बांट रही है। जबकि उसको दरियादिल होना चाहिए था। कोरोनावायरस खतरे की घंटी बजा रहा है और सरकारें केवल खानापूर्ति कर रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि आननफानन में लिए गए इस निर्णय का भी नोटबंदी व जीएसटी की तरह सर्वत्र आलोचना होने लगे?

--00--

शनिवार, 21 मार्च 2020

कोरोना से जंग


चीन से प्रस्फुटित कोरोनावायरस अब दुनिया के 190 से अधिक देशों में कोहराम मचा रहा है। यह चीन में जहां 3 हजार से अधिक लोगों की जानें ले चुका है, वहीं इटली में 6 हजार लोग इसके आगोश में समा चुके हैं। चीन में 83 हजार लोग प्रभावित हैं, तो इटली में 84 हजार लोग। सुपर पावर अमेरिका में इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख 4 हजार से अधिक हो गई है, वहीं 1700 लोग मारे जा चुके हैं। वहीं ईरान में 32 हजार प्रभावित हैं, तो 2300 लोग मौत को प्राप्त हैं। इंग्लैंड मे 14 हजार प्रभावित हैं, तो 7 से अधिक मौत के मुंह में जा चुके हैं। 



ऐसा ही हाल साउथ कोरिया, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, फ्रांस का है। दुनिया मे 6 लाख से ज्यादा लोग इससे संक्रमित हैं, जिसमें करीब 27 हजार लोगों की मौत हो चुकी है और 20 हजार से अधिक लोग गंभीर हालत में हैं। यह भी सच है कि इससे संक्रमित 1लाख से अधिक लोग स्वस्थ हुए हैं। यदि संक्रमण का यही आलम रहा, तो मौतों का ये आंकड़ा भयावह रूप से 
बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

कोरोना न धर्म देख रहा है, न मजहब; मंदिर देख रहा है, न मस्जिद; न जाति, न धर्म; न सूरत, न सीरत; न अमीर देख रहा है, न गरीब; न देशी देख रहा है, न विदेशी; न गांव देख रहा है, न शहर; न काला, न गोरा; न पढ़ा-लिखा, न अनपढ़; यह सबदूर सबको अपनी आगोश में लेने के लिए आतुर दिख रहा है। यहां तक कि इसकी मारकता व विकरालता जितना झुग्गीझोपड़ी वासियों के लिए है, उतना ही आलीशान भवन वालों के लिए भी है।


इसके खौफ से दुनिया सहम-सी, ठहर-सी  गई है। सारे आर्थिक क्रियाकलाप बंद हो गए हैं। कुछ अपनेआप शटडाउन हो गए हैं, तो कुछ को सरकारों ने लाकडाउन कर दिया है। कल-कारखानों और उत्पादन केंद्रांे पर ताला जड़ दिया गया है। जो दफ्तर, बाजार, चैक-चैबारे कभी गुलजार रहा करते थे, वहां सन्नाटा पसर गया है।

इसकी भयावहता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व में हेल्थ इमेरजेंसी लगा दिया है और एडवाइजरी जारी की है। यह विकसित देश अमेरिका, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस समेत विकासमान देश ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और तमाम देशों में हाहाकार मचा रहा है।

दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय उड़ानें, खेलकूद, आस्था केंद्र, स्कूल-काॅलेज, कोचिंग संस्थान, माल-बाजार, दुकानें, रेल्वे स्टेशन, बस अड्डे अर्थात भीड़भाड़वाले सभी स्थलों को एहतियातन बंद कर दिया गया है। इससे जापान में होनेवाले आगामी ओलिंपिक खेलों पर घना कोहरा छा गया है। भारत में आईपीएल रोक दिया गया है। सभी खेलों के  छोटे-बड़े मैच स्थगित कर दिए गए हैं।


भारत में कोरोनावायरस का विस्तार सभी राज्यों में हो गया है। देश में कोरोना पीड़ितों की संख्या इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि संक्रमित लोग विदेश से आकर बगैर आइसोलेशन के समाज में घुलमिल रहे हैं। ताजा मामला लंदन से लौटी सिंगर कनिका कपूर का है, जो बिना आइसोलेशन के नेताओं, जजों, व्यापारियों समेत 400 से अधिक लोगों से मिलीं और अब कोरोना पाजिटिव पाई गई।

        ऐसी ही लापरवाहियों से जहां महाराष्ट्र, यूपी, केरल, दिल्ली व राजस्थान सर्वाधिक प्रभावित हैं, वहीं तेलंगाना, कर्नाटक, हरियाणा, लद्दाख,  गुजरात, मप्र, छग में भी इससे संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है। देश में अब तक 21 लोगों की मौत हुई है, वहीं नौ सौ से ज्यादा लोग संक्रमित हैं। लेकिन, जिनकी मौतें हुईं हैं, वे 60 साल से अधिक बुजुर्ग थे और अन्य व्याधियों से ग्रसित थे।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी विकरालता के मद्देनजर देशवासियों से मार्मिक व वैज्ञानिक अपील कर 22 मार्च 2020 रविवार को सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक ‘जनता कफ्र्यू’ लगाने का आव्हान किया है। यह ‘कफ्र्यू’ जनता द्वारा, जनता के लिए खुद अपने ऊपर लगाया जानेवाला कफ्र्यू है।

       जनता कफ्र्यू का स्वागत देश के अधिकांश राज्यों ने किया है और अपने सामथ्र्य से तैयारी की है। इसे ‘नाॅट कफ्र्यू, इट्स केयर फार यू’ कहा जा रहा है। वहीं कंफेडरेशन आफ आल इंडिया टेªडर्स-सीएआईटी ने इसका स्वागत करते हुए अपने व्यापारियों से कहा है कि 22 मार्च को 7 करोड़ व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखेंगे।

 लेकिन, अफसोस कि दिल्ली के शाहीन बाग में बैठे हुए लोग इसकी गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। सरकार इन्हें घरों में रहने की अपील कर रही है, लेकिन इन्हें अपनी थोथी और असंवैधानिक जिद के आगे देशहित की परवाह नहीं है।

दरअसल, 19 मार्च से देश में कोरोना का तीसरा चरण यानी कम्यूनिटी इंफेक्शन आरंभ हो रहा है। ये वो समय है, जब वायरस एक व्यक्ति से दूसरे में तेजी से फैल सकता है। इसलिए जनता कफ्र्यू के मार्फत सबको ‘होम आइसोलेशन’ में रहने की सलाह दी जा रही है। इसके अगले दिन अर्थात सोमवार को 9 बजे लोग घरों से निकलेंगे। यह 36 घंटे का समय होगा, जिससे कयास लगाया जा रहा है कि कोरोना वायरस फैलने से रुक जाएगा। देश महामारी से बच जाएगा। लेकिन यह कयास मृग मरीचिका साबित हो रही है।

                                                             स्वयं की सावधानी 

1. अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित व मजबूत करें। खूब पानी पीएं। यदि गले में खराश हो, तो कुनकुना पानी पीएं। खूब व्यायाम, योग व प्राणायाम करें। इसमें अनुलोम-विलोग को प्राथमिकता दें। स्वास्थ्यवर्धक भोजन का सेवन करें। चिंता व तनावमुक्त रहें। खूब नींद लें, ताकि तन व मन स्वस्थ रहे।

2. कोरोना वायरस का मानव शरीर में प्रवेश श्वसनतंत्र-आंख, मुंह नाक से होता है, इसलिए बार-बार हाथ धोने की सलाह दी जा रही है, ताकि जब कभी आंख, मुंह या नाक तथा चेहरे में हाथ जाए, तो हाथ धुला रहे।
3. लोगों से 1 मीटर या 6 फीट की दूरी बनाए रखें। हाथ और गले मिलना-मिलाना संक्रमणकाल में बंद करें। इसकी बजाए नमस्ते का प्रयोग करें।

4. खांसते या छींकते वक्त रूमाल या टिश्यू पेपर का प्रयोग करें, ताकि वायरस न फैले। टिश्यू पेपर को सीधे डस्टबिन में डालें और रूमाल को रोजाना गरम पानी से धोएं। यह श्वास नली मंें पनपता है, इसलिए मिनट-आधमिनट तक दिन में कई बार लंबे-लंबे सांस लें और छोड़ें।

5. सर्दी, खांसी, सिरदर्द, गले में खराश या बुखार हो, तो डाॅक्टर की सलाह लें और नजदीकी आइसोलेशन सेंटर में जाकर अपनी जांच करवाएं या किसी डाक्टर को जांच के लिए बुलाएं।

6. साधारण सर्दी-खांसी से डरें या धबराएं नहीं, बल्कि घरु या बाहरी इलाज कर इन व्याधियों से मुक्त हो जाएं।

--00--

सोमवार, 16 मार्च 2020

अकादमिक बहस


       प्रारंभिक रिपोर्ट कहती है कि जेएनयू की हिंसा के मूल में फीस बढ़ोतरी का विरोध है। अभी तक ये छात्र नाममात्र का फीस दे रहे थे और अपनी राजनीति चमकाने के लिए विरोध-प्रदर्शन करते थे। विरोधी छात्र अन्य छात्रों को अगले सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं कराने दे रहे थे। इससे विवाद होने लगा। ज्यादातर छात्र पंजीयन कराना चाहते थे, लेकिन फीस बढ़ोतरी पर आंदोलित एक गुट ने उन्हें बलपूर्वक रोकना चाहा। परिणामतः उग्र विवाद नकाबपोश हिंसक वारदात के रूप में सामने आया।
       इस हिंसा में नकाबपोशी गुंडों ने दर्जनों छात्रों को गंभीर चोटें पहुंचाईं। यहां तक कि छात्रसंघ अध्यक्षा को भी लहूलुहान कर दिया। नकाबपोश राड, स्टीक, बैट, डंडे लेकर हमलावर थे, तो हास्टल के छात्र बचाव की मुद्रा में भागा-दौड़ी कर रहे थे।
       इसपर सियासी बयानों की बयार बहने लगी। कोई इसे फासीवादी ताकत से छात्र आंदोलन को कुचलने के आरोप लगा रहा है, तो कोई देशभर में छात्रों की आवाज को दबाने के लिए हर तरीके व हथकंडे अपनाने की बात कह रहा है। कई इसे 26/11 के आतंकवादी हमले की तरह देख रहे हैं। कई नाजी जर्मनी को याद कर रहे हैं। कइयों को इसमें लेफ्ट-राइट का आपसी कलह नजर आ रहा है।
       देश के 208 से अधिक शिक्षाविदों व कुलपतियों ने प्रधानमंत्री को खत लिखा है, जिसमें उन्होंने अकादमिक माहौल को बिगाड़ने के लिए वामपंथी कार्यकर्ताओं के समूह की गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया है। इन बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे इसपर हस्तक्षेप करें, ताकि कैंपस में सौहार्दपूर्ण माहौल बहाल हो सके।
        उन्होंने खत मंे लिखा है कि हमारा मानना है कि छात्र राजनीति के नाम पर विध्वंसकारी धुर वामपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। जेएनयू से लेकर जामिया तक, एएमयू से लेकर जाधवपुर विवि तक परिसरों में हुई हाल की घटनाएं हमें वामपंथी कार्यकर्ताओं के छोटे से समूह की शरारत के चलते बदतर होते अकादमिक माहौल के प्रति सावधान करती है।
        देश में करीब 900 विवि हैं, जिसमें लगभग 1 करोड़ विद्यार्थी हरसाल पढ़ते हैं। शुक्र है कि सभी छात्र कुत्सित विचारधारा के नहीं हैं। इनमें से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो पढ़ना चाहते हैं, उन्हें कतिपय छात्र व सियासी खिलाड़ी पढ़ने और आगे बढ़ने से रोकते रहते हैं। यही विश्वविद्यालयों में अशांति की मूल वजह है। इन विश्वविद्यालयों में यही आलम रहा, तो वहां से निकलनेवाले छात्र कैसी प्रवृति के होंगे और देश के लिए कैसा काम करेंगे? सोचनीय मुद्दा है। इन विश्वविद्यालयों के दिग्भ्रमित युवा, जहां भी काम करेंगे, अपने कुंठित एजेंडों को ही आगे बढ़ाएंगे।
        आजाद देश में इन्हें कैसी ‘आजादी’ चाहिए? क्या इन्हें तोड़फोड़ करने, हिंसा करने, आगजनी करने, उपद्रव करने, मारपीट करने, पत्थर फेंकने, देश को टुकड़े-टुकड़े करने, सड़क जाम कर दूसरों को परेशान करने, अलगाववाद और आतंकवाद का पोषण करने की आजादी चाहिए! यह तो पागलपन और मानसिक दिवालियापन है। दुश्मन देश को जिंदाबाद और स्वदेश को मुर्दाबाद कोई शातिर बदमाश, गद्दार, देशद्रोही और सिरफिरा ही कह सकता है। समझ से परे यह भी कि इनके माता-पिता इन्हें ऐसा करने से रोकते क्यों नहीं? क्या उनकी भी विचारधारा इसी तरह विध्वंसक और नापाक है?
         यह भी तय है कि अपने खतरनाक एजंेडों को चलानेवाले देश के कभी हितकारी नहीं हो सकते हैं। उन्हें तो बस हड़ताल, धरना व बंद करना है और निहित एजेंडे के खिलाफ जानेवालोें को निशाना बनाना, सार्वजनिक छींटाकशी करना और प्रताड़ना करना है।
        इन्हें पालने-पोसनेवाली सरकारों को चाहिए कि वे इन पर सख्ती से पेश आएं। सरकार हर साल करदाताओं का करोड़ों रुपया इनके ऊपर खर्च करती है, लेकिन ये देश को दे क्या रहे हैं और आगे क्या देंगे? यह तो सरासर ‘‘जिस थाली में खाना और उसी में छेद करना है।’’
--00--

मंगलवार, 3 मार्च 2020

पाकिस्तान की फजीहत


आतंकी संगठनों को धन मुहैया कराने के ढांचे को रोकने में पाकिस्तान पूर्णतया असफल रहा है। बावजूद इसके फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने उसे 21 फरवरी 2020 को पेरिस बैठक में ब्लैक लिस्ट नहीं किया। 20 अक्टूबर 2019 को पेरिस बैठक में भी यही खेल खेला गया। पाकिस्तान को अब जीवनदान देते हुए जून 2020 तक का वक्त दिया गया है।
       20 अक्टूबर 2019 के पेरिस बैठक में एफएटीएफ अध्यक्ष शियांगमिन लिउ-चीन ने कहा भी था, ‘‘पाकिस्तान सरकार को 27 मानकों पर कार्रवाई करने को कहा गया था, लेकिन उसकी तरफ से सिर्फ 5 मानकों पर ही कार्रवाई की गई।’’ सवाल यही कि छह माह पूर्व के हालात और अभी के हालात में कोई विशेष फर्क नहीं आया, तो उसे काली सूची में डालने के लिए और मोहलत क्यों दी गई?
एफएटीएफ की रिपोर्ट से साफ है कि पाक सरकार आतंकियों की फंडिंग रोकने के लिए न गंभीर है, न ही कोई गंभीर कार्रवाई करके अब तक दिखाया है। इसके बावजूद उसको ब्लैक लिस्ट नहीं करना यही दर्शाता है कि आतंकिस्तान को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। मामले को लंबा खिंचने की कवायद की जा रही है। 
       जून 2019 में अमेरिका के आॅरलैंडो में एफएटीएफ की बैठक में भी यही कहा गया था, जो अभी कहा गया है। पाकिस्तान को मौटे तौर पर कहा गया था कि अलकायदा, जैश-ए-मोहम्मद, जमात-उल-दावा समेत संयुक्त राष्ट्र से घोषित हर आतंकी संगठन या उससे जुड़े आतंकियों के परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर वित्तीय ढांचे को ध्वस्त करे। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अपने वित्तीय संस्थानों को तैयार करे, ताकि उनका गैरकानूनी फायदा कोई संगठन उठा न सके।
       जबकि आतंकी फंडिंग और गैरकानूनी तरीके से होनेवाले पैसे के लेनदेन को रोकने के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एफएटीएफ यानी फाइनेंशियल एक्सन टास्क फोर्स की एशिया प्रशांत समूह (एपीजी) ने माना है कि पाकिस्तान आतंकी व प्रतिबंधित संगठनों के वित्तीय गर्भनाल को काटने में असफल हो चुका है। यह बैठक आस्ट्रेलिया के कैनबरा में सम्पन्न हुई है, जिसमें माना गया है कि 27 मानकों में-से 22 मानकों पर पाकिस्तान नाकामयाब रहा है।
       एफएटीएफ में पड़ोसी देश का दावा है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से आतंकी घोषित केवल 16 आतंकी पाकिस्तान में है। इनमें से सात की मौत हो चुकी है। जो नौ आतंकी जिंदा हैं, उनमें से सात ने संयुक्त राष्ट्र में वित्तीय और यात्रा संबंधी प्रतिबंध हटाने की अपील की हुई है।
       यह कटुसत्य है कि पाकिस्तान में हजारों आतंकी पल-बढ़ रहे हैं और वह आतंकवाद का रास्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह इसी के बलबूते भारत से प्राॅक्सीवार लड़ रहा है। इसके अनेक सबूत हैं। वह कश्मीर सहित देशभर में आतंकवादी करतूतों में शामिल हैं। कश्मीर में उसी के शह पर रोजाना सीजफायर का उल्लंधन हो रहा है। उसने दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए हाफिज सईद पर फौरी कार्रवाई की है। वह आतंकी आका मसूद अजहर को लापता बता रहा है, जबकि वह पाकिस्तान में ही चूहा बनकर किसी बिल में छिपा हुआ है। भारत का गुनेहगार दाउद इब्राहिम तो सेना के संरक्षण में पाकिस्तान में मौज कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान उसके संबंध में अपनी अनभिज्ञता जाहिर करता रहता है। यही नहीं, सैयद सलाउद्दीन जैसे अन्य जहरीले नाग वहां नित नए जहर उगलते रहते हैं।
क्या है एफएटीएफ-जी-7 देशों की पहल पर 1989 में गठित एफएटीएफ एक अंतरसरकारी संगठन है। गठन के समय इसके सदस्य देशों की संख्या 16 थी। 2016 में ये संख्या बढ़कर 37 हो गई। भारत इसमें 25 जून 2010 को 34वें सदस्य देश के रूप में शामिल हुआ। शुरूआत में इसका मकसद मनी लांडरिंग पर रोक लगाना था, लेकिन 9/11/2001 को अमेरिका के वल्र्ड टेªड संेंटर पर हुए भयावह आतंकी हमले के बाद आतंकी संगठनोें पर वित्तपोषण भी इसकी निगरानी के दायरे में लाया गया। यानी यह आतंकियों को ‘पालने-पोसने’ के लिए पैसा मुहैया करानेवालों पर नजर रखनेवाली एजेंसी बन गई है। अब एफएटीएफ वर्चुवल करेंसी से संबंधित मुद्दों पर भी विचार करना आरंभ कर रही है। यह संगठन एक अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माण निकाय है। लेकिन कानून प्रवर्तन मामलों, जांच या अभियोजन में इसकी कोई भूमिका नहीं है। एपीजी यानी एशिया पैसिफिक गु्रप इसकी क्षेत्रीय इकाई है। सुविधा के लिए इस अंतरराष्ट्रीय संगठन ने दो क्षेत्रीय इकाइयां गठित कर रखी है।
दो सूचीः एफएटीएफ दुनिया के उन देशों की दो सूची बनाती है, जो मनी लांडरिंग और आतंकी संगठनों को मिलनेवाले घन को रोकने या उसके खिलाफ कदम उठाने में पीछे रहते हैं। इसकी पहली सूची ग्रे और दूसरी सूची ब्लैक कहलाती है।
निगरानी सूचीः निगरानी सूची/भूरी सूची में उन देशों को शामिल किया जाता है, जो अपने देश के फाइनेंशियल सिस्टम को टेरर फंडिंग और मनी लांड्रिंग की गतिविधियों को बढ़ावा देने से रोकने में असमर्थ रहते हैं।
काली सूचीः कोई देश आतंकी फंडिंग और मनी लांड्रिंग पर अंकुश लगाने में पूरी तरह और लगातार असमर्थ रहता है, उसे एफएटीएफ द्वारा भूरी सूची से निकाल कर काली सूची में स्थानांतरित कर दिया जाता है। यह कार्रवाई 2000 से की जा रही है। यह लिस्ट प्राय छह माह के अंतराल पर अपडेट होती रहती है।
भूरी सूची में पाकिस्तानः साल 2012 में पहली बार पाकिस्तान को भूरी सूची में डाला गया था। तब, वह इसमें 2015 तक रहा। 29 जून 2018 को उसे पुनः भूरी सूची में डाला गया, जो आज तक कायम है। पाकिस्तान को भूरी सूची से हटाने के लिए 37 में से 12 वोट की जरूरत थी, जो उसे नहीं मिले। केवल तुर्की व मलेशिया ने उसको ग्रे लिस्ट से हटाने के लिए वोट किया।
मनी लांडरिंग पर रोक लगानाः निगरानी सूची में शामिल देशों को मनी लांडरिंग पर पूरी तरह रोक लगाना, गैरकानूनी तरीके से राशि हस्तांतरित करने की हर तरह की गतिविधियों को रोकना, दूसरे देशों में ब्लैकमनी को भेजना या दूसरे देशों से ब्लैकमनी के प्रवाह को रोकना, आतंकी फंडिंग को रोकने में सरकारी व कानूनी एजेंसियों को मजबूत बनाना और उनकी तरफ से ठोस कदम उठाने जैसे कदम शामिल हैं। यह भी साबित करना होता है कि उसकी एजेंसियों ने आतंकी फंडिंग को रोकना शुरू कर दिया है, इसके साफतौर पर उदाहरण भी देने होते हैं। यह भी दिखाना होता है कि अभी तक आतंकी संगठनों को जो मदद मिली थी या फंड मिला था, उसे जब्त किया जा रहा है या नहीं?
प्रतिकूल असरः कंगाल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। वह एक तो करेला, दूजा नीम चढ़ा हो जाएगा। यदि वह कालीसूची में डाला गया, तो उसके अर्थतंत्र की कमर टूट जाएगी। पाक विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी के अनुसार, पाकिस्तान ब्लैकलिस्टेड किया गया, तो उसकी अर्थव्यवस्था पर सालाना 10 अरब डालर का बोझ पड़ेगा। ब्लैक लिस्टेड होने से उसकी अर्थव्यवस्था पर इस प्रकार प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
1. आईएमएफ, विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक सहित वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से कर्ज मिलना कठिन हो जाएगा। वे इसकी साख गिरा सकती हैं।
2. विदेशी कंपनियों के लिए वहाॅं निवेश करने की लागत बढ़ जाएगी। मूडी, एस एंड पी और फिच जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां पाकिस्तान की रेटिंग गिरा सकती हैं। इससे निवेशक निवेश करने से बिदकेंगे। अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ जाएगा।
3. पाक का शेयर बाजार लुढ़क सकता है। वित्तीय अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो सकती है। चीन इस अवसर को भुनाते हुए निवेश कर मुनाफा कमा सकता है।
4. उसके सामान्य आयात-निर्यात करने की लागत बढ़ जाएगी।
5. आतंकिस्तान का वित्तीय क्षेत्र ढह सकता है। 126 शाखाओं वाले सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड सहित सिटी बैंक, ड्यूश बैंक अपना कारोबार समेट सकते हैं।
6. विदेशी लेनदेन और विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी के चलते पहले से ही आसमान छूते फेकिस्तान का चालू खाता घाटा और बढ़ने की संभावना है।
7. वैश्विक बाजार से फंड का इंतजाम करने में झूठे पाक को नानी याद आ जाएगी।
8. जो अर्थव्यवस्था 5 फीसद की दर से बढ़ायमान थी, जिसका लक्ष्य इस साल 6 फीसद था, वह गर्त में जा सकती है।
9. यूरोपीय मुल्कों को निर्यातित चावल, काॅटन, मार्बल, कपड़ा व प्याज सहित अनेक उत्पादोें पर विपरीत असर पड़ सकता है। घरेलू उत्पादकों की कमर टूट सकती है।
10. बीमा कंपनियां ज्यादा प्रीमियम लेने लगेंगी। लिहाजा बीमा कारोबार ठप हो जाएगा। पाकिस्तान के निर्यातकों की बीमा लागत बढ़ जाएगी।
11. उसको पूर्णरूपेण अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।
--00--

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

कोरोना वायरस


चीन में महामारी की तरह विस्तारित कोरोना वायरस ने अब तक 1000 से अधिक लोगों की जानें ले ली हैं। वहीं 50 हजार लोग इससे संक्रमित हैं। यह सरकारी आंकड़ा है, जो छुपाने और दबाने के लिए कमकर बताया जा रहा है। जबकि वास्तविकता इससे भयावह है। चीन के कई शहरों में इस संचारी रोग से ग्रसित लोगों को एपार्टमेंटों में, फ्लेटों में, घरों और भवनों में ताला जड़ दिया गया है। वहां चारोंओर चीख-पुकार मची है।
        चीन के हुबई प्रांत का औद्योगिक शहर वुहान इससे सर्वाधिक प्रभावित है। इस वायरस की चपेट में आकर अमेरिका व जापान के नागरिक भी अपनी जाने गवां बैंठे हैं तथा यह माल-असबाब के साथ लोगों की आवाजाही से दुनियाभर में फैलने लगा है। एक अनुमान है कि कोरोना वायरस से दुनिया के 50 प्रतिशत से अधिक चपेट में आ जाएंगे। लोग दहशत में है। इसके पहले चीन 2003 में सार्स वायरस के लपेटे में आ चुका है, जिसमें 700 से अधिक जाने जा चुकी हैं।
दुर्भाग्यजनक यह कि चीनी सरकार प्रारंभ में इस संकट को दबाने की भरपूर कोशिश करती रही। चीनी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को सूचना देना जरूरी समझा, लेकिन अपने लोगों को बताना तक गंवारा नहीं किया। उसने उन लोगों और चिकित्सकों को प्रताड़ित किया, जिसने वास्तविकता सरकार व जनता के सामने रखना चालू किया। इसी का दुष्परिणाम है कि वहां लोगों को समय पर सूचना नहीं मिली और वे एहतियातन कदम नहीं उठा सके।
इसी के मद्देनजर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना है और हेल्थ इमेरजेंसी लगाया है। इसके पूर्व भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बर्ड फ्लू के लिए, स्वाइन फ्लू के लिए, निपाह वायरस के लिए भी हेल्थ इमेरजेंसी की घोषणा किया था।
इसे ईश्वर की कृपा कहें या कुछ और; हाल-फिलहाल भारत इसकी चपेट से मुक्त है। जबकि महाराष्ट्र में चीन के नागरिक समेत जिन छह लोगों के ब्लड की जांच की गई, उनकी रिपोर्ट निगेटिव निकली। इसी तरह केरल में तीन तथा जापान में क्रूज पर फंसे दो भारतीयों के मामलों को छोड़कर अभी तक देश में कोरोना वायरस का कोई मामला सामने नहीं आया है। शुक्र है कि केरल में जिन तीन लोगों में कोरोना वायरस की संभावना थी, उनमें से एक की टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव निकल गई है।
लेकिन फिर भी दहशत ऐसा है कि लोग मास्क या स्कार्फ लगाकर घरों से बाहर निकल रहे हैं। इस दहशत की सबसे बड़ी वजह यही कि इस वायरस का एलोपैथी में अब तक इलाज उपलब्ध नहीं है। ऊपर से सरकारी अस्पतालों का हाल किसी से छुपा नहीं है। हद दर्जे की लापरवाही और भर्राशाही, यदि कहीं है, तो देश के सरकारी अस्पतालों में है। वहां लोग जिएं या मरें, किसी को कोई परवाह नहीं रहती। सब भगवान भरोसे चलता रहता है।
कोरोना वायरस विषाणुओं का समूह है, जो सामान्यतः पशु-पक्षियों में होता है। जब मनुष्य इन संक्रमित पशु-पक्षी के संपर्क में आता है या इनका सेवन करता है, तब यह वायरस मनुष्य में दाखिल हो जाता है। जैसा कि चीन में हुआ है, जिसका प्रमुख कारण मांसाहार माना गया है। वहां मांसाहारियों की संख्या सर्वाधिक है। जब संक्रमित व्यक्ति खांसता-छींकता है, तब यह वायरस महामारी की तरह दूसरे को भी चपेट में ले लेता है। यहां तक कि यह वायरस संक्रमित व्यक्ति को छूने और हाथ मिलाने से अपने अंदर पहुंच जाता है। कई बार संक्रमित सामग्री के संपर्क से भी यह फैलता है।
वैसे तो इसका लक्षण सामान्य सर्दी, खांसी व बुखार है, लेकिन जब इसका प्रकोप होता है, तब इससे सिरदर्द, गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ होती है, जो भयावह रूप धारण करता हुआ व्यक्ति की मौत का कारण बन जाता है।
इसके लिए यही सलाह दी जाती है कि संक्रमित व्यक्ति के निकट जाने से बचना चाहिए। मांसाहार व सी-फूड के सेवन से परहेज करना चाहिए। साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए। खांसने-छींकने के दरमियान नाक व मुंह में रूमाल रखना चाहिए। हाथों को बारंबार साबुन से धोना चाहिए तथा पशु-पक्षी के सीधे संपर्क से बचना चाहिए।
शुक्र है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को पत्र लिखकर इस वैश्विक संकट की घड़ी में मदद की पेशकश की और वहां फंसे 647 भारतीयों को सुरक्षित निकालने में प्रशासनिक सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने चीन में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए देश में डाक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए 50 हजार व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण देने का लक्ष्य रखा है। इसमें डिस्पोजल कपड़े, जूते, मास्क और दस्ताने शामिल हैं। भारत ने मुक्तकंठ से कहा है कि अगर पड़ोसी देश मुश्किल में है, तो उसे हर संभव चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाई जाएगी।
भारत इस कदम से मुसीबत में फंसे लोगों की अपनी सदियों पुरानी परंपरा और रीति का दुनिया को परिचय देना चाहता है। भारत ने द्वितीय चीन-जापान युद्धकाल 1938 में चीनी जनरल ‘झू दे’ के निवेदन पर पांच चिकित्सकों का मिशन 1938 में भेजा था। इसमें डाॅ. द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस भी शुमार थे। उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर जाकर बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की जान बचाई थी।
चीन में डा. कोटनिस नायक के रूप में पूजनीय हैं। उनकी याद में डाक टिकट जारी हुए हैं। हेबई प्रांत के शिजियादुआंग शहर में उनका स्मारक है। चाइना डेली के अनुसार, वे चीन के लोगों के लिए आज भी श्रद्धेय हैं। महज 32 साल की आयु में 9 दिसंबर 1942 को उनका निधन हो गया। इसपर माओत्से तुंग ने कहा था,‘‘सेना ने एक हाथ खो दिया। देश ने एक दोस्त खो दिया। आइए हम हमेशा उनकी अंतरराष्ट्रीय भावनाओं का ध्यान रखें।’’
गौरतलब है कि भारत कोरोना वायरस के खतरेवाले 30 देशों में शामिल है। अन्य देश हैं-हांगकांग, मकाउ, वाइवान, नेपान, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाइलैंड, वियतनाम, अमेरिका, पाकिस्तान, ब्रिटेन, फ्रांस और आस्ट्रेलिया। आशय यह कि वैश्विक स्तर पर 1300 से अधिक लोग संक्रमित हैं। हांगकांग में तो एहतियाती कदम के तौर पर इमेरजेंसी लगा दी गई है।
इसी के साथ भारत सरकार के आयुश मंत्रालय ने समस्त भारतीयों को सलाह दिया है कि पूर्व सावधानी के रूप में लोगों को होमियोपैथी चिकित्सक से सलाह लेकर होमियोपैथी टेबलेट आरसेनिक एलबम-30 का सेवन तीन दिन तक करना चाहिए।
--00--

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

रैगिंग


छग की राजधानी रायपुर के पेंशनबाड़ा और दीनदयाल उपाध्याय नगर हाॅस्टल में आदिवासी छात्रों से रैगिंग का मामला सामने आया है। आदिवासी विकासमंत्री ने सभी हाॅस्टलों में एंटी रैगिंग सेल गठित करने के निर्देश दिए हैं। गंभीर सवाल यह कि प्रदेश में एंटी रैगिंग कानून का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है? जबकि प्रत्येक काॅलेज एवं हाॅस्टल में नियमानुसार एंटी रैगिंग सेल गठित रहनी चाहिए।
छात्रों के अधिकारों के लिए नेशनल कमिशन फाॅर प्रोटेक्शन आॅफ चाइल्ड राइट्स-एनसीपीसीआर ने नवंबर 2017 में सभी निजी एवं सरकारी संस्थानों में चल रहे हाॅस्टलों के लिए गाइडलाइन बनाई है।
बावजूद इसके, अकेले छग राज्य में पिछले दस साल में 88 रैगिंग के मामले आ चुके हैं। ज्यादातर प्रकरणों में लीपापोती की जाती है। मामले को दबाया व छुपाया जाता है। छात्रावासों व काॅलेजों में रैगिंग नियमों का पालन नहीं हो रहा है। यह जगजाहिर है। छात्रावासों में अनधिकृत रूप से बाहरी लोग रहने लगते हैं।
इस पर छात्रावास व कालेज प्रबंधन आंखों मूंदें रहता है। गाइडलाइन के मुताबिक हाॅस्टल संचालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, छात्रावास में निवास करनेवाले छात्र-छात्राओं की संख्या, कमरों की संख्या, बेड संख्या की जानकारी देनी होती है, जो नहीं दी जाती है।
कालेज हो या हाॅस्टल, किसी विद्यार्थी का रैगिंग होना; न केवल संगीन अपराध है, अपितु विद्यार्थी जीवन में लगनेवाला एक ऐसा आधात है, जो विद्यार्थी को शारीरिक और मानसिक रूप से झकझोर कर रख देता है। यदि विद्यार्थी ग्रामीण पृष्ठभूमि से शहर पढ़ने आया है और पहले साल रैंगिग का शिकार हो जाता है, तो वह पूरी तरह टूट जाता है या फिर उसमें बदले की भावना घर कर जाती है। उसकी यह पीड़ा हताशा या अवसाद भी दे सकता है या अपराध की दुनिया में भी ले जा सकता है। कुल मिलाकर छात्र का भविष्य बरबाद होना इसका दुःखद परिणाम है।
रैगिंग पर सख्ती के बावजूद इससे जुड़ी घटनाओं में इजाफा देखकर यूजीसी ने राज्य सरकारों को भी जवाबदेह बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसे लेकर पहली बार सभी राज्यों के मुख्य सचिवों व उच्चशिक्षा सचिवों को चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। इसमें रैगिंगमुक्त राज्य बनाने सहित इन नियमों को तोड़नेवालों के खिलाफ सख्ती से पेश आने को कहा है। विदित हो कि रैगिंग को लेकर यूजीसी की मुहिम अब तक विश्वविद्यालय और दूसरे शिक्षण संस्थानों तक ही सीमित थी।
इसमें खास बात यह कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने राज्यों को यूं ही चिट्ठी लिखकर मदद नहीं मांगी है, बल्कि यह मदद तब मांगी है, जब उसकी कोशिशों के बाद भी रैगिंग की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं दिख रही है।
यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक केवल 2019 में देशभर में अक्टूबर तक रैगिंग के करीब 950 मामले दर्ज हो चुके हैं, जबकि 2018 में करीब 1010 मामले दर्ज हुए थे। इसके पूर्व के कई मामले ऐसे भी दर्ज हैं, जिसमें रैगिंग ने किसी की जिंदगी को खत्म कर दिया, किसी परिवार को उजाड़ दिया, किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया, तो कई परिवार संतानहीन हो गए।
रैगिंग के मामले में विश्वविद्यालय या महाविद्यालय प्रशासन भी कहीं-न-कहीं दोषी होता है, जो रैगिंग सामने आने पर उसको ढ़ांकने के काम में जुट जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि एंटी रैगिंग सेल शैक्षणिक सत्र में निरंतर सक्रिय रहे। हरएक मामले का संज्ञान ले। तुरंत समझाइश दे। त्वरित जांच-पड़ताल करे और दोषी छात्रों को दंडित करे, ताकि कानून का भय कायम रहे।
रैगिंग एक दंडनीय अपराध है। इससे विद्यार्थी के विश्वास को ठेस पहुंचती है। एंटी रैगिंग कानून के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल का सश्रम कैद और आर्थिक दंड लगाये जाने का प्रावधान है। रैगिंग में ये दायरे भी शामिल किए गए हैं-
1. छात्रों से उनकी मर्जी के बिना जबरन किसी प्रकार का अनावश्यक कार्य करवाया जाना।
2. छात्र के नस्ल या फिर उसके पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि पर कोई अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की जाना।
3. क्षेत्रीयता, भाषा या फिर जाति के आधार पर अपमान किया जाना।
4. छात्र के रंगरूप या उसके पहनावे पर टिप्पणी की जाना या उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाया जाना।
--00--

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

डेथ वारंट


        दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ने निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्याकांड के चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वारंट जारी कर दिया है। अक्षय कुमार सिंह 31 वर्षीय बस का हेल्पर, विनय शर्मा 26 वर्षीय जिम में हेल्पर, मुकेश कुमार 32 वर्षीय ड्राइवर कम हेल्पर और पवन गुप्ता 25 वर्षीय फल विक्रेता चारों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाकर दुष्टों की दुष्टता का अंत कर दिया जाएगा।
        इसके बावजूद लगता है कि कुछ कानूनी पेचिदगियां का पालन और रह गया है, जिसका फायदा ये शैतान और इनके कानून के जानकार शातिर साथी सजा-ए-मौत को लंबा खींचने की शातिराना चालें चल रहे हैं।
       एक अधिवक्ता का कहना है कि उन्होंने डेथ वारंट जारी करने के आदेश को चुनौती नहीं दी है, बल्कि इसलिए अभी रोक लगाने की मांग की है, क्योंकि मुकेश ने दया याचिका दायर की है। ऐसे में जब तक दया याचिका पर कोई फैसला नहीं आता, फांसी नहीं दी जा सकती। दया याचिका खारिज हो जाती है, तो भी फांसी देने के लिए 14 दिन का नोटिस दिया जाता है।
       यह तो नौटंकी और न्यायिक प्रक्रिया का मजाक है। जिस ‘रेयर आॅफ रेयरेस्ट’ मामले में एक बार भारत का शिखर न्यायालय मौत की सजा सुना चुका है, उस मामले में दया याचिका (मर्सी पिटीशन), पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन)और उपचारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) का क्या औचित्य रह जाता है?
       विदित हो कि छह शैतानों ने दिल्ली में 16-17 दिसंबर 2012 की दरमियानी रात चलती बस में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म किया और उसे बुरी तरह घायल कर बस से बाहर सड़क पर मरने के लिए फेंक दिया था। इस दौरान पीड़िता का ब्वाॅय फ्रेंड भी साथ में था, जो हैवानों से निरंतर जूझ रहा था। पीड़िता की मौत बाद में सिंगापुर में हो गई।
      इन छह बदमाशों में-से एक बुजदिल रामसिंह, तिहाड़ जेल संख्या 3 में 11 मार्च 2013 को खुदकुशी कर लिया। एक कुकर्मी नाबालिग था, जो वारदात के समय 17 साल 6 महीने 11 दिन का था। बालिग होने के बाद उसे 31 अगस्त को बाल न्यायालय से हत्या के मामले में अधिकतम 3 साल की सजा सुनाया गया। सजा पूरा करने के बाद दिसंबर 2015 को उसे जेल से रिहा कर दिया गया।
       यह कैसा कानून है, जो दुष्कर्मी और कातिल को नाबालिग कहकर जीवनदान दे देता है? यदि वह नाबालिग था, तो उसने बलात्संग कैसे कर लिया? यह तो अधूरा न्याय और न्यायिक छिद्रता है। यही व्यक्ति बालिग होने के बाद हिम्मतवान बन गया होगा और समाज में गंदगी फैलाने का काम निरंतर कर रहा होगा!
      शेष चारों को ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2013 को फांसी की सजा सुनाया। मार्च 2014 को हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की। मई 2017 को सुप्रीमकोर्ट ने फांसी की सजा को बरकरार रखा।
       सुप्रीमकोर्ट के फैसले के दो साल बाद मामले को लटकाने के लिए जिस तरह तारीख-पर-तारीख का खेल खेला गया, वह देश के न्यायिक इतिहास में आमजनों के विश्वास को ठेस पहुंचानेवाला साबित हुआ है। न्याय की यह कच्छप गति देशहित में तो कदापि नहीं है। इससे जहां गुनेहगारों का हौसला बड़ा है, वे रोजाना 100 से अधिक गुनाह कर रहे हैं, वहीं देशवासियों के मन में यही धारणा घर कर गया है कि न्याय में देरी, न्याय से इंकार है। 
       न्याय में सात साल का विलंब उस हाईप्रोफाइल मामले में हुआ, जिसने लोगों को झकझोरकर सड़कों पर प्रदर्शन करने के लिए उत्प्रेरित किया था। नेतागणों को राजनीति चमकाने का अवसर दिया था। हैदराबाद की ह्दयविदारक घटना के बाद जब लोगों को मालूम हुआ कि निर्भया के दोषियों को अब तक उनके अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका है, तो वे सड़कों पर प्रदर्शन करने लगे थे। यहीं से सोता हुआ कानून फिर से जाग उठा।
       बाकी वे मामले जिसमें देश में प्रतिदिन 100 से अधिक दुष्कर्म हो रहे हैं, उनके न्याय का क्या हो रहा होगा? भगवान ही जानता है। कठुआ, उन्नाव और वे तमाम मामले, जिसने देश की अस्मिता को लहूलुहान कर दिया है, उन्हें भी क्या न्याय मिलने में न्याय की मंथर गति का इंतजार करना पड़ेगा? या नीति-नियंता न्याय की इस देरी के लिए कारगर कदम उठाएगें? कानून में आमूलचून परिवर्तन कर त्वरित और संपूर्ण न्याय के उपाय करेगें।
        नीति-नियामकों को यह बात समझने की जरूरत है कि देश में जब तक सम्यक रूपेण न्यायिक, प्रशासनिक, पुलिस और चुनावी सुधार नहीं होता, तब तक भारतीय लोकतंत्र में न्याय के लिए यूं ही देरी होती रहेगी।
--00--

सोमवार, 13 जनवरी 2020

Virendra dewangan: इंटरनेट पर अश्लील सामग्री

Virendra dewangan: इंटरनेट पर अश्लील सामग्री: राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडु ने देश में बढ़ते बलात्संग व उसके बाद जधन्य हत्या के बीच इंटरनेट पर अश्लीलता के प्रसार को रोकने के लिए सांसदों...

शनिवार, 11 जनवरी 2020

डिटेंशन सेंटर


देश में नागरिकता कानून, एनआरसी और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की गहमागहमी में एक और चीज उभरकर सामने आई है, जो सियासी गलियारों में हलचल मचा रखी है, वह है डिटेंशन सेंटर। प्रधानमंत्री ने दिल्ली के रामलीला मैदान में इसका जिक्र किया, तो यह सुर्खियों में छाकर कोहराम मचा गया।
जुलाई 2019 में लोकसभा में गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने बयान दिया था कि देश में डिटेंशन संेटर विदेशी विषयक अधिनियम 1946 की धारा 3 (2)ड के तहत बनाए जाते हैं। सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसा कैंप मैनुअल व सर्कुलर के अनुसार स्थापित कर सकते हैं। इसमें मानवाधिकारों को ध्यान में रखते हुए बिजली, पानी, शौचालय, मनोरंजन, रसोई आदि के स्तर बनाए रखे जाते हैं।
प्रसंगवश असम में कुल 6 डिटेंशन सेंटर हैं, जो जेलों के अंदर हैं। ये हैं-गोलपारा, कोकराझार, सिल्चर, डिबू्रगढ़, जोरहाट, तेजपुर। इन सेंटरों में कुल 646 पुरुष, 324 महिला रखे गए हैं। इन सेंटरों का संचालन राज्य सरकार करती है। असम सरकार ने 2009 में डिटेंशन सेंटर बनाने का फैसला लिया था। वहीं असम विधानसभा में भी राज्य सरकार ने इसे माना है।
इनके अलावा असम के ही ग्वालपाड़ा जिले के मटिया में 3000 लोगों की क्षमता वाला नया डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है। सेंटर मार्च 2020 तक तैयार हो जाएगा। असम के वित्तमंत्री के मुताबिक गोलपारा डिटेंशन सेंटर की स्थिति सही नहीं होने के कारण यह कैंप निर्मित किया जा रहा है। वहीं बैंगलुरु के नजदीक सोंडेकोप्पा में 30 लोगों की क्षमतावाला एक कैंप बन रहा है, लेकिन इसे कर्नाटक के गृहमंत्री डिटेंशन सेंटर मानने से इंकार करते हैं।
        जिन घुसपैठियों को फाॅरेन ट्रिब्यूनल सुनवाई के बाद विदेशी घोषित कर देता है, उन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजने का आदेश दिया जाता है। वहीं सुप्रीमकोर्ट ने 20 नवंबर 2017 को एक याचिका पर सशर्त फैसला दिया था कि पीड़ित को 2 साल 4 माह बाद डिटेंशन सेंटर से छोड़ दिया जाए।
        यह कोई आश्चर्य का विषय का नहीं कि दुनिया के सभी बड़े देशों में डिटेंशन सेंटर हैं। अमेरिका में न्यूजर्सी में डिटेंशन सेंटर है। योरोप, दक्षिण अफ्रीका, इजराइल में भी ऐसे कैंप है। इजराइल का डिटेंशन सेंटर दुनिया का सबसे बड़ा है। दरअसल, विदेशों में घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं किया जाता है, इसलिए इनकी पहचान कर इन्हें इन्हीं हिरासत कैंपों में रखा जाता है।
       कई देशों में तो घुसपैठियों को सीधे गोली मार दी जाती है। अनेक देशों में आजीवन जेलों में ठंूस दिया जाता है या देशनिकाला दे दिया जाता है। लेकिन, आजादी के बाद से देश को सराय बनाकर रखने का ही खामियाजा है कि देश में घुसपैठियों की संख्या हैरत करनेवाली स्थिति को प्राप्त हो गई है।
       डिटेंशन सेंटर के मामले को तूल देते हुए कांग्रेस ने जहां यह कहकर प्रधानमंत्री को ‘झूठा’ कहा कि ‘‘आरएसएस के प्रधानमंत्री ने भारतमाता से झूठ’’ बोला, वहीं भाजपा के प्रवक्ता ने राहुल गांधी को ‘झूठों का सरदार’ कह दिया।
      जबकि वास्तविकता यह कि असम में तीन डिटेंशन सेंटर उस समय बनाए गए थे, जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए व राज्य में तरुण गोगोई की अगुवाई में कांग्रेस की सरकारें थीं। इस संबंध में 2012 में श्वेतपत्र जारी किया गया था।
       एक अनुमान के अनुसार भारत में अवैध घुसपैठियों की संख्या 4 से 6 करोड़ के आसपास है, जो देश की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक तानेबाने को ध्वस्त करने के लिए काफी है। इनके कारण ही कई राज्यों में मुस्लिम समुदायों की संख्या आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ गई है और हिंदू व अन्य समुदायों की संख्या घट गई है।
       ये धुसपैठिए सीधे तौर पर राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति व वोटनीति को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं। यही कारण है कि वोटबैंक की खातिर विपक्षी राजनीतिक दल एनआरसी, नागरिकता कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर का विरोध कर रहे हैं और देश में अराजकता का माहौल बनाकर अपनी दुकानदारी को पुख्ता कर रहे हैं।
--00--

boycott of chinese product

पार्टियों में बगावत

पार्टियों में बगावत सबसे अधिक समय तक सत्ता का स्वाद चखनेवाली कांग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की बगावत कोई नई घटना ...